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बुंदेलखंड के खनन पट्टाधारकों की सूची तलब, लोकायुक्त ने बांदा की तत्कालीन डीएम के पत्र का ब्योरा भी मांगा

Wed, 14 Jan 2015 11:41 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा Updated Wed, 14 Jan 2015 11:41 PM IST
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Bundelkhand cite the mining lease holders list

प्रदेश के लोकायुक्त द्वारा की जा रही अवैध खनन की जांच मामले में बुंदेलखंड के चार जिले भी जांच के दायरे में आ गए हैं। लोकायुक्त ने बांदा समेत हमीरपुर, जालौन और झांसी जनपद के खनन पट्टा धारकों की सूची तलब की है।

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साथ ही बांदा की पूर्व डीएम शीतल वर्मा द्वारा अवैध खनन से बांदा शहर के ढह जाने की आशंका संबंधी पत्र का भी ब्योरा मांगा है। जांच में कई खनन माफिया और अफसरों के फंसने के आसार हैं।
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लोकायुक्त ने प्रदेश के खनन विभाग के निदेशक से 28 जनवरी तक कुल 15 सवालों पर जवाब मांगा है। साथ ही बुंदेलखंड के बांदा, हमीरपुर, जालौन और झांसी में पट्टा धारकों की सूची मांगी है। गौरतलब है कि बांदा में सात पट्टा धारक बताए गए हैं। इनके पट्टे की अवधि 2016 तक है।
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लोकायुक्त ने बांदा की पूर्व जिलाधिकारी शीतल वर्मा के लिखे उस पत्र का भी ब्योरा और जानकारी तलब की है, जिसमें उन्होंने अवैध खनन से बांदा शहर के ढहने की आशंका जताई थी। गौरतलब है कि डीएम शीतल वर्मा ने खुद केन नदी घाट जाकर खदान में छापा मारा था।

वहां अवैध रूप से खनन कर रहे कई ट्रक, ट्रैक्टर और जेसीबी व पोकलैंड मशीनें पकड़ी थीं। डीएम ने खनिज अधिकारी को पत्र भेजकर अवैध खनन पर कड़ी नाराजगी और चिंता जताई थी। अवैध खनन से केन नदी की खदानें बांदा शहर की ओर तेजी से कट रही हैं।

लोकायुक्त ने यह भी जानकारी तलब की है कि पट्टा आवंटन के लिए प्रचलित अखबार में विज्ञापन दिया गया या नहीं ? पांच एकड़ से छोटे कितने पट्टों का नवीनीकरण किया गया है? किसको कितने क्षेत्र का पट्टा दिया गया और वहां कितना खनन हुआ? लोकायुक्त के सवालों का जवाब भेजने के लिए प्रशासन और खनिज विभाग जुटा हुआ है।

लोकायुक्त ने पूछा- क्या है सिंडीकेट ?
बसपा सरकार में बालू खनन की दुनिया में शुरू हुआ ‘सिंडीकेट’ अब और सिर चढ़कर बोल रहा है। सिंडीकेट हासिल करने के लिए सत्ता में पहुंच रखने वाले प्रदेश के प्रभावशाली लोग जुटे रहते हैं। यही वजह है कि अक्सर सिंडीकेट वसूलने वाले चेहरे बदल जाते हैं। लोकायुक्त ने खनन निदेशक से यह भी पूछा है कि- खनन सिंडीकेट क्या है?

व्यावहारिक अथवा कानूनी तौर पर इसका क्या अस्तित्व है? इसका जवाब तलाश पाना अधिकारियों को मुश्किल हो रहा है। दरअसल हो रहा है। प्रत्येक खदान मेें बालू खरीदने वाले लोगों से पट्टा धारक रॉयल्टी के अलावा कुछ और वसूली करते हैं। वसूली के इस पैसे का बंटवारा लखनऊ तक जाता है।


पूरे जनपद में यह वसूली करने का ‘ठेका’ जिसे सौंपा जाता है उसी को ‘सिंडीकेट’ कहते हैं। वर्तमान में प्रत्येक ट्रक से रॉयल्टी के अलावा पांच हजार रुपये सिंडीकेट के नाम पर वसूले जा रहे हैं।

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