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Balrampur News: समाज को दिशा देती हैं बेकल उत्साही की रचनाएं
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बलरामपुर। पद्मश्री बेकल उत्साही की रचनाएं समाज को नई दिशा देती हैं। उन्होंने आम आदमी से जुड़े मुद्दों से लेकर हर एक मुद्दे पर रचनाएं लिखीं। युवा साहित्यकारों के लिए वह किसी प्रेरणास्रोत से कम नहीं हैं।
ये बातें शनिवार को पद्मश्री बेकल उत्साही की पुण्यतिथि पर सिविल लाइंस स्थित उनकी मजार पर फातिहा कार्यक्रम में अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य सम्मान अफरोज ने कहीं। उन्होंने कहा कि बेकल उत्साही ने समाज को बहुत कुछ दिया। बेशक वह अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन अपनी कविताओं, शायरी व लेखों में वे आज भी जिंदा है। युवा पीढ़ी के लिए वह किसी मार्गदर्शक से कम नहीं हैं।
कांग्रेस की महिला जिलाध्यक्ष आरिफा उत्साही ने बताया कि पद्मश्री बेकल उत्साही का जन्म वर्ष 1924 में उतरौला के रमवापुर ग्राम में हुआ था। उनके पिता लोधी मोहम्मद जफर खां बड़े जमींदार थे मगर पद्मश्री बेकल उत्साही का दिल कभी भी जमींदारी में नहीं लगा।
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1945 में उन्होंने अपना पहला शेर पढ़ा। इसके बाद वह साहित्य की दुनिया में छा गए। उनकी रचनाएं आज भी लोगों की जुबां पर रहती हैं। कार्यक्रम में बेकल उत्सही के बेटे कुंवर सज्जादुल अजीज, शहर मुफ्ती मौलाना मसीह अहमद कादरी व मौलाना शमीम अहमद कादरी मौजूद रहे।
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ये बातें शनिवार को पद्मश्री बेकल उत्साही की पुण्यतिथि पर सिविल लाइंस स्थित उनकी मजार पर फातिहा कार्यक्रम में अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य सम्मान अफरोज ने कहीं। उन्होंने कहा कि बेकल उत्साही ने समाज को बहुत कुछ दिया। बेशक वह अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन अपनी कविताओं, शायरी व लेखों में वे आज भी जिंदा है। युवा पीढ़ी के लिए वह किसी मार्गदर्शक से कम नहीं हैं।
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कांग्रेस की महिला जिलाध्यक्ष आरिफा उत्साही ने बताया कि पद्मश्री बेकल उत्साही का जन्म वर्ष 1924 में उतरौला के रमवापुर ग्राम में हुआ था। उनके पिता लोधी मोहम्मद जफर खां बड़े जमींदार थे मगर पद्मश्री बेकल उत्साही का दिल कभी भी जमींदारी में नहीं लगा।
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1945 में उन्होंने अपना पहला शेर पढ़ा। इसके बाद वह साहित्य की दुनिया में छा गए। उनकी रचनाएं आज भी लोगों की जुबां पर रहती हैं। कार्यक्रम में बेकल उत्सही के बेटे कुंवर सज्जादुल अजीज, शहर मुफ्ती मौलाना मसीह अहमद कादरी व मौलाना शमीम अहमद कादरी मौजूद रहे।