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शरीअत और कोर्ट दोनों का करें सम्मान
ब्यूरो, अमर उजाला, बांदा
Updated Thu, 08 Dec 2016 11:27 PM IST
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डॉ. शबाना रफीक।
- फोटो : अमर उजाला
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इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा तीन तलाक को संविधान के विरुद्ध और महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन बताने पर मुस्लिम वर्ग की कुछ बुद्धजीवी महिलाओं ने प्रतिक्रिया व्यक्त की है। कहा है कि शरीअत और न्यायालय दोनों ही सम्मानीय है। दोनों को ही एक-दूसरे के सम्मान और मुकाम का लिहाज रखना चाहिए। यह भी कहा कि इस्लाम में महिलाओं को सबसे ज्यादा अधिकार दिए हैं।
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वरिष्ठ महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. शबाना रफीक (एमडी) का कहना है कि तलाक का प्रावधान केवल इस्लाम धर्म में ही है, अन्य किसी धर्म में नहीं। हर देश के संविधान ने बाद में इसे अपनाया। शरीअत के मुताबिक पति-पत्नी अगर किसी खास कारणोें से एक साथ सुखी जीवन नहीं बिता पाते तो मर्द तलाक लेकर और औरत खुली प्रक्रिया पूरी कर पुनर्विवाह कर नया जीवन शुरू कर सकती है।
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कहा कि इसमें निकाह की प्रक्रिया खुद एक कोर्ट जैसी प्रक्रिया है। इसमें वर-वधू के अलावा शहर काजी, वकील और गवाह होते हैं। निकाहनामे की एक-एक प्रति लड़का-लड़की और शहरकाजी को मिलती है। ऐसे में अगर तलाक जैसी नौबत आए तो इसका मामला पहली शरई अदालत में जाना चाहिए। वहां तय नहीं हो पाता तब स्थानीय कोर्ट जाना चाहिए। साथ ही तलाक की वजह पति-पत्नी दोनों से ही गंभीरतापूर्वक सुनी जानी चाहिए।
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मामूली सी बातों पर तलाक न सिर्फ शरीअत में बल्कि दुनियांबी अदालत में गलत और जुर्म है। एक मर्तबा बिना सोचे समझे तीन बार तलाक कह देना हरगिज जायज नहीं। मर्द को खुद के साथ पत्नी के भविष्य और जिंदगी का भी ख्याल रखना चाहिए।
राजकीय महिला डिग्री कालेज की प्रवक्ता डॉ. सबीहा रहमानी का कहना है कि इस्लाम में तीन तलाक के प्रावधान के बारे में कोई फैसला या टिप्पणी करने से पहले उसे अच्छी तरह समझने की जरूरत है। वैसे तो पैगंबरे इस्लाम ने तलाक लफ्ज को जुबान पर लाना गुनाह करार दिया है। जिनमें दीन और शिक्षा का अभाव है, वही मामूली बातों पर तलाक देते हैं।
डॉ. सबीहा ने कहा कि कुछ इस्लाम के तथाकथित अलंबरदार जिन्हें शरीअत की जानकारी नहीं है, वही बेतुके फतवे देकर विवाद पैदा करते हैं। सिविल कोड की वकालत करने वाले ही ऐसे ही लोग हैं। दुनियां में इस्लाम ही ऐसा मजहब हैं, जिसने महिलाओं को सबसे ज्यादा अधिकार दिए हैं। तलाक का मसला पूरी तरह धार्मिक है। इस मामले में शरीअत के कानून की मदद लेना बेहतर है। ऐसा होगा तो स्थानीय या हाईकोर्ट आदि जाने की नौबत ही नहीं आएगी।