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कम है वक्त, पर सरकार नहीं कर रही रहम !

Thu, 02 May 2013 05:30 AM IST
Banda
Banda Updated Thu, 02 May 2013 05:30 AM IST
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रशीद सिद्दीकी
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बांदा। स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस पर अक्सर प्रदेश सरकारें जेल में बंद उम्रदराज बूढ़े बंदियों की रिहाई की घोषणाएं करते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार भी इसमें शामिल है, लेकिन इन घोषणाओं की हकीकत जानने के लिए बांदा जेल बानगी के रूप में काफी है। यहां 70 से 80 बरस तक के बेहद बूढ़े 10 से ज्यादा बंदी कई-कई वर्षों से कैद हैं। उनकी रिहाई के लिए सरकार से लेकर स्वयंसेवी संगठन तक सुध नहीं ले रहे। इनमें से कई बंदी बीमार हो गए हैं। उनकी हालत देखकर कहा जा सकता है कि कम है वक्त पर सरकार रहम नहीं कर रही!
फिल्म अभिनेता संजय दत्त को सजा हुई तो उनकी वकालत और बचाव के लिए चौतरफा मांगे गूंज उठीं, लेकिन गरीब व्यक्ति से कोई गलती हुई तो इस पर रहम करने वाले नजर नहीं आते। बांदा जेल इसकी मिसाल है। इस जेल में 70 से 83 वर्ष उम्र के लगभग 12 कैदी हैं। यह विभिन्न अपराधों में नामजद होकर विचाराधीन या सजायाफ्ता बंदी के रूप में जेल में जीवन बिता रहे हैं। इनमें तीन बंदी उम्र कैद की सजा काट रहे हैं। इनमें एक बंदी 83 वर्ष, दूसरा बंदी 80 और तीसरा बंदी 74 वर्ष का है। बूढ़े और जर्जर जिस्म वाले यह बंदी जेल में बीमारियों से भी जूझ रहे हैं। कोई उनकी तीमारदारी या देखरेख करने वाला नहीं है। जेल में इन दिनों 1052 बंदी हैं जबकि जेल की क्षमता मात्र 560 बंदियों की है। बूढ़ों के अलावा 52 महिलाएं और छह बेगुनाह बच्चे भी जेल में हैं। जेल में उम्रदराज (बूढ़े) बंदियों की तादाद 61 है। इनमें 60 से 65 वर्ष उम्र के 31 बंदी, 65 से 75 वर्ष के 24 और उसके ऊपर 85 साल के छह बंदी शामिल हैं। 70 साल की उम्र पार कर चुके सजायाफ्ता बूढ़े कैदियों की संख्या सात है। इसके अलावा छह विचाराधीन बूढ़े बंदी हैं।
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घोषणाओं का क्या है, हवाहवाई! 70-80 बरस के तमाम बंदी बांट जोट रहे रिहाई की
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कम है वक्त, पर सरकार नहीं कर रही रहम!
क्रासर
बांदा जेल में 61 बंदी है 70 की उमर पार
कई बूढ़े बंदी हुए बीमार, नहीं कोई तीमारदार
अमर उजाला ब्यूरो
बांदा। स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस पर अक्सर प्रदेश सरकारें जेल में बंद उम्रदराज बूढ़े बंदियों की रिहाई की घोषणाएं करते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार भी इसमें शामिल है, लेकिन इन घोषणाओं की हकीकत जानने के लिए बांदा जेल बानगी के रूप में काफी है। यहां 70 से 80 बरस तक के बेहद बूढ़े 10 से ज्यादा बंदी कई-कई वर्षों से कैद हैं। उनकी रिहाई के लिए सरकार से लेकर स्वयंसेवी संगठन तक सुध नहीं ले रहे। इनमें से कई बंदी बीमार हो गए हैं। उनकी हालत देखकर कहा जा सकता है कि कम है वक्त पर सरकार रहम नहीं कर रही!
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फिल्म अभिनेता संजय दत्त को सजा हुई तो उनकी वकालत और बचाव के लिए चौतरफा मांगे गूंज उठीं, लेकिन गरीब व्यक्ति से कोई गलती हुई तो इस पर रहम करने वाले नजर नहीं आते। बांदा जेल इसकी मिसाल है। इस जेल में 70 से 83 वर्ष उम्र के लगभग 12 कैदी हैं। यह विभिन्न अपराधों में नामजद होकर विचाराधीन या सजायाफ्ता बंदी के रूप में जेल में जीवन बिता रहे हैं। इनमें तीन बंदी उम्र कैद की सजा काट रहे हैं। इनमें एक बंदी 83 वर्ष, दूसरा बंदी 80 और तीसरा बंदी 74 वर्ष का है। बूढ़े और जर्जर जिस्म वाले यह बंदी जेल में बीमारियों से भी जूझ रहे हैं। कोई उनकी तीमारदारी या देखरेख करने वाला नहीं है। जेल में इन दिनों 1052 बंदी हैं जबकि जेल की क्षमता मात्र 560 बंदियों की है। बूढ़ों के अलावा 52 महिलाएं और छह बेगुनाह बच्चे भी जेल में हैं। जेल में उम्रदराज (बूढ़े) बंदियों की तादाद 61 है। इनमें 60 से 65 वर्ष उम्र के 31 बंदी, 65 से 75 वर्ष के 24 और उसके ऊपर 85 साल के छह बंदी शामिल हैं। 70 साल की उम्र पार कर चुके सजायाफ्ता बूढ़े कैदियों की संख्या सात है। इसके अलावा छह विचाराधीन बूढ़े बंदी हैं।

वरिष्ठ जेल अधीक्षक संतोष कुमार श्रीवास्तव का कहना है कि उम्र दराज बूढ़े बंदियों को रिहा करने संबंधी शासन के कोई आदेश नहीं मिले हैं। सजायाफ्ता बंदियों को उनकी सजा की अवधि पूरी होने रिहाई होती है। शासन से मुकदमा/सजा माफ कर दिए जाने पर भी रिहाई हो सकती है। उन्होंने कहा कि बूढ़े बंदियों पर जेल में पूरा ध्यान दिया जा रहा है। उनकी देखरेख की जाती है। बीमार होने पर उनका इलाज होता है। उनसे कोई काम नहीं लिया जाता। न ही सख्ती की जाती है। अधीक्षक बोले-बाकी भगवान के हाथ में है।
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