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सोहेलवा सेंचुरी में है जड़ी बूटियों का असीम भंडार
Updated Fri, 16 Jun 2017 11:48 PM IST
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सोहेलवा सेंचुरी में फैला जड़ीबूटियों का भंडार
विभागीय स्तर पर नहीं इनके संरक्षण की व्यवस्था
जानकार लोग व तस्कर उठा रहे इसका फायदा
लाल जी सिंह
बलरामपुर। जिले के संरक्षित वन क्षेत्र सोहेलवा में जड़ीबूटियों का असीम भंडार है। लेकिन संरक्षण व देख-रेख के अभाव में इन कीमती जड़ीबूटियों का व्यवसायिक उपयोग नहीं हो पा रहा है। वन विभाग के पास भी इनके संरक्षण व प्रमोशन की योजना नहीं है। इन कीमती जड़ीबूटियों का फायदा उठाकर जानकार व तस्कर मालामाल हो रहे हैं। वन विभाग का दावा है कि संरक्षित क्षेत्र में सभी वनस्पतियां, जीवजन्तु व जड़ी बूटियां पूरी तरह से सुरक्षित हैं।
बॉक्स
452 वर्ग किमी में फैला है सोहेलवा वन क्षेत्र
जिले की नेपाल खुली सीमा से सटा सोहेलवा संरक्षित वन क्षेत्र काफी बड़ा है। इसका कुल क्षेत्रफल 452 वर्ग किमी से अधिक है। प्राकृतिक रूप से इस वन क्षेत्र को काफी समृद्ध माना जाता है। इस वन क्षेत्र में बेशकीमती लकड़ी, फलदार वृक्ष व जड़ीबूटियों का असीम भंडार है। जीव-जंतु के मामले में भी यह वन क्षेत्र काफी समृद्ध है। यहां रायल बंगाल टाइगर व काले हिरन की भी मौजूदगी बताई जाती है।
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सोहेल सेंचुरी में पाई जाने वाली जड़ीबूटियां
-आंवला, बेल, अर्जुन, अशोक, सिरस, कदंब, हरड़, कचनार, पलाश, अमलताश, तुन, करंज, पुत्रजीवफल, कुटज, मीठीनीम, तुलसी, एरण्ड, अडूसा, धृतकुमारी, भांग, भृंगराज, गनेही, रोहिनी, मकोय, अश्वगंधा, सफेद मूसली, सतावर, वनतुलसी, लेमनग्रास, कचूर, शंखपुष्पी, ब्राह्मी, सेतुड़, धेड़वच, गिलोय, छीटी पीपल, अपामार्ग, मेदा, गुड़मार, गोखऊ, ग्वारपाठा, चित्रक मूल, दंतीमूल, नागरमोथा, धतूरा, निगुणी, पुर्ननवा, कंटकरी, मरोड़फली, लिसोढ़ा, बाराहीकंद, बहेड़ा, शिवलिंग बीज आदि।
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नहीं है जड़ीबूटियों के संरक्षण की व्यवस्था
-सोहेलवा सेंचुरी में पाई जाने वाली जड़ीबूटियों के संरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है। न तो इन जड़ीबूटियों पर शोध किया जाता है और न ही इनके व्यवसाय की ही कोई व्यवस्था है। हर साल सेंचुरी क्षेत्र में बेशकीमती जड़ीबूटियां या तो खुद नष्ट हो जाती हैं या फिर जानकार लोग इसकी तस्करी कर मालामाल हो रहे हैं। यही नहीं खुली सीमा होने के कारण सोहेलवा सेंचुरी की जड़ीबूटियां नेपाल के लोग भी ले जाते हैं।
थारु जनजाति है इसकी जानकार
सोहेलवा सेंचुरी स्थित वन ग्रामों में रहने वाली थारु जनजाति को इन जड़ीबूटियों को अच्छी जानकारी है। इस जनजाति के लोग आज भी इन जड़ीबूटियों से परंपरागत आयुर्वेदिक इलाज कर लाभ ले रहे हैं। इसके अलावा तमाम आयुर्वेदिक जड़ीबूटी के जानकार भी सोहेलवा सेंचुरी की जड़ी बूटी की अवैध व्यापार करते हैं।
नहीं होती जड़ीबूटियों की तस्करी
-सोहेलवा सेंचुरी में पाई जाने वाली जड़ीबूटियों के संरक्षण की कोई योजना विभाग द्वारा संचालित नहीं है। सेंचुरी क्षेत्र होने के कारण इस क्षेत्र से जड़ीबूटियों की तस्करी संभव ही नहीं है। वन विभाग सेंचुरी क्षेत्र में होने वाली हर अवैध गतिविधियों पर पैनी नजर रखता है। अवैध कटान व अवैध शिकार करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जा रही है।
करन सिंह गौतम, डीएफओ बलरामपुर
विभागीय स्तर पर नहीं इनके संरक्षण की व्यवस्था
जानकार लोग व तस्कर उठा रहे इसका फायदा
लाल जी सिंह
बलरामपुर। जिले के संरक्षित वन क्षेत्र सोहेलवा में जड़ीबूटियों का असीम भंडार है। लेकिन संरक्षण व देख-रेख के अभाव में इन कीमती जड़ीबूटियों का व्यवसायिक उपयोग नहीं हो पा रहा है। वन विभाग के पास भी इनके संरक्षण व प्रमोशन की योजना नहीं है। इन कीमती जड़ीबूटियों का फायदा उठाकर जानकार व तस्कर मालामाल हो रहे हैं। वन विभाग का दावा है कि संरक्षित क्षेत्र में सभी वनस्पतियां, जीवजन्तु व जड़ी बूटियां पूरी तरह से सुरक्षित हैं।
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452 वर्ग किमी में फैला है सोहेलवा वन क्षेत्र
जिले की नेपाल खुली सीमा से सटा सोहेलवा संरक्षित वन क्षेत्र काफी बड़ा है। इसका कुल क्षेत्रफल 452 वर्ग किमी से अधिक है। प्राकृतिक रूप से इस वन क्षेत्र को काफी समृद्ध माना जाता है। इस वन क्षेत्र में बेशकीमती लकड़ी, फलदार वृक्ष व जड़ीबूटियों का असीम भंडार है। जीव-जंतु के मामले में भी यह वन क्षेत्र काफी समृद्ध है। यहां रायल बंगाल टाइगर व काले हिरन की भी मौजूदगी बताई जाती है।
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सोहेल सेंचुरी में पाई जाने वाली जड़ीबूटियां
-आंवला, बेल, अर्जुन, अशोक, सिरस, कदंब, हरड़, कचनार, पलाश, अमलताश, तुन, करंज, पुत्रजीवफल, कुटज, मीठीनीम, तुलसी, एरण्ड, अडूसा, धृतकुमारी, भांग, भृंगराज, गनेही, रोहिनी, मकोय, अश्वगंधा, सफेद मूसली, सतावर, वनतुलसी, लेमनग्रास, कचूर, शंखपुष्पी, ब्राह्मी, सेतुड़, धेड़वच, गिलोय, छीटी पीपल, अपामार्ग, मेदा, गुड़मार, गोखऊ, ग्वारपाठा, चित्रक मूल, दंतीमूल, नागरमोथा, धतूरा, निगुणी, पुर्ननवा, कंटकरी, मरोड़फली, लिसोढ़ा, बाराहीकंद, बहेड़ा, शिवलिंग बीज आदि।
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नहीं है जड़ीबूटियों के संरक्षण की व्यवस्था
-सोहेलवा सेंचुरी में पाई जाने वाली जड़ीबूटियों के संरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है। न तो इन जड़ीबूटियों पर शोध किया जाता है और न ही इनके व्यवसाय की ही कोई व्यवस्था है। हर साल सेंचुरी क्षेत्र में बेशकीमती जड़ीबूटियां या तो खुद नष्ट हो जाती हैं या फिर जानकार लोग इसकी तस्करी कर मालामाल हो रहे हैं। यही नहीं खुली सीमा होने के कारण सोहेलवा सेंचुरी की जड़ीबूटियां नेपाल के लोग भी ले जाते हैं।
थारु जनजाति है इसकी जानकार
सोहेलवा सेंचुरी स्थित वन ग्रामों में रहने वाली थारु जनजाति को इन जड़ीबूटियों को अच्छी जानकारी है। इस जनजाति के लोग आज भी इन जड़ीबूटियों से परंपरागत आयुर्वेदिक इलाज कर लाभ ले रहे हैं। इसके अलावा तमाम आयुर्वेदिक जड़ीबूटी के जानकार भी सोहेलवा सेंचुरी की जड़ी बूटी की अवैध व्यापार करते हैं।
नहीं होती जड़ीबूटियों की तस्करी
-सोहेलवा सेंचुरी में पाई जाने वाली जड़ीबूटियों के संरक्षण की कोई योजना विभाग द्वारा संचालित नहीं है। सेंचुरी क्षेत्र होने के कारण इस क्षेत्र से जड़ीबूटियों की तस्करी संभव ही नहीं है। वन विभाग सेंचुरी क्षेत्र में होने वाली हर अवैध गतिविधियों पर पैनी नजर रखता है। अवैध कटान व अवैध शिकार करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जा रही है।
करन सिंह गौतम, डीएफओ बलरामपुर