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UP: जब चंद्रशेखर की जीत की राह में रोड़ा बने जगन्नाथ, 1984 में थी कांग्रेस की लहर, काम न आया सियासी करिश्मा
Sun, 24 Mar 2024 11:13 AM IST
शाहरुख खान
अमर उजाला नेटवर्क, बलिया
अमर उजाला नेटवर्क, बलिया
Published by: शाहरुख खान
Updated Sun, 24 Mar 2024 11:13 AM IST
सार
बलिया को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले चंद्रशेखर के लिए दल मायने नहीं रखता था। वो आठ बार सांसद चुने गए थे। 1984 में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था।
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UP Lok Sabha Election 2024
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
बागी बलिया की धरती से अपनी अलग सियासी पहचान रखने वाले चंद्रशेखर सिंह चार दशक तक भारतीय संसद के सदस्य रहे। 1977 से 2007 के बीच आठ बार वह बलिया लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर सांसद पहुंचे। हालांकि एक बार उन्हें 1984 में हार का मुंह देखना पड़ा।
1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के पक्ष में चली सहानुभूति की लहर को वह भेदने में नाकाम रहे। इस चुनाव में उन्हें जगन्नाथ चौधरी ने हराया। हार की वजह से चंद्रशेखर जीत की हैट्रिक से वंचित हो गए। चंद्रशेखर ऐसे राजनेताओं की दुर्लभ नस्ल से थे, जो अपने पूरे सियासी सफर में अपनी समाजवादी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध रहे।
वह साहस और दृढ़ विश्वास के प्रतीक थे। इसका उदाहरण उनकी ओर से समय-समय पर लिए गए फैसलों से मिलता है। चंद्रशेखर वैसे तो शुरू में कांग्रेस पार्टी से ही जुड़े रहे। 1962-1977 तक राज्यसभा के सदस्य भी रहे। ये काल उनके जीवन काल से हटा दें तो उन्होंने हमेशा कांग्रेस के विरोध की राजनीति की।
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1977 में आपातकाल के समय उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। इंदिरा गांधी के ''मुखर विरोधी'' के तौर पर उनकी पहचान बनी। बलिया समेत पूरे देश के लोगों को शायद उनकी यही छवि प्रभावित करती थी। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने बलिया से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। हालांकि उनका पैतृक घर इब्राहिमपट्टी में है, जो बलिया और मऊ जिले की सीमा पर है।
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1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के पक्ष में चली सहानुभूति की लहर को वह भेदने में नाकाम रहे। इस चुनाव में उन्हें जगन्नाथ चौधरी ने हराया। हार की वजह से चंद्रशेखर जीत की हैट्रिक से वंचित हो गए। चंद्रशेखर ऐसे राजनेताओं की दुर्लभ नस्ल से थे, जो अपने पूरे सियासी सफर में अपनी समाजवादी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध रहे।
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वह साहस और दृढ़ विश्वास के प्रतीक थे। इसका उदाहरण उनकी ओर से समय-समय पर लिए गए फैसलों से मिलता है। चंद्रशेखर वैसे तो शुरू में कांग्रेस पार्टी से ही जुड़े रहे। 1962-1977 तक राज्यसभा के सदस्य भी रहे। ये काल उनके जीवन काल से हटा दें तो उन्होंने हमेशा कांग्रेस के विरोध की राजनीति की।
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1977 में आपातकाल के समय उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। इंदिरा गांधी के ''मुखर विरोधी'' के तौर पर उनकी पहचान बनी। बलिया समेत पूरे देश के लोगों को शायद उनकी यही छवि प्रभावित करती थी। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने बलिया से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। हालांकि उनका पैतृक घर इब्राहिमपट्टी में है, जो बलिया और मऊ जिले की सीमा पर है।
इसका कुछ हिस्सा सलेमपुर लोकसभा क्षेत्र में आता है। छात्र जीवन से राजनीति का ककहरा सीखने वाले चंद्रशेखर ने आपातकाल के बाद कांग्रेस छोड़ी और 1977 के लोकसभा चुनाव में वह पहली बार भारतीय लोकदल के प्रत्याशी के तौर पर चुनावी समर में उतरे और जीत दर्ज की। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और 2004 तक बराबर राजनीति में सक्रिय रहे। अपने कीर्तिमान भरे सियासी सफर में उन्होंने प्रधानमंत्री के पद को भी सुशोभित किया।
नहीं मांगते थे अपने लिए वोट
चंद्रशेखर सिंह बलिया से लोकसभा चुनाव तो लड़ते थे, लेकिन कभी भी अपने लिए जनता के बीच जाकर वोट नहीं मांगा। वह जनसभा करते थे। लोगों को संबोधित करते हुए अपनी बात को जनता के सामने पुरजोर ढंग से रखते थे। वोट मांगने का काम उनके कार्यकर्ता करते थे। उनके चुनाव लड़ने के दौरान एक लहर उनके पीछे चल पड़ती थी, जो उनकी जीत की इबारत लिखती थी। यह सिलसिला सालों तक चला।
चंद्रशेखर सिंह बलिया से लोकसभा चुनाव तो लड़ते थे, लेकिन कभी भी अपने लिए जनता के बीच जाकर वोट नहीं मांगा। वह जनसभा करते थे। लोगों को संबोधित करते हुए अपनी बात को जनता के सामने पुरजोर ढंग से रखते थे। वोट मांगने का काम उनके कार्यकर्ता करते थे। उनके चुनाव लड़ने के दौरान एक लहर उनके पीछे चल पड़ती थी, जो उनकी जीत की इबारत लिखती थी। यह सिलसिला सालों तक चला।
सपा ने नहीं उतारा विरोध में उम्मीदवार
चंद्रशेखर ने जब-जब बलिया से चुनाव लड़ा, समाजवादी पार्टी ने उनके खिलाफ कभी भी अपना प्रत्याशी नहीं उतारा। 2004 के चुनाव में वह सजपा (रा) से चुनाव लड़े तो उनके सामने बसपा और भाजपा का उम्मीदवार था। मगर उन्हें सपा का समर्थन रहा। 1999, 1998 में भी सपा का उन्हें समर्थन मिला। 1996 में चंद्रशेखर समता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े। उस समय भाजपा ने घोषणा की थी कि किसी भी उत्कृष्ट सांसद के खिलाफ प्रत्याशी नहीं उतारेंगे। उस वर्ष चंद्रशेखर संसद में उत्कृष्ट सांसद चुने गए थे। इसलिए भाजपा ने चुनाव नहीं लड़ा।
चंद्रशेखर ने जब-जब बलिया से चुनाव लड़ा, समाजवादी पार्टी ने उनके खिलाफ कभी भी अपना प्रत्याशी नहीं उतारा। 2004 के चुनाव में वह सजपा (रा) से चुनाव लड़े तो उनके सामने बसपा और भाजपा का उम्मीदवार था। मगर उन्हें सपा का समर्थन रहा। 1999, 1998 में भी सपा का उन्हें समर्थन मिला। 1996 में चंद्रशेखर समता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े। उस समय भाजपा ने घोषणा की थी कि किसी भी उत्कृष्ट सांसद के खिलाफ प्रत्याशी नहीं उतारेंगे। उस वर्ष चंद्रशेखर संसद में उत्कृष्ट सांसद चुने गए थे। इसलिए भाजपा ने चुनाव नहीं लड़ा।