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परिषदीय स्कूलों के बच्चों को भी टॉयलेट का टेंशन
Banda
Updated Wed, 10 Sep 2014 05:31 AM IST
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बांदा। परिषदीय विद्यालयों के ढाई लाख से ज्यादा बच्चों को टॉयलेट का टेंशन है। ग्राम पंचायत व बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा लाखों रुपये खर्च कर परिषदीय विद्यालयों में बनाए गए शौचालय ध्वस्त हैं। कहीं पानी की टंकी गायब है तो कहीं ताला न खुलने से शौचालय खराब हो गए। ग्राम पंचायत विभाग का कहना है कि उसने स्कूलों में शौचालय बनवा दिए हैं। अब रख-रखाव व सफाई का जिम्मा बेसिक शिक्षा विभाग का है। उधर, बेसिक शिक्षा विभाग ने ऐसे शौचालयों की सूची डीपीआरओ को भेजकर पल्ला झाड़ लिया है।
जिले में 1392 प्राथमिक और 641 उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं। वर्ष 2006 के पहले ग्राम पंचायतों ने सभी स्कूलों में टॉयलेट बनवाए थे। ग्रामीण क्षेत्रों के शौचालयों में 10 हजार और नगर क्षेत्र के स्कूलों में 24 हजार रुपये खर्च दिखाया गया। बाद में बेसिक शिक्षा विभाग ने नए भवनों के साथ शौचालय बनवाए। इन पर लाखों रुपये खपाए गए। टॉयलेट की छतों पर पानी की टंकियां रखाकर हैंडपंपों से कनेक्शन जोड़ा गया। व्यवस्था है कि छात्र जितना हैंडपंप चलाएंगे, उसका आधा पानी टंकी में अपने-आप पहुंचेगा, लेकिन छतों से पानी की टंकियां नदारद हो गईं। 2000 से ज्यादा इन परिषदीय स्कूलों में शायद ही किसी में शौचालय व टॉयलेट चालू हालत में हों। बेसिक शिक्षा विभाग जिला समन्वयक रमाशंकर मिश्रा ने बताया कि ध्वस्त या निष्प्रोज्य शौचालय की सूची एबीएसए द्वारा डीपीआरओ को भेजी जाती है। उधर, डीपीआरओ कार्यालय में संबंधित लिपिक मनोज कुमार का कहना है कि बेसिक शिक्षा विभाग उनके विभाग पर जबरन जिम्मेदारी थोप रहा है। विभाग की जिम्मेदारी तेरहवें वित्त आयोग के पैसे से शौचालय बनवाने की थी। अब देखरेख की जिम्मेदारी प्रधानाध्यापकों की है। इसके लिए टीएलएम का पैसा भी आाता है।
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सफाई कर्मी व प्रधानाध्यापक लापरवाह
प्रत्येक गांवों में सार्वजनिक स्थल व विद्यालयों की सफाई को पंचायतीराज विभाग ने कर्मचारी तैनात किए हैं। उन्हें हर माह बतौर वेतन मोटी रकम दी जा रही है। फिर भी शौचालय गंदगी से पटे हैं। इनकी सफाई में ग्राम प्रधान व प्रधानाध्यापकों की जरा भी रुचि नहीं हैं। गंदगी से छात्र-छात्राएं इनका प्रयोग नहीं करते। खंड शिक्षा अधिकारी रामसजीवन यादव ने बताया कि सफाईकर्मी टायलेट व शौचालय की सफाई करने आते ही नहीं हैं।
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ब्लाकवार ध्वस्त टायलेट
महुआ ब्लाक के 16, बड़ोखर ब्लाक के 27, नरैनी में सबसे ज्यादा 35, तिंदवारी में 21, जसपुरा 19, बबेरू 13, कमासिन ब्लाक में 9 स्कूलों के टायलेट निष्प्रयोज्य हैं। नगर क्षेत्र के 80 विद्यालयों में 33 के शौचालय बंद हैं या जर्जर होकर बेकार हो गए हैं। 206 प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्कूलों में बने शौचालयों के कभी ताले ही नहीं खुले। चाभी गुरुजनों के पास है।
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बेकार पड़े शौचालयों की मरम्मत के लिए खंड शिक्षा अधिकारियों द्वारा सूची डीपीआरओ कार्यालय भेजी जाती है। 10 जून को सीडीओ ने नरैनी व कमासिन के खराब शौचालयों को दुरुस्त कराने के लिए डीपीआरओ को निर्देशित किया था। वहां से एडीओ पंचायत को जिम्मेदारी सौंप दी गई। सप्ताह भर की मोहलत दी गई थी, लेकिन आज तक दुरुस्त नहीं हुए।
सत्यनारायण, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी
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ग्राम पंचायतों से आठ साल पूर्व टॉयलेट बनवाए गए थे। उनके रख-रखाव व मरम्मत की जिम्मेदारी बेसिक शिक्षा विभाग की है। लेकिन मरम्मत के लिए यहां सूची भेज दी जाती है। फिर भी एडीओ पंचायत को निर्देशित किया गया है।
सुरेश कुमार धुरिया, प्रभारी डीपीआरओ
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जिले में 1392 प्राथमिक और 641 उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं। वर्ष 2006 के पहले ग्राम पंचायतों ने सभी स्कूलों में टॉयलेट बनवाए थे। ग्रामीण क्षेत्रों के शौचालयों में 10 हजार और नगर क्षेत्र के स्कूलों में 24 हजार रुपये खर्च दिखाया गया। बाद में बेसिक शिक्षा विभाग ने नए भवनों के साथ शौचालय बनवाए। इन पर लाखों रुपये खपाए गए। टॉयलेट की छतों पर पानी की टंकियां रखाकर हैंडपंपों से कनेक्शन जोड़ा गया। व्यवस्था है कि छात्र जितना हैंडपंप चलाएंगे, उसका आधा पानी टंकी में अपने-आप पहुंचेगा, लेकिन छतों से पानी की टंकियां नदारद हो गईं। 2000 से ज्यादा इन परिषदीय स्कूलों में शायद ही किसी में शौचालय व टॉयलेट चालू हालत में हों। बेसिक शिक्षा विभाग जिला समन्वयक रमाशंकर मिश्रा ने बताया कि ध्वस्त या निष्प्रोज्य शौचालय की सूची एबीएसए द्वारा डीपीआरओ को भेजी जाती है। उधर, डीपीआरओ कार्यालय में संबंधित लिपिक मनोज कुमार का कहना है कि बेसिक शिक्षा विभाग उनके विभाग पर जबरन जिम्मेदारी थोप रहा है। विभाग की जिम्मेदारी तेरहवें वित्त आयोग के पैसे से शौचालय बनवाने की थी। अब देखरेख की जिम्मेदारी प्रधानाध्यापकों की है। इसके लिए टीएलएम का पैसा भी आाता है।
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सफाई कर्मी व प्रधानाध्यापक लापरवाह
प्रत्येक गांवों में सार्वजनिक स्थल व विद्यालयों की सफाई को पंचायतीराज विभाग ने कर्मचारी तैनात किए हैं। उन्हें हर माह बतौर वेतन मोटी रकम दी जा रही है। फिर भी शौचालय गंदगी से पटे हैं। इनकी सफाई में ग्राम प्रधान व प्रधानाध्यापकों की जरा भी रुचि नहीं हैं। गंदगी से छात्र-छात्राएं इनका प्रयोग नहीं करते। खंड शिक्षा अधिकारी रामसजीवन यादव ने बताया कि सफाईकर्मी टायलेट व शौचालय की सफाई करने आते ही नहीं हैं।
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ब्लाकवार ध्वस्त टायलेट
महुआ ब्लाक के 16, बड़ोखर ब्लाक के 27, नरैनी में सबसे ज्यादा 35, तिंदवारी में 21, जसपुरा 19, बबेरू 13, कमासिन ब्लाक में 9 स्कूलों के टायलेट निष्प्रयोज्य हैं। नगर क्षेत्र के 80 विद्यालयों में 33 के शौचालय बंद हैं या जर्जर होकर बेकार हो गए हैं। 206 प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्कूलों में बने शौचालयों के कभी ताले ही नहीं खुले। चाभी गुरुजनों के पास है।
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बेकार पड़े शौचालयों की मरम्मत के लिए खंड शिक्षा अधिकारियों द्वारा सूची डीपीआरओ कार्यालय भेजी जाती है। 10 जून को सीडीओ ने नरैनी व कमासिन के खराब शौचालयों को दुरुस्त कराने के लिए डीपीआरओ को निर्देशित किया था। वहां से एडीओ पंचायत को जिम्मेदारी सौंप दी गई। सप्ताह भर की मोहलत दी गई थी, लेकिन आज तक दुरुस्त नहीं हुए।
सत्यनारायण, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी
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ग्राम पंचायतों से आठ साल पूर्व टॉयलेट बनवाए गए थे। उनके रख-रखाव व मरम्मत की जिम्मेदारी बेसिक शिक्षा विभाग की है। लेकिन मरम्मत के लिए यहां सूची भेज दी जाती है। फिर भी एडीओ पंचायत को निर्देशित किया गया है।
सुरेश कुमार धुरिया, प्रभारी डीपीआरओ