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Balrampur News: ईको टूरिज्म से सोहेलवा को मिलेगा नया मुकाम

Tue, 16 Jan 2024 11:53 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर Updated Tue, 16 Jan 2024 11:53 PM IST
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Sohelwa will get a new place through eco tourism
बलरामपुर। ईको टूरिज्म के आधार पर सुहेलवा वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र को विकसित कर एक नया मुकाम दिया जाएगा। इसके लिए चितौड़गढ़ बांध खंड के अधिकारियों को संपदा सर्वे रिपोर्ट के आधार पर विशेष कार्ययोजना तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। डीएम अरविंद सिंह ने बताया कि इसका उद्देश्य पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ ही इलाके के लोगों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाना है।
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भारत-नेपाल अंत राष्ट्रीय सीमा पर स्थित सुहेलवा को 1988 में वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया था। 452 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैला यह अभयारण्य क्षेत्र शीशम, खैर, सागौन (सागौन), आसना, जामुन, हल्दू, फल्दू, धमिना, झिंगन और बहेरा पेड़ों से ढका हुआ है। अभयारण्य में पाए जाने वाले जीवों में तेंदुआ, बाघ, भालू, जंगली बिल्ली, जंगली सूअर सहित विभिन्न प्रजातियों के पक्षी शामिल हैं। प्राकृतिक दृश्यों के स्वरूप एवं सुंदरता के कारण यह अभयारण्य उन महत्वपूर्ण स्थानों में से एक है जहां जैव विविधता से समृद्ध भाभेर-तराई इको-सिस्टम क्षेत्र आसानी से विकसित हो सकता है।
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अभयारण्य क्षेत्र में वन विभाग की तुलसीपुर, बरहवा, बनकटवा, पूर्वी सोहेलवा और पश्चिमी सोहेलवा सहित पांच रेंज है। इसके साथ ही 220 वर्ग किमी बफर जोन है जो भाबर और रामपुर रेंज में विभाजित है। क्षेत्र से सटी हुई हिमालय की शिवालिक पर्वतमाला है। प्रस्तावित कार्य योजना में इन्ही क्षेत्राें के विकास का खाका तैयार किया जाएगा।
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सोहेलवा वन्यजीव क्षेत्र में जीव जंतुओं व पक्षियों के साथ ही औषधीय पौद्यो की भी भरमार है। यहां की मुख्य वृक्ष प्रजातियां साल, असना, खैर, सागौन आदि हैं। इन प्रजातियों के साथ काला शीशम, जामुन, हल्दू, फल्दू, जिग्ना, हर्रा, बहेरा, रोहणी अन्य महत्वपूर्ण प्रजातियां हैं। अभयारण्य क्षेत्र में औषधीय पौधों के तहत सफेद मुसुली, काली मुसुली, पाइपर लोंगम, अधाटोडा वासिका, टीनोस्पोरा कार्डिफ़ोलिया, स्वर्टिया चिरायता, होलारहोएना एंटीडिसेंट्रिका, एकोरस कैलमस, लैंटाना कैमारा, निक्टेन्थेस आर्बोर्टिस्टिक, विथानिया सोम्निफेरा, राउवोल्फिया सर्पेंटिना, मुरैना कोएनिगी, एस्परैगस रेसमोसस, बबूल कॉन्सिना आदि के पौधे भी काफी संख्या में हैं।
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