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मौसम के दगा देने से किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें
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बलिया। मौसम में आए परिवर्तन ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। अचानक पड़ रही गर्मी के कारण रबी की फसलों की वृद्धि रुक गई है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि मौसम में यह परिवर्तन गेहूं की फसल के लिए नुकसानदायक हो सकता है। उधर, किसानों का कहना है कि यदि इस समय बारिश हो जाती तो फसल अच्छी हो जाती, लेकिन ऐसा होने के बजाय धूप की गर्मी और बढ़ गई है। यह फसल को बर्बाद कर सकती है।
नगरा क्षेत्र के किसानों ने धान की कटाई के बाद रबी की बुआई कर दी। मौसम के बदले रुख से अपेक्षा के अनुरूप फसलों का विकास नहीं हो रहा है। किसान बता रहे हैं कि मौसम का तापमान अधिक होने के कारण रवि की फसल में जोर नहीं दिखाई पड़ रहा है। इससे गेहूं के पौधे में कल्ले नहीं आ रहे हैं। इसका असर पैदावार पर पड़ेगा। क्षेत्र के किसान शत्रुंजय कुमार चौबे ने बताया कि मौसम इसी तरह रहा तो तिलहन, गेहूं की फसल कमजोर हो जाएगी और पैदावार प्रभावित होगी। सहायक विकास अधिकारी कृषि रमाकांत राम ने बताया कि किसान खेतों में नमी बरकरार रखें क्योंकि तापमान में गर्मी है। मौसम के बदलाव से सरसों की फसल पर भी असर पड़ेगा। खेत में नमी न रहने पर गेहूं की फसल का विकास नहीं होगा।
रेवती क्षेत्र में ठंड की निरंतरता में कमी के चलते गेहूं, दलहन और तिलहन की पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है। अनुभवी किसानों का कहना है कि दिसंबर के तीसरे सप्ताह से कड़ाके की ठंड और कोहरा के लगभग एक महीने तक निरंतर चलते रहने से जमीन पर पड़ने वाले वायु दाब के कारण गेहूं के पौधे ऊपर उठने के बजाय जमीन पर ही बहुत कम वृद्धि के साथ सिमटे रहते हैं। किसान बताते हैं कि वायु दाब के चलते नए पौधों के फैलने की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रारंभ होती है। इससे गेहूं के पौधों के आसपास नये पौधों का भी जर्मीनेशन प्रारम्भ होता है। इस प्रकार लगभग एक माह की कड़ी ठंड के समय पौधों के अगल बगल कई नए पौधे उग आते हैं। इनमें अनाज की कई बालियां आगे चल कर तैयार हो जाया करती हैं। इससे फसलों के उत्पादन में अच्छी खासी बढ़ोत्तरी होती है। वर्तमान में लम्बे समय तक न कड़ी ठण्ड पड़ी और न ही क्षेत्रीय वातावरण आवश्यकता के मुताबिक कोहरा से आच्छादित रहा। ऐसे में गेहूं के पौधों में अतिरिक्त जर्मीनेशन नहीं हो सका है। अब अचानक गर्मी के दस्तक से गेहूं सहित दलहन और तिलहन के पौधे समय के पहले ही बढ़ने लगेंगे, उनमें समय से पहले फूल लगेंगे, जिसके कारण फलियां अपेक्षाकृत कम होंगी और दाने भी कम पुष्ट होंगे। नगर के किसान प्रवीण ओझा, श्रीकांत पांडेय, चौबेछपरा के वीरेश तिवारी ने कहा कि ठंड के मंद पड़ने से गेहूं तथा अन्य फसलों के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा।
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अचानक तापमान में वृद्धि के कारण गेहूं की फसल को नुकसान हो सकता है। गेहूं की पैदावार के लिए ठंड जरूरी है। वर्तमान परिवेश में तापमान सामान्य से तीन से पांच डिग्री सेल्सियस अधिक रह रहा है। ऐसे में गेहूं की फसल प्रभावित हो सकती है। - डॉ. रवि प्रकाश मौर्य, प्रभारी, कृषि विज्ञान केंद्र, सोहांव
चने की फसल में उकठा रोग का प्रबंधन : प्रो. रवि प्रकाश
नरही। आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कुमारगंज अयोध्या की ओर से संचालित कृषि विज्ञान केंद्र सोहांव बलिया के अध्यक्ष प्रोफेसर रवि प्रकाश मौर्य ने चने की खेती करने वाले किसानों के लिए सलाह दी कि इस समय कहीं-कहीं चने में उकठा बीमारी के प्रकोप की जानकारी मिल रही है। इस रोग से सतर्क रहने की आवश्यकता है। यह बीमारी फ्यूजेरियम आक्सीस्पोरम फफूंद से फैलता है। यह मृदा व बीज जनित बीमारी है। इसके कारण 10-12 प्रतिशत तक पैदावार कम हो जाती है। यह फफूंद बिना पोषक या नियंत्रण के भी मृदा में लगभग 6 वर्षों तक जीवित रह सकती है। इस रोग में पौधे धीरे-धीरे मुरझा कर सूख जाते हैं। पौधों को उखाड़ कर देखने पर उसकी मुख्य जड़ एवं शाखाएं सही सलामत दिखाई देती हैं। छिलका भूरा रंग का होता है। जड़ को चीरकर देखने पर उसके अंदर भूरे रंग की धारियां दिखाई देती हैं। इस रोग का प्रकोप पौधे के किसी भी अवस्था में हो सकता है। रोग लगने पर प्रबंधन कठिन होता है। प्रबंधन के लिए ट्राकोडर्मा 5 ग्राम या कार्बेंडाजिम 50 प्रतिशत 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल कर पौधों की जड़ को तर कर दे, इससे रोग का फैलाव नहीं होगा और भविष्य में 3-4 वर्षों तक उस खेत में दलहनी फसलें न लें। खेत खाली होने पर गर्मी में मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करें। चार लाइन चना के बाद सरसों या अलसी की एक लाइन लगाएं। प्रति एकड़ 20 कुंतल गोबर की सड़ी खाद प्रयोग करने से उकठा रोग में कमी आती है।
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नगरा क्षेत्र के किसानों ने धान की कटाई के बाद रबी की बुआई कर दी। मौसम के बदले रुख से अपेक्षा के अनुरूप फसलों का विकास नहीं हो रहा है। किसान बता रहे हैं कि मौसम का तापमान अधिक होने के कारण रवि की फसल में जोर नहीं दिखाई पड़ रहा है। इससे गेहूं के पौधे में कल्ले नहीं आ रहे हैं। इसका असर पैदावार पर पड़ेगा। क्षेत्र के किसान शत्रुंजय कुमार चौबे ने बताया कि मौसम इसी तरह रहा तो तिलहन, गेहूं की फसल कमजोर हो जाएगी और पैदावार प्रभावित होगी। सहायक विकास अधिकारी कृषि रमाकांत राम ने बताया कि किसान खेतों में नमी बरकरार रखें क्योंकि तापमान में गर्मी है। मौसम के बदलाव से सरसों की फसल पर भी असर पड़ेगा। खेत में नमी न रहने पर गेहूं की फसल का विकास नहीं होगा।
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रेवती क्षेत्र में ठंड की निरंतरता में कमी के चलते गेहूं, दलहन और तिलहन की पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है। अनुभवी किसानों का कहना है कि दिसंबर के तीसरे सप्ताह से कड़ाके की ठंड और कोहरा के लगभग एक महीने तक निरंतर चलते रहने से जमीन पर पड़ने वाले वायु दाब के कारण गेहूं के पौधे ऊपर उठने के बजाय जमीन पर ही बहुत कम वृद्धि के साथ सिमटे रहते हैं। किसान बताते हैं कि वायु दाब के चलते नए पौधों के फैलने की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रारंभ होती है। इससे गेहूं के पौधों के आसपास नये पौधों का भी जर्मीनेशन प्रारम्भ होता है। इस प्रकार लगभग एक माह की कड़ी ठंड के समय पौधों के अगल बगल कई नए पौधे उग आते हैं। इनमें अनाज की कई बालियां आगे चल कर तैयार हो जाया करती हैं। इससे फसलों के उत्पादन में अच्छी खासी बढ़ोत्तरी होती है। वर्तमान में लम्बे समय तक न कड़ी ठण्ड पड़ी और न ही क्षेत्रीय वातावरण आवश्यकता के मुताबिक कोहरा से आच्छादित रहा। ऐसे में गेहूं के पौधों में अतिरिक्त जर्मीनेशन नहीं हो सका है। अब अचानक गर्मी के दस्तक से गेहूं सहित दलहन और तिलहन के पौधे समय के पहले ही बढ़ने लगेंगे, उनमें समय से पहले फूल लगेंगे, जिसके कारण फलियां अपेक्षाकृत कम होंगी और दाने भी कम पुष्ट होंगे। नगर के किसान प्रवीण ओझा, श्रीकांत पांडेय, चौबेछपरा के वीरेश तिवारी ने कहा कि ठंड के मंद पड़ने से गेहूं तथा अन्य फसलों के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा।
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अचानक तापमान में वृद्धि के कारण गेहूं की फसल को नुकसान हो सकता है। गेहूं की पैदावार के लिए ठंड जरूरी है। वर्तमान परिवेश में तापमान सामान्य से तीन से पांच डिग्री सेल्सियस अधिक रह रहा है। ऐसे में गेहूं की फसल प्रभावित हो सकती है। - डॉ. रवि प्रकाश मौर्य, प्रभारी, कृषि विज्ञान केंद्र, सोहांव
चने की फसल में उकठा रोग का प्रबंधन : प्रो. रवि प्रकाश
नरही। आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कुमारगंज अयोध्या की ओर से संचालित कृषि विज्ञान केंद्र सोहांव बलिया के अध्यक्ष प्रोफेसर रवि प्रकाश मौर्य ने चने की खेती करने वाले किसानों के लिए सलाह दी कि इस समय कहीं-कहीं चने में उकठा बीमारी के प्रकोप की जानकारी मिल रही है। इस रोग से सतर्क रहने की आवश्यकता है। यह बीमारी फ्यूजेरियम आक्सीस्पोरम फफूंद से फैलता है। यह मृदा व बीज जनित बीमारी है। इसके कारण 10-12 प्रतिशत तक पैदावार कम हो जाती है। यह फफूंद बिना पोषक या नियंत्रण के भी मृदा में लगभग 6 वर्षों तक जीवित रह सकती है। इस रोग में पौधे धीरे-धीरे मुरझा कर सूख जाते हैं। पौधों को उखाड़ कर देखने पर उसकी मुख्य जड़ एवं शाखाएं सही सलामत दिखाई देती हैं। छिलका भूरा रंग का होता है। जड़ को चीरकर देखने पर उसके अंदर भूरे रंग की धारियां दिखाई देती हैं। इस रोग का प्रकोप पौधे के किसी भी अवस्था में हो सकता है। रोग लगने पर प्रबंधन कठिन होता है। प्रबंधन के लिए ट्राकोडर्मा 5 ग्राम या कार्बेंडाजिम 50 प्रतिशत 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल कर पौधों की जड़ को तर कर दे, इससे रोग का फैलाव नहीं होगा और भविष्य में 3-4 वर्षों तक उस खेत में दलहनी फसलें न लें। खेत खाली होने पर गर्मी में मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करें। चार लाइन चना के बाद सरसों या अलसी की एक लाइन लगाएं। प्रति एकड़ 20 कुंतल गोबर की सड़ी खाद प्रयोग करने से उकठा रोग में कमी आती है।