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Balrampur News: विलासिता नहीं, संयम और सादगी में ही सच्चे सुख की राह
Sun, 13 Sep 2026 11:08 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
Updated Sun, 13 Sep 2026 11:08 PM IST
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फोटो-20-बलरामपुर के जैन मंदिर में मौजूद श्रद्धालु ।-स्रोत : संगठन
बलरामपुर। पर्युषण पर्व के छठे दिन रविवार को जैन समाज ने संयम दिवस के रूप में मनाया। शहर स्थित जैन सभा भवन में आयोजित कार्यक्रम में श्रद्धालुओं को त्याग, तपस्या, आत्मशुद्धि और संयमित जीवन का महत्व बताया गया। प्रवचन में कहा गया कि धन और वैभव जीवन में सुविधाएं दे सकते हैं, लेकिन मन की वास्तविक शांति संयम, संतोष और सादगी से ही मिलती है।
प्रवचन में श्रावक ने जिनवाणी का सार समझाते हुए कहा कि जीवन में धन-संपत्ति और वैभव का होना सौभाग्य की बात है, लेकिन मनुष्य को इन सुविधाओं का दास नहीं बनना चाहिए। जरूरत और विलासिता के बीच अंतर समझना आवश्यक है। जब इच्छाएं जरूरतों से बड़ी हो जाती हैं, तो सुख-सुविधाएं ही मन की बेचैनी का कारण बनने लगती हैं।
उन्होंने कहा कि संयम केवल खान-पान या रहन-सहन तक सीमित नहीं है। विचारों, व्यवहार, भावनाओं और इच्छाओं पर नियंत्रण रखना भी संयम का हिस्सा है। व्यक्ति जब क्रोध, अहंकार, लोभ और अनावश्यक इच्छाओं पर विजय पाने का प्रयास करता है, तभी आत्मशुद्धि की वास्तविक शुरुआत होती है।
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श्रावक ने कहा कि सादगी का अर्थ सुखों से दूर भागना नहीं, बल्कि सुख-सुविधाओं के बीच रहते हुए भी उनके प्रति आसक्त न होना है। धन और वैभव का सही मूल्य तभी है, जब उनका उपयोग जरूरतमंदों की मदद और समाज के कल्याण में किया जाए। कार्यक्रम में श्रद्धालुओं ने प्रवचन सुना और सादगी, संतोष, आत्मचिंतन तथा संयम के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
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प्रवचन में श्रावक ने जिनवाणी का सार समझाते हुए कहा कि जीवन में धन-संपत्ति और वैभव का होना सौभाग्य की बात है, लेकिन मनुष्य को इन सुविधाओं का दास नहीं बनना चाहिए। जरूरत और विलासिता के बीच अंतर समझना आवश्यक है। जब इच्छाएं जरूरतों से बड़ी हो जाती हैं, तो सुख-सुविधाएं ही मन की बेचैनी का कारण बनने लगती हैं।
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उन्होंने कहा कि संयम केवल खान-पान या रहन-सहन तक सीमित नहीं है। विचारों, व्यवहार, भावनाओं और इच्छाओं पर नियंत्रण रखना भी संयम का हिस्सा है। व्यक्ति जब क्रोध, अहंकार, लोभ और अनावश्यक इच्छाओं पर विजय पाने का प्रयास करता है, तभी आत्मशुद्धि की वास्तविक शुरुआत होती है।
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श्रावक ने कहा कि सादगी का अर्थ सुखों से दूर भागना नहीं, बल्कि सुख-सुविधाओं के बीच रहते हुए भी उनके प्रति आसक्त न होना है। धन और वैभव का सही मूल्य तभी है, जब उनका उपयोग जरूरतमंदों की मदद और समाज के कल्याण में किया जाए। कार्यक्रम में श्रद्धालुओं ने प्रवचन सुना और सादगी, संतोष, आत्मचिंतन तथा संयम के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।