{"_id":"6165d4ec8ebc3e86b3506da9","slug":"cultural-banda-news-knp6579460195","type":"story","status":"publish","title_hn":"भक्तों की झोली भरती हैं मां काली","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
भक्तों की झोली भरती हैं मां काली
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बेंदाघाट। यमुना नदी के तट पर स्थित प्राचीन काली देवी का मंदिर लोगों का आस्था व विश्वास का केंद्र बना है। मान्यता है कि मां काली यहां आने वाले भक्तों की हर कामना पूरी झोली भरती है।
शारदीय नवरात्र में यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। यहां नवरात्र, कार्तिक पूर्णिमा, मकर संक्राति, वैशाखी पूर्णिमा पर विशाल मेला लगता है। जिले के अलावा दूसरे प्रांतों के भक्त भी काली देवी मंदिर दर्शन व आराधना करने आते हैं। जनश्रुति के अनुसार लगभग 400 वर्ष पहले जूनादास नाम के व्यापारी ने मनोकामना पूरी होने पर मंदिर का निर्माण कराया था।
बुजुर्ग बताते हैं कि पहले व्यापारियों के लिए आने-जाने का साधन नदी और नाव थी। 1750 के आसपास व्यापारी जूनादास व्यापार करके लौट रहे थे। अचानक उनकी चांदी के सिक्कों से भरी थैली गुम हो गई। उन्होंने घाट किनारे छोटी सी मां काली की प्रतिमा की पूजा की और मन्नत मांगी कि थैली मिल जाए तो मंदिर बनवाएंगे। रात में व्यापारी को मां ने दर्शन देकर कहा कि चांदी की थैली बरमदेव बाबा के स्थान के सामने रेत में दबी है।
विज्ञापन
व्यापारी ने उस स्थान पर खुदाई की तो थैली मिल गई। इसके बाद व्यापारी ने मंदिर बनवाया। कानपुर के श्याम नगर से यहां आई मनोज कुमारी कहती हैं कि बेटी की शादी को आठ साल हो गए थे, लेकिन कोई संतान नहीं थी। मन्नत मांगी तो बेटी के बेटा हो गया। तीन सालों से निरंतर यहां नवरात्र में पूजन को आते हैं।
विज्ञापन
शारदीय नवरात्र में यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। यहां नवरात्र, कार्तिक पूर्णिमा, मकर संक्राति, वैशाखी पूर्णिमा पर विशाल मेला लगता है। जिले के अलावा दूसरे प्रांतों के भक्त भी काली देवी मंदिर दर्शन व आराधना करने आते हैं। जनश्रुति के अनुसार लगभग 400 वर्ष पहले जूनादास नाम के व्यापारी ने मनोकामना पूरी होने पर मंदिर का निर्माण कराया था।
विज्ञापन
बुजुर्ग बताते हैं कि पहले व्यापारियों के लिए आने-जाने का साधन नदी और नाव थी। 1750 के आसपास व्यापारी जूनादास व्यापार करके लौट रहे थे। अचानक उनकी चांदी के सिक्कों से भरी थैली गुम हो गई। उन्होंने घाट किनारे छोटी सी मां काली की प्रतिमा की पूजा की और मन्नत मांगी कि थैली मिल जाए तो मंदिर बनवाएंगे। रात में व्यापारी को मां ने दर्शन देकर कहा कि चांदी की थैली बरमदेव बाबा के स्थान के सामने रेत में दबी है।
विज्ञापन
व्यापारी ने उस स्थान पर खुदाई की तो थैली मिल गई। इसके बाद व्यापारी ने मंदिर बनवाया। कानपुर के श्याम नगर से यहां आई मनोज कुमारी कहती हैं कि बेटी की शादी को आठ साल हो गए थे, लेकिन कोई संतान नहीं थी। मन्नत मांगी तो बेटी के बेटा हो गया। तीन सालों से निरंतर यहां नवरात्र में पूजन को आते हैं।