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चूल्हा, चाकी बेच कर निकल पड़े गांव

Thu, 21 May 2020 08:27 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Thu, 21 May 2020 08:27 PM IST
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Villagers left after selling household goods
बैरिया। लगातार 22 वर्षों तक जिस कंपनी में कामकर मालिक को पूंजीपति बनाया उसने भी आपदा काल में मुंह मोड़ लिया। न मकान का किराया देने के लिए पैसा था और न ही खाने के लिए, मजबूर होकर घर-गृहस्थी का सामान बेचकर पैसे एकत्रित किया और गांव जाने के लिए निकल पड़े। यह व्यथा सुनाई राजस्थान से बिहार जा रहे प्रवासी मजदूरों ने।
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एनएच 31 से होकर बिहार की तरफ जाने वाले मजदूरों की कहानी जैसी ही है। राजस्थान से डीसीएम से बिहार के मुंगेर जाते समय मजदूर जब बैरिया के चिरैयामोड़ पहुंचे तो पुलिसकर्मियों ने रोक लिया। इनमें शामिल मजदूर अजय महतो ने पुलिसकर्मियों को बताया कि वह 22 साल पहले राजस्थान गया था जहां एक सेठ के यहां काम पर लग गया। उसके परिवार के सदस्य दो कमरों के टिन शेड में बने इंसुलेटर के कारखाने में काम करने लगे। देखते ही देखते काम चल निकला तो मालिक ने बड़ी फैक्ट्री लगाई। इसमें अपने गांव के अन्य लोगों को भी बुला कर काम दिलवा दिया। मालिक तरक्की करता गया और करोड़ों में खेलने लगा लेकिन मजदूरों का हाल जस का तस रहा। लॉकडाउन के बाद मालिक ने एक माह तक तो उनके खाने का इंतजाम किया लेकिन फिर उनके हाल पर छोड़ दिया। 22 साल का रिश्ता टूट गया। इसके बाद फैक्ट्री में काम करने वाले सभी 55 लोगों ने मिलजुल कर डीसीएम किराए पर ली और अपने घर के लिए रवाना हुए।
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बिहार के लखीसराय निवासी अनिल महतो ने बताया कि आफत में किसी का कोई नहीं होता है। सभी मजदूर परेशान हैं। सभी चाहते हैं कि किसी तरह गांव पहुंच जाएं। बताया कि पैसे के अभाव में घर का बर्तन, गैस सिलेंडर, चूल्हा व अन्य सामान कुल 6500 रुपये में बेच दिया और गांव के लिए निकल पड़े। कहा कि घर पहुंचने के बाद फिर से मेहनत कर पैसा कमाएंगे। बिहार के बड़हिया निवासी नन्हकू सिंह ने कहा मध्यप्रदेश छोड़ने से पहले रिश्तेदारों को मदद के लिए फोन किया लेकिन किसी ने मदद नहीं की। आसपास के कई लोगों से 100-100 रुपये लेकर कुल 800 रुपये एकत्रित किया और पत्नी व एक चार वर्ष के बच्चे के साथ घर के लिए चले।
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