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कइयों को पहनाया ‘ताज’, खुद ‘बेताज’
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बलिया। बलिया नगर विधानसभा सीट पर मुस्लिम वोटरों ने कई बार समर्थन देकर तमाम राजनीतिक दलों के नुमाइंदों को विधायक बनाया, लेकिन जब भी कोई मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरा तो हर बार हार से रूबरू होना पड़ा। बलिया से अब तक एक भी मुस्लिम क्षेत्र का प्रतिनिधित्व नहीं कर सका है।
बलिया विधानसभा क्षेत्र से कई बार मुस्लिम नेताओं ने किस्मत आजमाई है, लेकिन हर बार उनको हार का सामना करना पड़ा है। सन 1965 में पहली बार मुस्लिम उम्मीदवार कामरेड बशीर ने कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर किस्मत आजमाई थी, लेकिन पराजय का सामना करना पड़ा था। उसके बाद सन 1984 में निर्दल उम्मीदवार के तौर पर मुन्ना भाई ने किस्मत आजमाई, लेकिन पराजय हाथ लगी और वो चौथे स्थान पर रहे। सन 1989, 1991 और 1993, 2002, 2007, 2012 और 2017 में अलग-अलग दलों और निर्दल उम्मीदवार के रूप में अकलियत के लोगों ने चुनाव में किस्मत आजमाया, लेकिन मुस्लिम वोटरों ने हर बार उन्हें नकार दिया। इसके बावजूद इस बार एआईएमआईएम ने बलिया नगर विधान सभा से मोहम्मद शमीम को उम्मीदवार बनाया है। वैसे अल्पसंख्यक हितों की बात तो राजनीतिक दल लगातार करते आ रहे हैं, लेकिन जिले की बलिया नगर विधान सभा क्षेत्रों में कभी मुस्लिम प्रत्याशी पर दांव नहीं लगाया। यह स्थिति तब है जबकि इस विधान सभा क्षेत्र में करीब 35 हजार मुस्लिम मतदाता हैं। यहीं स्थिति जिले के फेफना, बांसडीह और बैरिया विधानसभा क्षेत्र की है। आजादी के बाद इन क्षेत्रों में पहली बार वर्ष 1951 में चुनाव हुआ था तब से आज तक इस सीट पर किसी भी राजनीतिक दल ने मुस्लिम प्रत्याशी को चुनाव मैदान में नहीं उतारा। जबकि इस क्षेत्र में करीब 10 से 15 हजार मुस्लिम मतदाता हैं। इस वजह से मुस्लिम मतदाता अपने विवेक से ही मतदान करते चले आ रहे हैं।
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सिकंदरपुर विधानसभा हैं अपवाद
सिकंदरपुर सीट जिले में महज एक अपवाद रही, यहां करीब 25 हजार मतदाता होने के बावजूद दो बार मुहम्मद जियाउद्दीन रिजवी को प्रतिनिधित्व करने का अवसर प्रदान किया। वर्ष 2002 और 2012 में सिकंदरपुर की जनता ने रिजवी को विधायक बनाया। इस बार मतदाताओं की संख्या में इजाफा हुआ है। इसी आस में यहां से इस बार दो मुस्लिम उम्मीदवारों ने नामांकन किया है। भारतीय जन नायक पार्टी से मोहम्मद जफर अली और निर्दल सद्दाम चुनावी अखाड़े में है।
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रसड़ा और बेल्थरारोड में हैं 70 हजार मुस्लिम वोटर
जिले की रसड़ा विधानसभा में सबसे अधिक करीब 42116 वोटर है, जो किसी भी चुनाव परिणाम को प्रभावित रखने का माद्दा रखते है। इसके बावजूद अब तक इस सीट से भी कोई मुस्लिम चेहरा चुनाव नहीं जीत सका है। इसके अलावा बेल्थरारोड विधान सभा में करीब तीस हजार मुस्लिम वोटर है। इसके बावजूद यहां भी कोई मुस्लिम नेता अब तक चुनाव नहीं जीत सका है।
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बलिया विधानसभा क्षेत्र से कई बार मुस्लिम नेताओं ने किस्मत आजमाई है, लेकिन हर बार उनको हार का सामना करना पड़ा है। सन 1965 में पहली बार मुस्लिम उम्मीदवार कामरेड बशीर ने कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर किस्मत आजमाई थी, लेकिन पराजय का सामना करना पड़ा था। उसके बाद सन 1984 में निर्दल उम्मीदवार के तौर पर मुन्ना भाई ने किस्मत आजमाई, लेकिन पराजय हाथ लगी और वो चौथे स्थान पर रहे। सन 1989, 1991 और 1993, 2002, 2007, 2012 और 2017 में अलग-अलग दलों और निर्दल उम्मीदवार के रूप में अकलियत के लोगों ने चुनाव में किस्मत आजमाया, लेकिन मुस्लिम वोटरों ने हर बार उन्हें नकार दिया। इसके बावजूद इस बार एआईएमआईएम ने बलिया नगर विधान सभा से मोहम्मद शमीम को उम्मीदवार बनाया है। वैसे अल्पसंख्यक हितों की बात तो राजनीतिक दल लगातार करते आ रहे हैं, लेकिन जिले की बलिया नगर विधान सभा क्षेत्रों में कभी मुस्लिम प्रत्याशी पर दांव नहीं लगाया। यह स्थिति तब है जबकि इस विधान सभा क्षेत्र में करीब 35 हजार मुस्लिम मतदाता हैं। यहीं स्थिति जिले के फेफना, बांसडीह और बैरिया विधानसभा क्षेत्र की है। आजादी के बाद इन क्षेत्रों में पहली बार वर्ष 1951 में चुनाव हुआ था तब से आज तक इस सीट पर किसी भी राजनीतिक दल ने मुस्लिम प्रत्याशी को चुनाव मैदान में नहीं उतारा। जबकि इस क्षेत्र में करीब 10 से 15 हजार मुस्लिम मतदाता हैं। इस वजह से मुस्लिम मतदाता अपने विवेक से ही मतदान करते चले आ रहे हैं।
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सिकंदरपुर विधानसभा हैं अपवाद
सिकंदरपुर सीट जिले में महज एक अपवाद रही, यहां करीब 25 हजार मतदाता होने के बावजूद दो बार मुहम्मद जियाउद्दीन रिजवी को प्रतिनिधित्व करने का अवसर प्रदान किया। वर्ष 2002 और 2012 में सिकंदरपुर की जनता ने रिजवी को विधायक बनाया। इस बार मतदाताओं की संख्या में इजाफा हुआ है। इसी आस में यहां से इस बार दो मुस्लिम उम्मीदवारों ने नामांकन किया है। भारतीय जन नायक पार्टी से मोहम्मद जफर अली और निर्दल सद्दाम चुनावी अखाड़े में है।
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रसड़ा और बेल्थरारोड में हैं 70 हजार मुस्लिम वोटर
जिले की रसड़ा विधानसभा में सबसे अधिक करीब 42116 वोटर है, जो किसी भी चुनाव परिणाम को प्रभावित रखने का माद्दा रखते है। इसके बावजूद अब तक इस सीट से भी कोई मुस्लिम चेहरा चुनाव नहीं जीत सका है। इसके अलावा बेल्थरारोड विधान सभा में करीब तीस हजार मुस्लिम वोटर है। इसके बावजूद यहां भी कोई मुस्लिम नेता अब तक चुनाव नहीं जीत सका है।
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