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सीनियर रहे नदारद, ओपीडी की कमान संभाले रहे जूनियर
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मेडिकल कालेज ओपीडी में इलाज को आए मरीज व तीमारदार फर्श में लेटे-बैठे।
- फोटो : BANDA
बांदा। रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में सोमवार को मरीजों की भीड़ उमड़ी। पर्चा काउंटर से डॉक्टर के कक्षों के बाहर तक मरीजों की लंबी लाइनें लगी रहीं। मरीजों को मलाल था कि उनका इलाज सीनियर डॉक्टर की बजाय जूनियर रेजीडेंट कर रहे हैं।
तमाम मरीज वरिष्ठ डॉक्टरों के इंतजार में उनके कक्ष के बाहर फर्श पर लेटे और बैठे रहे। शाम तक इंतजार के बाद भी सीनियर के न आने पर जूनियर डॉक्टर से ही दवा लिखाकर घर बैरंग लौट गए। सोमवार को लगभग 1159 मरीज ओपीडी में इलाज कराने पहुंचे।
दूसरी तरफ दवाओं पर कमीशन का ‘खेल’ भी मेडिकल कॉलेज में धड़ल्ले से जारी है। सीनियर डॉक्टर की कौन कहे, जूनियर डॉक्टर भी हजारों रुपये की महंगी दवाएं बाहर से मंगवा रहे हैं। इसका खुलासा कुछ मरीजों के तीमारदारों ने किया। हालांकि मेडिकल कॉलेज प्रशासन का कहना है कि मरीज या तीमारदार की शिकायत मिलने पर ही संबंधित के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल किसी ने कोई शिकायत नहीं की।
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प्रोफेसर डॉ. अनीता अग्रहरि अवकाश पर थीं। इनकी कुर्सी पर बैठकर जूनियर रेजीडेंट डॉ. रविशंकर बीमार बच्चों का इलाज कर रहे थे। भीड़ काफी थी। चंद मिनट में ही मरीज के तीमारदार को पर्चे पर कुछ मेडिकल कॉलेज तो कुछ बाहर की दवाएं लिखकर थमा रहे थे।
असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अरमान जिला अस्पताल किसी काम से गए थे। उनकी सीट जूनियर रेजीडेंट संभाले थे। कक्ष के बाहर नंबर लगाने वाले कर्मी ने बताया कि 160 मरीज देखने के बाद डॉ. अरमान गए हैं। करीब 12:40 बजे जूनियर रेजीडेंट भी नदारद थे। कर्मी ने बताया कि चाय पीने चले गए होंगे।
वरिष्ठ फिजीशियन एमबीबीएस की कक्षाएं ले रहे थे। उनके स्थान पर जूनियर रेजीडेंट ओपीडी संभाले नजर आए। बताया गया कि सीनियर रेजीडेंट डॉ. प्रिंस कुमार मरीजों को देख रहे हैं। दूरदराज से आए तमाम ऐसे मरीज थे जो वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. शैलेंद्र यादव और डॉ. करन राजपूत से इलाज कराना चाहते थे। उनके इंतजार में देर तक जमे रहे। अंतत: मायूसी हाथ लगी। कमोवेश यही स्थिति सर्जरी, नेत्र और स्त्री रोग विभाग में रही।
दो जुड़वां बच्चे अंश और विवेक हैं। इनकी मां हेपेटाइटिस बी पॉजिटिव निकल आईं। बच्चों को इस रोग से बचाने के लिए डॉक्टर ने बाहर से इंजेक्शन मंगाए हैं। एक इंजेक्शन की कीमत लगभग 5300 रुपये है। दोनों को इंजेक्शन लगाने के लिए साढ़े 10 हजार रुपये खर्च करने पड़े।-अजय पाल, लामा।
धूप और धूल से त्वचा में समस्या हो गई है। लाल चकत्ते व दाने निकल रहे हैं। वह त्वचा रोग डाक्टर को दिखाने आए हैं। लगभग आधा घंटे से ज्यादा बीत गया, कक्ष में कोई डाक्टर नहीं है। बताया गया है कि वह किसी काम से निकले हैं।-रोहित सिंह, खुरहंड।
वर्जन..
प्रोफेसर एवं वरिष्ठ डॉक्टर जब तक एमबीबीएस की कक्षाएं लेते रहते हैं तब तक उनके स्थान पर जूनियर रेजीडेंट इलाज करते हैं। साफ निर्देश हैं कि ओपीडी में आने वाला कोई मरीज बिना इलाज न लौटने पाए। कोई मरीज या तीमारदार शिकायत करता है तो संबंधित डॉक्टर के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। -डॉ. मुकेश कुमार यादव, प्राचार्य, रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज, बांदा।
पंकज
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तमाम मरीज वरिष्ठ डॉक्टरों के इंतजार में उनके कक्ष के बाहर फर्श पर लेटे और बैठे रहे। शाम तक इंतजार के बाद भी सीनियर के न आने पर जूनियर डॉक्टर से ही दवा लिखाकर घर बैरंग लौट गए। सोमवार को लगभग 1159 मरीज ओपीडी में इलाज कराने पहुंचे।
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दूसरी तरफ दवाओं पर कमीशन का ‘खेल’ भी मेडिकल कॉलेज में धड़ल्ले से जारी है। सीनियर डॉक्टर की कौन कहे, जूनियर डॉक्टर भी हजारों रुपये की महंगी दवाएं बाहर से मंगवा रहे हैं। इसका खुलासा कुछ मरीजों के तीमारदारों ने किया। हालांकि मेडिकल कॉलेज प्रशासन का कहना है कि मरीज या तीमारदार की शिकायत मिलने पर ही संबंधित के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल किसी ने कोई शिकायत नहीं की।
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प्रोफेसर डॉ. अनीता अग्रहरि अवकाश पर थीं। इनकी कुर्सी पर बैठकर जूनियर रेजीडेंट डॉ. रविशंकर बीमार बच्चों का इलाज कर रहे थे। भीड़ काफी थी। चंद मिनट में ही मरीज के तीमारदार को पर्चे पर कुछ मेडिकल कॉलेज तो कुछ बाहर की दवाएं लिखकर थमा रहे थे।
असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अरमान जिला अस्पताल किसी काम से गए थे। उनकी सीट जूनियर रेजीडेंट संभाले थे। कक्ष के बाहर नंबर लगाने वाले कर्मी ने बताया कि 160 मरीज देखने के बाद डॉ. अरमान गए हैं। करीब 12:40 बजे जूनियर रेजीडेंट भी नदारद थे। कर्मी ने बताया कि चाय पीने चले गए होंगे।
वरिष्ठ फिजीशियन एमबीबीएस की कक्षाएं ले रहे थे। उनके स्थान पर जूनियर रेजीडेंट ओपीडी संभाले नजर आए। बताया गया कि सीनियर रेजीडेंट डॉ. प्रिंस कुमार मरीजों को देख रहे हैं। दूरदराज से आए तमाम ऐसे मरीज थे जो वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. शैलेंद्र यादव और डॉ. करन राजपूत से इलाज कराना चाहते थे। उनके इंतजार में देर तक जमे रहे। अंतत: मायूसी हाथ लगी। कमोवेश यही स्थिति सर्जरी, नेत्र और स्त्री रोग विभाग में रही।
दो जुड़वां बच्चे अंश और विवेक हैं। इनकी मां हेपेटाइटिस बी पॉजिटिव निकल आईं। बच्चों को इस रोग से बचाने के लिए डॉक्टर ने बाहर से इंजेक्शन मंगाए हैं। एक इंजेक्शन की कीमत लगभग 5300 रुपये है। दोनों को इंजेक्शन लगाने के लिए साढ़े 10 हजार रुपये खर्च करने पड़े।-अजय पाल, लामा।
धूप और धूल से त्वचा में समस्या हो गई है। लाल चकत्ते व दाने निकल रहे हैं। वह त्वचा रोग डाक्टर को दिखाने आए हैं। लगभग आधा घंटे से ज्यादा बीत गया, कक्ष में कोई डाक्टर नहीं है। बताया गया है कि वह किसी काम से निकले हैं।-रोहित सिंह, खुरहंड।
वर्जन..
प्रोफेसर एवं वरिष्ठ डॉक्टर जब तक एमबीबीएस की कक्षाएं लेते रहते हैं तब तक उनके स्थान पर जूनियर रेजीडेंट इलाज करते हैं। साफ निर्देश हैं कि ओपीडी में आने वाला कोई मरीज बिना इलाज न लौटने पाए। कोई मरीज या तीमारदार शिकायत करता है तो संबंधित डॉक्टर के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। -डॉ. मुकेश कुमार यादव, प्राचार्य, रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज, बांदा।
पंकज

त्वचा रोग विभाग में खाली पड़ी डाक्टरों की कुर्सी।- फोटो : BANDA