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गमकती गलियों वाला सिकंदरपुर...नाम सुना है?
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बलिया/सिकंदरपुर। करीब तीन दशक से पहले देश के कोने-कोने में सिकंदरपुर में बने गुलाब जल, गुलाब सकरी, इत्र आदि की डिमांड विदेशों तक होती थी। गुलाबों की नगरी के नाम से मशहूर सिकंदरपुर में फूलों की खेती में सैकड़ों परिवार लगे थे। पुराने लोगों की माने तो गुलाब, चमेली तथा बेला की समृद्ध खेती करने वाले इस इलाके में नालियों से भी फूलों की खुशबू आती थी। लेकिन समय की मार और शासन की उदासीनता ने महज कुछ ही समय में फूलों के इस शहर को बर्बाद कर दिया। हालात इतने बुरे हो चुके हैं की किसान फूलों की खेती से मुंह मोड़ रहे हैं, फूलों की खेती दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है।
सिकंदरपुर का गुलाब जल, केवड़ा, गुलाब सकरी और इत्र भारत में ही नहीं, बल्कि बांग्लादेश, पाकिस्तान, सऊदी अरब समेत अन्य देशों में अपनी खुशबू बिखेरता था। लेकिन आज यह शासन व राजनेताओं की उदासीनता के कारण धीरे-धीरे दम तोड़ता नजर आ रहा है। हालात से निराश हो चुके किसानों का कहना है कि फूलों की खेती से अच्छा अब मजदूरी करना है। वर्तमान समय में फूलों की
खेती से मेहनत करने के बाद भी मजदूरी तक नहीं निकल पा रही है। हालांकि सरकारी स्तर पर फूलों की खेती करने वाले किसानों को अनुदान तथा खेती में उपयोग आने वाले यंत्र के लिए पैसा मिलता है। लेकिन यह किसानों तक न पहुंचकर बिचौलियों के हाथ लग जाता है। लेकिन अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगता है। जिसका नतीजा है कि लोग फूलों की खेती करने के बजाय अन्य काम करना मुनासिब समझ रहे है।
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- गेंदा व गुलाब की चार हेक्टेयर खेती के लिए किसानों को पंजीकरण कराना होगा। खेती करने वाले किसानों को शासन की ओर से लागत की 50 फीसदी सब्सडी दी जाती है जो किसानों के खाते में भेजी जाती है। जिला उद्यान विभाग बलिया में पंजीयन कराना होता है। किसानों को पंजीयन कराने के दौरान आधार कार्ड, इंतखाफ, बैंक पासबुक की छायाप्रति के साथ ही दो फोटो व मोबाइल नंबर लाना होगा। गेंदा के लिए दो हेक्टेयर तथा गुलाब की खेती के लिए दो हेक्टेयर के लिए पंजीयन कराना होगा।
- नेपाल राम, जिला उद्यान अधिकारी, बलिया
.
पांच हजार एकड़ की बजाय अब 20 एकड़ में होती है खेती
बलिया। लोगों की माने तो पांच हजार एकड़ में फूलों की खेती होती थी। लेकिन अब वह महज 15 से 20 एकड़ में खेती हो रही है। करीब 200 कुंतल से अधिक प्रतिदिन फूल निकलता था। लेकिन वर्तमान में 10-12 कुंतल ही फूलों का उत्पादन हो पाता है। किसानों को प्रतिदिन दो लाख रुपये तक की आय होती थी। लेकिन अब 10 से 12 हजार रुपये हो गया है। इसी प्रकार करीब 20 कारखाने चलते थे। जबकि फरवरी व मार्च महीने में एक साथ अस्थाई दर्जनों कारखाने चलते थे। लेकिन वर्तमान में मात्र एक-दो कारखाने ही चल रहे है।
नालियां भी बिखेरती थी खुशबूू
बलिया। सिकंदरपुर क्षेत्र की नालियां अपने अच्छे दिनों में इत्र व फूलों की खुशबू बिखेरती थी। इसके पीेछे कहा जाता था कि कारखानों द्वारा गुलाब जल और इत्र निकलने के बाद बचे हुए पानी को नाले और नालियों में गिरा दिया जाता था। जिसके कारण नाले और नालियों में से खुशबू निकलती थी।
गुलाब सकरी की विदेशों तक थी मांग
बलिया। सिकंदरपुर क्षेत्र गुलाब की खेती से इत्र, गुलाब जल, केवड़ा, गुलाब सकरी बनाई जाती थी। यहां कि गुलाब सकरी इतनी प्रसिद्ध थी कि देश के अलावा विदेशों में इसकी खूब डिमांड थी। फरवरी माह से लेकर जून तक इसकी जोरदार तरीके से बिक्री होती थी। कस्बा निवासी दुकानदार मुन्ना मोदनवाल का कहना है कि पहले गर्मी के दिनों में लोग ठंडई के रूप में इसका इस्तेमाल करते थे। आज भी लोग इसका इस्तेमाल लोग भरपूर करते है। इससे जहां पेट साफ हो जाता है, वहीं शरीर भी काफी फुर्तीला रहता है।
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सिकंदरपुर का गुलाब जल, केवड़ा, गुलाब सकरी और इत्र भारत में ही नहीं, बल्कि बांग्लादेश, पाकिस्तान, सऊदी अरब समेत अन्य देशों में अपनी खुशबू बिखेरता था। लेकिन आज यह शासन व राजनेताओं की उदासीनता के कारण धीरे-धीरे दम तोड़ता नजर आ रहा है। हालात से निराश हो चुके किसानों का कहना है कि फूलों की खेती से अच्छा अब मजदूरी करना है। वर्तमान समय में फूलों की
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खेती से मेहनत करने के बाद भी मजदूरी तक नहीं निकल पा रही है। हालांकि सरकारी स्तर पर फूलों की खेती करने वाले किसानों को अनुदान तथा खेती में उपयोग आने वाले यंत्र के लिए पैसा मिलता है। लेकिन यह किसानों तक न पहुंचकर बिचौलियों के हाथ लग जाता है। लेकिन अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगता है। जिसका नतीजा है कि लोग फूलों की खेती करने के बजाय अन्य काम करना मुनासिब समझ रहे है।
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- गेंदा व गुलाब की चार हेक्टेयर खेती के लिए किसानों को पंजीकरण कराना होगा। खेती करने वाले किसानों को शासन की ओर से लागत की 50 फीसदी सब्सडी दी जाती है जो किसानों के खाते में भेजी जाती है। जिला उद्यान विभाग बलिया में पंजीयन कराना होता है। किसानों को पंजीयन कराने के दौरान आधार कार्ड, इंतखाफ, बैंक पासबुक की छायाप्रति के साथ ही दो फोटो व मोबाइल नंबर लाना होगा। गेंदा के लिए दो हेक्टेयर तथा गुलाब की खेती के लिए दो हेक्टेयर के लिए पंजीयन कराना होगा।
- नेपाल राम, जिला उद्यान अधिकारी, बलिया
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पांच हजार एकड़ की बजाय अब 20 एकड़ में होती है खेती
बलिया। लोगों की माने तो पांच हजार एकड़ में फूलों की खेती होती थी। लेकिन अब वह महज 15 से 20 एकड़ में खेती हो रही है। करीब 200 कुंतल से अधिक प्रतिदिन फूल निकलता था। लेकिन वर्तमान में 10-12 कुंतल ही फूलों का उत्पादन हो पाता है। किसानों को प्रतिदिन दो लाख रुपये तक की आय होती थी। लेकिन अब 10 से 12 हजार रुपये हो गया है। इसी प्रकार करीब 20 कारखाने चलते थे। जबकि फरवरी व मार्च महीने में एक साथ अस्थाई दर्जनों कारखाने चलते थे। लेकिन वर्तमान में मात्र एक-दो कारखाने ही चल रहे है।
नालियां भी बिखेरती थी खुशबूू
बलिया। सिकंदरपुर क्षेत्र की नालियां अपने अच्छे दिनों में इत्र व फूलों की खुशबू बिखेरती थी। इसके पीेछे कहा जाता था कि कारखानों द्वारा गुलाब जल और इत्र निकलने के बाद बचे हुए पानी को नाले और नालियों में गिरा दिया जाता था। जिसके कारण नाले और नालियों में से खुशबू निकलती थी।
गुलाब सकरी की विदेशों तक थी मांग
बलिया। सिकंदरपुर क्षेत्र गुलाब की खेती से इत्र, गुलाब जल, केवड़ा, गुलाब सकरी बनाई जाती थी। यहां कि गुलाब सकरी इतनी प्रसिद्ध थी कि देश के अलावा विदेशों में इसकी खूब डिमांड थी। फरवरी माह से लेकर जून तक इसकी जोरदार तरीके से बिक्री होती थी। कस्बा निवासी दुकानदार मुन्ना मोदनवाल का कहना है कि पहले गर्मी के दिनों में लोग ठंडई के रूप में इसका इस्तेमाल करते थे। आज भी लोग इसका इस्तेमाल लोग भरपूर करते है। इससे जहां पेट साफ हो जाता है, वहीं शरीर भी काफी फुर्तीला रहता है।