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UP: यहां हांफते रहे हाथी और साइकिल सवार... वोट बटोर कर भी नहीं मिली जीत, साख पर भी लगा बट्टा; ऐसा है समीकरण

Thu, 25 Apr 2024 09:35 AM IST
शाहरुख खान संजय तिवारी, अमर उजाला, बलरामपुर
संजय तिवारी, अमर उजाला, बलरामपुर Published by: शाहरुख खान Updated Thu, 25 Apr 2024 09:35 AM IST
सार

सपा व बसपा को वोट बटोर कर भी जीत नहीं मिली। साख पर भी बट्टा लग गया। सियासत में बदले दांवपेच में दलों की मुश्किलें बढ़ी रहीं हैं। साख कायम रखने में भी झटका मिला, तो वोट बढ़ने पर भी जीत से दूरी रही।

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UP Lok Sabha Election SP BSP not win in Devipatan division despite gathering votes reputation also tarnished
UP Lok Sabha Election 2024 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देवीपाटन मंडल के मतदाताओं के फैसले से पार्टियों की मुश्किलें बढ़ती रही हैं। समय-समय पर पार्टियों पर प्यार लुटाया और वोटों की बारिश से मत प्रतिशत भी बढ़ाया। कुछ को जीत का मुंह भी नहीं देखने दिया। गोंडा हो या फिर कैसरगंज, सपा व बसपा को वोट खूब मिले। इसके बाद भी सपा 2009 के बाद कभी जीत नहीं सकी। 
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नए परिसीमन के बाद बनी सीट पर बसपा की दाल तब भी नहीं गली जब सपा का साथ रहा। यह अलग बात रही कि वोट जरूर पहले की अपेक्षा अधिक मिला। इसी तरह श्रावस्ती में भाजपा के साथ हुआ। इस बार भी जनता पूरे मूड से सियासी पैतरों पर आंख गड़ाए है।
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नए परिसीमन के बाद अयोध्या के तटवर्ती गोंडा संसदीस सीट में बलरामपुर जिले की उतरौला के साथ ही गोंडा के मनकापुर, गौरा, सदर और मेहनौन शामिल हैं। पहले कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता था। रामलहर 1991 से भाजपा मजबूत हुई और मोदी लहर तक मजबूती कायम रही। 
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दस सालों में 40 फीसदी तक भाजपा बढ़ी, वहीं सपा का मत प्रतिशत भी 2009 के बाद बढ़ा। 2009 में सपा को 14 फीसदी मत मिले। 2014 में यह बढ़कर 22 फीसदी तक पहुंच गया। 2019 में तो मत प्रतिशत बढ़कर 37 फीसदी हो गया। इसके बाद भी सपा तीनों बार चुनाव जीत नहीं सकी। 

इसी तरह श्रावस्ती में 2009 में सपा ने 18 फीसदी से छलांग लगाकर 28 फीसदी मत हासिल किया। इसके बाद भी आज तक यहां से पार्टी जीत हासिल नहीं कर सकी। 2019 में गठबंधन में बसपा के खाते में सीट मिली। इस बार सपा कांग्रेस के साथ मैदान में है।

 

कैसरगंज में सपा 2009 में 28.3 फीसदी मत पाकर जीती थी। 2014 में यह बढ़कर 39.5 फीसदी तक पहुंचा, लेकिन जीत का रथ थम गया। 2019 में यह सीट बसपा के खाते में गई। गठबंधन को 47.6 फीसदी मत तो मिले, लेकिन जीत नहीं मिल सकी। 


 

बहराइच में 2009 के चुनाव में कांग्रेस को जीत मिली थी। उस समय सपा को 32.7 फीसदी मत मिले थे, जो 2014 में बढ़कर 37.6 फीसदी हो गए। 2019 में भी ग्राफ 42.4 फीसदी तक पहुंच गया। दोनों बार सपा जीत का स्वाद नहीं चख सकी। वोट बटोरने में सफल होने के बाद भी उसे हार का मुंह देखना पड़ा।

बसपा को 15 वर्षों में सिर्फ एक सीट पर एक बार मिल सकी जीत
मंडल की चारों सीटों पर कई दांवपेच के बाद भी बसपा की साख पर बट्टा लगा। 2009 में तो बसपा ने चारों सीटों पर चुनाव लड़ा। एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं कर सकी। उस समय गोंडा, श्रावस्ती, बहराइच पर कांग्रेस तो कैसरगंज में सपा को जीत मिली थी।

2014 में मंडल की चारों सीटों पर भाजपा का परचम लहराया था। 2019 में भाजपा को श्रावस्ती सीट गंवानी पड़ी थी। यहां पर पहली बार बसपा ने जीत हासिल कर रिकॉर्ड बनाया। ऐसा तब था जब मंडल के मतों के समीकरण में बसपा की धमक कायम थी।

 

भाजपा को टक्कर देने में सपा चल रही सधी चाल
मंडल के सीटों पर अपने प्रदर्शन को देखते हुए सपा ने भाजपा को चुनौती देने के लिए सधी चाल चली है। हर चुनाव में मत प्रतिशत बढ़ाने के सिलसिले को कायम रखने के लिए टिकट बंटवारे में समीकरण पर जोर दिया है। मंडल की तीन सीटों पर ही भाजपा व सपा ने प्रत्याशी तय किया है।

भाजपा ने तो एक पर क्षत्रिय, एक ब्राह्मण व एक अनुसूचित वर्ग का प्रत्याशी उतारा है, वहीं सपा ने एक सुरक्षित सीट पर अनुसूचित के साथ ही दो सीटों पर पिछडे वर्ग को मौका दिया है।

इससे पिछड़े, अल्पसंख्यक के साथ ही अनुसूचित वर्ग के वोटों को साधने की कोशिश है, वहीं मंडल में एक मात्र महिला प्रत्याशी सपा ने उतारा है। इस तरह मंडल का सियासी रण समीकरण के दांवपेच से खिला हुआ है।
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