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Balrampur News: न्यूरोलॉजिस्ट व पीडियाट्रिक सर्जन के अभाव में नवजात के इलाज पर संकट
Mon, 14 Sep 2026 11:08 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
Updated Mon, 14 Sep 2026 11:08 PM IST
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फोटो-18-बलरामपुर के जिला महिला अस्पताल में बना एसएनसीयू वार्ड ।-संवाद
बलरामपुर। जिला महिला अस्पताल के एसएनसीयू (स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट) में भर्ती होने वाले नवजातों को विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। अस्पताल में न्यूरोलॉजिस्ट और पीडियाट्रिक सर्जन की तैनाती न होने के कारण गंभीर स्थिति वाले नवजातों को बेहतर इलाज के लिए हायर सेंटर रेफर करना पड़ता है। बीते तीन माह में एसएनसीयू में भर्ती 622 नवजातों में से 60 को रेफर किया गया।
गंभीर स्थिति में जन्म लेने वाले बच्चों को बेहतर इलाज उपलब्ध कराने के लिए जिला महिला अस्पताल में 24 बेड का एसएनसीयू संचालित है। नवजातों की विशेष देखभाल के लिए यहां 24 घंटे चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मियों की तैनाती का दावा किया जाता है। समय से पहले जन्म लेने वाले, कम वजन, सांस लेने में परेशानी, संक्रमण सहित विभिन्न गंभीर समस्याओं से पीड़ित नवजातों को एसएनसीयू में भर्ती किया जाता है।
वार्ड में प्रारंभिक उपचार और निगरानी की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन जटिल मामलों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की जरूरत पड़ती है। ऐसे मामलों में चिकित्सक नवजातों को लखनऊ और बहराइच मेडिकल कॉलेज रेफर कर देते हैं। आंकड़ों के अनुसार, बीते तीन माह में 622 नवजात एसएनसीयू में भर्ती हुए। इनमें 60 की हालत गंभीर होने पर उन्हें रेफर करना पड़ा। पीडियाट्रिक सर्जरी, संदिग्ध हृदय संबंधी समस्या, बीमारी का पता न चलने और वेंटिलेशन की आवश्यकता के चलते इन नवजातों को हायर सेंटर भेजा गया।
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जन्मजात विकृतियों वाले नवजातों के इलाज के लिए अस्पताल में न्यूरोलॉजिस्ट और पीडियाट्रिक सर्जन की तैनाती नहीं है। जिला महिला अस्पताल के एसएनसीयू के नोडल अधिकारी एवं बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. महेश कुमार वर्मा ने बताया कि कम वजन, सांस लेने में परेशानी और अन्य समस्याओं वाले नवजातों को एसएनसीयू में भर्ती कर इलाज किया जाता है। कुछ नवजातों में जन्मजात विकृति या अन्य गंभीर समस्या सामने आने पर उन्हें रेफर करना पड़ता है, ताकि समय पर बेहतर इलाज मिलने से उनकी जान बचाई जा सके।
पिछले साल छह महीने में 106 नवजातों की हुई थी मौत
नवंबर 2025 में जिले में कॉमन रिव्यू मिशन (सीआरएम) के तहत केंद्रीय टीम ने जिला महिला अस्पताल का निरीक्षण किया था। टीम ने एसएनसीयू वार्ड का निरीक्षण कर स्वास्थ्य सुविधाओं का ब्योरा जुटाया था। जांच में सामने आया था कि अप्रैल 2025 से अक्तूबर 2025 तक एसएनसीयू में 106 नवजातों की मौत हुई थी। मौत का आंकड़ा सामने आने के बाद टीम ने चिकित्सा सेवाओं में सुधार के निर्देश दिए थे।
आग से बचाव के पर्याप्त इंतजाम नहीं
जिला महिला अस्पताल के प्रथम तल पर 24 बेड का एसएनसीयू संचालित है। वार्ड और अस्पताल में आग से बचाव के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। अस्पताल प्रशासन आपातस्थिति से निपटने के लिए सीओटू और एबीसी सिलिंडर उपलब्ध होने का दावा कर रहा है।
कम वजन, सांस लेने में परेशानी और अन्य समस्याओं वाले नवजातों को एसएनसीयू में भर्ती कर इलाज किया जाता है। कुछ नवजातों में जन्मजात विकृति या अन्य गंभीर समस्या सामने आने पर उन्हें रेफर करना पड़ता है, ताकि समय पर बेहतर इलाज मिलने से उनकी जान बचाई जा सके।
डॉ. महेश कुमार वर्मा, नोडल अधिकारी, एसएनसीयू, जिला महिला अस्पताल
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गंभीर स्थिति में जन्म लेने वाले बच्चों को बेहतर इलाज उपलब्ध कराने के लिए जिला महिला अस्पताल में 24 बेड का एसएनसीयू संचालित है। नवजातों की विशेष देखभाल के लिए यहां 24 घंटे चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मियों की तैनाती का दावा किया जाता है। समय से पहले जन्म लेने वाले, कम वजन, सांस लेने में परेशानी, संक्रमण सहित विभिन्न गंभीर समस्याओं से पीड़ित नवजातों को एसएनसीयू में भर्ती किया जाता है।
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वार्ड में प्रारंभिक उपचार और निगरानी की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन जटिल मामलों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की जरूरत पड़ती है। ऐसे मामलों में चिकित्सक नवजातों को लखनऊ और बहराइच मेडिकल कॉलेज रेफर कर देते हैं। आंकड़ों के अनुसार, बीते तीन माह में 622 नवजात एसएनसीयू में भर्ती हुए। इनमें 60 की हालत गंभीर होने पर उन्हें रेफर करना पड़ा। पीडियाट्रिक सर्जरी, संदिग्ध हृदय संबंधी समस्या, बीमारी का पता न चलने और वेंटिलेशन की आवश्यकता के चलते इन नवजातों को हायर सेंटर भेजा गया।
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जन्मजात विकृतियों वाले नवजातों के इलाज के लिए अस्पताल में न्यूरोलॉजिस्ट और पीडियाट्रिक सर्जन की तैनाती नहीं है। जिला महिला अस्पताल के एसएनसीयू के नोडल अधिकारी एवं बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. महेश कुमार वर्मा ने बताया कि कम वजन, सांस लेने में परेशानी और अन्य समस्याओं वाले नवजातों को एसएनसीयू में भर्ती कर इलाज किया जाता है। कुछ नवजातों में जन्मजात विकृति या अन्य गंभीर समस्या सामने आने पर उन्हें रेफर करना पड़ता है, ताकि समय पर बेहतर इलाज मिलने से उनकी जान बचाई जा सके।
पिछले साल छह महीने में 106 नवजातों की हुई थी मौत
नवंबर 2025 में जिले में कॉमन रिव्यू मिशन (सीआरएम) के तहत केंद्रीय टीम ने जिला महिला अस्पताल का निरीक्षण किया था। टीम ने एसएनसीयू वार्ड का निरीक्षण कर स्वास्थ्य सुविधाओं का ब्योरा जुटाया था। जांच में सामने आया था कि अप्रैल 2025 से अक्तूबर 2025 तक एसएनसीयू में 106 नवजातों की मौत हुई थी। मौत का आंकड़ा सामने आने के बाद टीम ने चिकित्सा सेवाओं में सुधार के निर्देश दिए थे।
आग से बचाव के पर्याप्त इंतजाम नहीं
जिला महिला अस्पताल के प्रथम तल पर 24 बेड का एसएनसीयू संचालित है। वार्ड और अस्पताल में आग से बचाव के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। अस्पताल प्रशासन आपातस्थिति से निपटने के लिए सीओटू और एबीसी सिलिंडर उपलब्ध होने का दावा कर रहा है।
कम वजन, सांस लेने में परेशानी और अन्य समस्याओं वाले नवजातों को एसएनसीयू में भर्ती कर इलाज किया जाता है। कुछ नवजातों में जन्मजात विकृति या अन्य गंभीर समस्या सामने आने पर उन्हें रेफर करना पड़ता है, ताकि समय पर बेहतर इलाज मिलने से उनकी जान बचाई जा सके।
डॉ. महेश कुमार वर्मा, नोडल अधिकारी, एसएनसीयू, जिला महिला अस्पताल