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आरबीआई के निर्देश नहीं मान रहे बैंक और बीमा कंपनियां, किसानों के साथ मनमानी

Fri, 27 Mar 2015 11:56 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा Updated Fri, 27 Mar 2015 11:56 PM IST
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Banks and insurance companies assume no instructions RBI

बारिश और ओलों से भले ही किसानों के बर्बादी के दिन आए हों लेकिन बैंक और बीमा के लिए दैवीय आपदा ‘अच्छे दिन’ लाई है। इन दोनों की जुगलबंदी से बीमाधारक किसानों पर दोहरी मार पड़ रही है।

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बुंदेलखंड के ज्यादातर किसान बीमा के नाम पर बैंक और बीमा कंपनियों के ‘खेल’ से अनजान हैं। ऐसे में इस बाबत किसानों को रिजर्व बैंक आफ इंडिया, भारत सरकार और राज्य सरकार के प्रावधान और दिशा-निर्देश जानना जरूरी है।
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दरअसल बैंक किसान से पूछे बिना ही बीमा कं पनियों को फसल बीमा का प्रीमियम जमा कर देती हैं। भले ही उनके खाते में सिर्फ उनकी दो वक्त की रोटी के लिए ही रकम बची हो।
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ये हैं प्रावधान
  • रिजर्व बैंक आफ इंडिया की मोडीफाइड नेशनल एग्रीकल्चरल इंश्योरेंस स्कीम (एमएनएआईएस) के तहत जरूरी प्रीमियम राशि किसान और बैंक की आपसी सहमति के आधार पर किसान के केसीसी खाते से बीमा कंपनी को दी जाएगी। किसान को यह भी जानकारी दी जाएगी कि क्षति की स्थिति में किसान को कितनी बीमा राशि मिलेगी।
  • केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय ने सितंबर 2010 में निर्देश दिए थे कि बीमा कंपनी का चुनाव राज्य सरकार करेगी। एक जिले में एक ही बीमा कंपनी होगी। राज्य सरकार अपने सूबे में स्टेट लेबिल कोआर्डिनेशन कमेटी आन क्राप्ट इंश्योरेंस का गठन करेगी। इसमें उद्यान विभाग, इंडियन मीटिरियल वोजोकल के प्रतिनिधि होंगे। यह कमेटी खरीफ के लिए फरवरी के अंत तक और रबी के लिए अगस्त के अंत तक पिछले 7 वर्षों का औसत उत्पादन और फसल का प्रीमियम तय करेगी। इसी आधार पर बीमा कंपनियां प्रीमियम राशि/क्षतिपूर्ति सीमा/उपज की सीमा तय करेगी।
  • फसल न बो पाने की स्थिति में, फसल की कटाई के बाद नुकसान की स्थिति में (14 दिन) राज्य सरकार दिशा-निर्देश जारी करेगी। प्रमुख फसलों के लिए ग्राम पंचायत को इकाई माना जाएगा।

ऐसे करें क्लेम

  • बैंक से क्लेम आवेदन फार्म हासिल करें। उसे भरें। खेत में बर्बाद हुई फसल के साथ खड़े होकर खिंचवाई गई दो फोटो फार्म में लगाएं। राज्य सरकार द्वारा नामित सर्वेयर का दिया गया क्षति प्रमाण पत्र भी संलग्न करें। इन औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद यह फार्म बैंक में जमा कर दें। बैंक कार्रवाई न करे तो एक माह के अंदर उपभोक्ता फोरम में मुकदमा दायर करें।

जान न दें, हिम्मत से काम लें
बर्बाद हुई फसलों के सदमे या सुसाइड से जान गवां रहे किसानों को जनपद के किसान हितैषी लोगों और संगठनों ने सलाह दी है कि फसल की बर्बादी या कर्ज के बोझ अथवा तंगहाली से हिम्मत हार कर आत्महत्या जैसा अमानवीय फैसला न लें। धैर्य और हिम्मत से काम लें। किसान किसी की कमाई नहीं खाता। बल्कि देश किसान की उपजाई फसल खाता है।

प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह, समाजसेवी पुष्पेंद्र भाई, प्रवास सोसाइटी के आशीष सागर आदि ने संयुक्त रूप से अपील की है कि किसान हर गांव में एकजुट हों। एक-दूसरे का सहारा बनें। जिस तरह बैंक, बीमा और प्रशासन संगठित होकर किसानों के पीछे पड़ा है तो उसके जवाब में किसान भी संगठित होकर सामना करे। हताश होकर कुछ हासिल नहीं होगा।


आपदा के दिनों में वेतन बढ़ाना निंदनीय
जिस प्रदेश में दैवीय आपदा से किसानों की मौत हो रही है और हाहाकार के हालात हों वहां के विधायक अपना वेतन दोगुना कर रहे हैं। जनप्रतिनिधियों की इससे बड़ी संवेदनहीनता क्या होगी ? भाजपा क्षेत्रीय परिषद सदस्य बलराम सिंह ने कहा है कि सांसद और विधायक किसानों के प्रति घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं।

दैवीय आपदा के दिनों में किसी भी विधायक ने अपने वेतन-भत्ते बढ़ाने का विरोध नहीं किया। अच्छा होता कि यह जनप्रतिनिधि कम से कम एक माह का अपना वेतन किसानों के लिए दे देते।

निराकरण के लिए पीएम को चिट्ठी
भारतीय किसान सेना के अध्यक्ष रमाकांत मिश्र ने प्रधानमंत्री को पत्र भेजकर बुंदेलखंड में किसानों की मौतों और आत्महत्याओं को गंभीर मुद्दा बताया। अनुरोध किया है कि शीघ्र ही वैज्ञानिकों, समाजसेवियों, कृषि विशेषज्ञों का सेमिनार करके इसके निराकरण का रास्ता खोजा जाए। ताकि किसानों की मौत पर विराम लग सके।


आरटीआई कार्यकर्ता और कांग्रेसी नेता संकटा प्रसाद त्रिपाठी ने किसानों की मौतों के प्रति प्रशासन की संवेदनहीनता और जांचों में गलत बयानबाजी पर रोष जताया। प्रधानमंत्री को पत्र भेजकर अनुरोध किया है कि जुमलेबाजी बंद करके किसानों के हित में कोई ठोस कदम उठाएं। ‘मन की बात’ की जगह अब जनता की बात सुननी पड़ेगी।

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