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कृषि विवि का पानी जहरीला
Updated Sat, 08 Sep 2018 11:36 PM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
बांदा। बुंदेलखंड में सतही जल के साथ पाताली पानी भी जहरीला हो रहा है। यह खेत और पेट दोनों के लिए ही नुकसानदेह है। पानी में यह जहर कहीं और नहीं बल्कि कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में है। यहां पाताली पानी में सोडियम और फ्लोराइड की मात्रा मानक से ज्यादा पाई गई है। यह खुलासा केंद्रीय भूजल बोर्ड, लखनऊ की रिपोर्ट से हुआ है। बोर्ड ने यहां के पानी की जांच पड़ताल की है।
कृषि विकास को लेकर विश्वविद्यालय द्वारा उत्पादन बढ़ाने से लेकर नए-नए बीजों पर शोध किया जा रहा है। किसानों को फसल बढ़ाने के नए तौर तरीके बताए जा रहे हैं। इसके लिए कई एकड़ में खेती हो रही है लेकिन परिसर का पानी मानक पर खरा नहीं उतर रहा। हाल ही में यहां के कुआं, बोरवेल व नलकूप के पानी के चार नमूने जांच के लिए जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय, भारत सरकार के लखनऊ स्थित केंद्रीय भूमि जल बोर्ड भेजे गए थे। वहां से अब रिपोर्ट आ गई है। यह चौंकाने वाली है।
विवि के भूमिगत जल में सोडियम तीन गुना ज्यादा पाया गया है। फ्लोराइड की मात्रा भी मानक से अधिक है। इन तत्वों के बढ़े होने से पानी न तो पीने लायक है और न इससे खेती की जा सकती है। कृषि विश्वविद्यालय के मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन के सहायक प्राध्यापक डॉ. अमित मिश्रा ने बताया कि सोडियम की मात्रा तीन गुना बढ़ गई है। अधिक सोडियम युक्त पानी से सिंचाई करने पर मृदा क्षारीय (खारी) हो जाती है। इसी तरह फ्लोराइड शरीर के लिए नुकसान ायक है। इसके मानक से ज्यादा होने पर हड्डी व दांतों की बीमारी हो जाती है।
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कृषि विश्वविद्यालय के भूमिगत जल की जांच में सोडियम व फ्लोराइड की मात्रा मानक से ज्यादा होने पर सिंचाई व पीने के लिए केन नदी से विश्वविद्यालय तक नहर का निर्माण कराया जा रहा है। नीति आयोग इसे मंजूरी दे चुका है। लगभग 18 करोड़ रुपये लागत आएगी। बारिश के बाद पानी के नमूने फिर जांच के लिए केंद्रीय भूमि जल बोर्ड को भेजे जाएंगे। ताकि बारिश के बाद की स्थिति का पता चले।
- डॉ. एसएल गोस्वामी, कुलपति
कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, बांदा
बांदा। फूड एग्रीकल्चर आर्गनाईजेशन (एफएओ) के मानक के मुताबिक सिंचाई वाले पानी में सोडियम की मात्रा 207 मिलीग्राम प्रति लीटर होना चाहिए। लेकिन यहां यह 638.5 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंच चुका है। ऐसे पानी से सिंचाई करने पर भूमि बंजर हो सकती है। फसलों का उत्पादन भी नहीं होता। फ्लोराइड का मानक 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर है। जबकि विवि के पानी में 1.83 मिलीग्राम पाया गया है।
कृषि विश्वविद्यालय की मिट्टी क्षारीय है। इसका पोटेंशियल हाइड्रोजन (पीएच) 8.5 है। इसे आठ से अधिक नहीं होना चाहिए। मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन के सहायक प्राध्यापक बताते हैं कि यदि भूमिगत जल से सिंचाई की जाए तो मिटटी का पीएच और बढ़ जाएगा। इससे जमीन की उत्पादकता और स्वास्थ्य दोनों खराब होंगे। यहां मिटटी में 0.27 कार्बनिक कार्बन है। जो बहुत कम है। बताया कि मिटटी में सुधार के प्रयास विश्वविद्यालय द्वारा किए जा रहे हैं। विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. बीके गुप्ता ने बताया कि तालाबों में बारिश का पानी संरक्षित करके पिछले सीजन में उसी से सिंचाई का काम पूरा किया गया है।
-केंद्रीय भूमि जल बोर्ड की जांच में हुआ खुलासा
-तीन गुना बढ़ा सोडियम, फ्लोराइड की मात्रा भी ज्यादा
-पाताली पानी की पड़ताल पर चौंकाने वाली रिपोर्ट
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बांदा। बुंदेलखंड में सतही जल के साथ पाताली पानी भी जहरीला हो रहा है। यह खेत और पेट दोनों के लिए ही नुकसानदेह है। पानी में यह जहर कहीं और नहीं बल्कि कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में है। यहां पाताली पानी में सोडियम और फ्लोराइड की मात्रा मानक से ज्यादा पाई गई है। यह खुलासा केंद्रीय भूजल बोर्ड, लखनऊ की रिपोर्ट से हुआ है। बोर्ड ने यहां के पानी की जांच पड़ताल की है।
कृषि विकास को लेकर विश्वविद्यालय द्वारा उत्पादन बढ़ाने से लेकर नए-नए बीजों पर शोध किया जा रहा है। किसानों को फसल बढ़ाने के नए तौर तरीके बताए जा रहे हैं। इसके लिए कई एकड़ में खेती हो रही है लेकिन परिसर का पानी मानक पर खरा नहीं उतर रहा। हाल ही में यहां के कुआं, बोरवेल व नलकूप के पानी के चार नमूने जांच के लिए जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय, भारत सरकार के लखनऊ स्थित केंद्रीय भूमि जल बोर्ड भेजे गए थे। वहां से अब रिपोर्ट आ गई है। यह चौंकाने वाली है।
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विवि के भूमिगत जल में सोडियम तीन गुना ज्यादा पाया गया है। फ्लोराइड की मात्रा भी मानक से अधिक है। इन तत्वों के बढ़े होने से पानी न तो पीने लायक है और न इससे खेती की जा सकती है। कृषि विश्वविद्यालय के मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन के सहायक प्राध्यापक डॉ. अमित मिश्रा ने बताया कि सोडियम की मात्रा तीन गुना बढ़ गई है। अधिक सोडियम युक्त पानी से सिंचाई करने पर मृदा क्षारीय (खारी) हो जाती है। इसी तरह फ्लोराइड शरीर के लिए नुकसान ायक है। इसके मानक से ज्यादा होने पर हड्डी व दांतों की बीमारी हो जाती है।
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कृषि विश्वविद्यालय के भूमिगत जल की जांच में सोडियम व फ्लोराइड की मात्रा मानक से ज्यादा होने पर सिंचाई व पीने के लिए केन नदी से विश्वविद्यालय तक नहर का निर्माण कराया जा रहा है। नीति आयोग इसे मंजूरी दे चुका है। लगभग 18 करोड़ रुपये लागत आएगी। बारिश के बाद पानी के नमूने फिर जांच के लिए केंद्रीय भूमि जल बोर्ड को भेजे जाएंगे। ताकि बारिश के बाद की स्थिति का पता चले।
- डॉ. एसएल गोस्वामी, कुलपति
कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, बांदा
बांदा। फूड एग्रीकल्चर आर्गनाईजेशन (एफएओ) के मानक के मुताबिक सिंचाई वाले पानी में सोडियम की मात्रा 207 मिलीग्राम प्रति लीटर होना चाहिए। लेकिन यहां यह 638.5 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंच चुका है। ऐसे पानी से सिंचाई करने पर भूमि बंजर हो सकती है। फसलों का उत्पादन भी नहीं होता। फ्लोराइड का मानक 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर है। जबकि विवि के पानी में 1.83 मिलीग्राम पाया गया है।
कृषि विश्वविद्यालय की मिट्टी क्षारीय है। इसका पोटेंशियल हाइड्रोजन (पीएच) 8.5 है। इसे आठ से अधिक नहीं होना चाहिए। मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन के सहायक प्राध्यापक बताते हैं कि यदि भूमिगत जल से सिंचाई की जाए तो मिटटी का पीएच और बढ़ जाएगा। इससे जमीन की उत्पादकता और स्वास्थ्य दोनों खराब होंगे। यहां मिटटी में 0.27 कार्बनिक कार्बन है। जो बहुत कम है। बताया कि मिटटी में सुधार के प्रयास विश्वविद्यालय द्वारा किए जा रहे हैं। विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. बीके गुप्ता ने बताया कि तालाबों में बारिश का पानी संरक्षित करके पिछले सीजन में उसी से सिंचाई का काम पूरा किया गया है।
-केंद्रीय भूमि जल बोर्ड की जांच में हुआ खुलासा
-तीन गुना बढ़ा सोडियम, फ्लोराइड की मात्रा भी ज्यादा
-पाताली पानी की पड़ताल पर चौंकाने वाली रिपोर्ट