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अपने बड़े घर में बनाने दें इन्हें भी अपना आशियाना

Sun, 20 Mar 2022 11:09 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 20 Mar 2022 11:09 PM IST
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Let them also make your home in your big house
बैरिया। गिद्ध तो द्वाबा की धरती से पहले ही विलुप्त हो चुके हैं, अब गौरेया भी गुम होती जा रही है। समय रहते यदि हम नहीं चेते तो गौरैया समेत कई पक्षी अब किस्से- कहानियों में ही मिलेंगे। यदि आप भूले न हो तो आपकी भी यादों में दो दशक पहले तक गिद्धों के झुंड दिखने आम थे। लेकिन याद करें कि अब आपने आखिरी बार कब ये झुंड देखा था। चलिए ये छोड़िए ये बताइए चहचहाती गौरेइयों को देखे कितने दिन हो गए। हो सकता है कि आप उन खुशनसीब लोगों में से हों जिनके घर-आंगन, मुंडेर, बालकनी में अब भी गौरेया फुदकती हो, तो यकिन मानिए आप उन कुछ खुशनसीब लोगों में से हैं जिन्हें ये देखना नसीब है। इससे पहले ये नजारा हफ्ते फिर महीने और फिर वर्षों में एक दिन दिखे या फिर कभी नहीं देखने को मिले तो संभल जाइए। अच्छा आज विश्व गौरैया दिवस पर ऐसा क्यों नहीं करते अपने घरों में इस नन्हीं जान को भी अपना आशियाना बनाने दें , इन्हें फुदकने दें, चहचहाने दें ताकि आने वाली पीढ़ी को ये न बताना पड़े कि एक थी गौरेया...
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यूं तो गौरैया की संख्या में कमी के कई कारण हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण वजह तो ये है कि ये नन्हीं चिड़िया तो बस इंसान की तरक्की की कीमत चुका रहीं हैं। गांवों में लोग कहा करते हैं कि जिस घरों में गोरैया अपना घोंसला नहीं बनाती वो घर शुभ नहीं रहता। इस प्यारी पक्षी का घर के आंगन में चहचहाना, फुदकना, मुड़ेरी पर बैठना। सुबह शाम तिनके बिखेरना और घूम फिरकर रात में घर में ही बस जाना ही शुभ और संपन्नता माना जाता है। जो लोग चिड़ियों का शिकार भी करते हैं वो भी गौरेया नहीं मारते। पहले गांवों के घरों में कुछ लोग गौरेया के लिए धानों की मोजर आंगन के चारों ओर ओरियों के नीचे लटकाए रहते हैं। सवाल यह है कि ऐसी क्या बात हुई कि बारहों महीनों हमारे साथ रहने वाले गगन से लेकर आंगन तक के पक्षी विलुप्त होते जा रहे है। यह दर्द सिर्फ गौरेया का नहीं है बेशुमार जीवधारी जीवन शैली में आए उस बदलाव का शिकार हुए हैं। इसके जिम्मेदार इंसान ही है। अब भी बहुत देर नहीं हुई है। सबको समझना होगा कि दुनिया सबकी साझी है। कुदरत की निगाह में हर जान की बराबर कीमत है। इससे पहले कि इन मासूमों की जान बचाने के लिए इंसान को चेत जाने में ही समझदारी है।
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सवाल उठना लाजिमी है कि कई लोगों के दिल में ये दर्द और चिंता है तो क्या करें, कैसे करें। तो हमारी मानें ज्यादा कुछ नहीं बस गर्मियों में इसके लिए पानी रख दें कुछ दाने बिखेर दें फि र देखें कैसे ये नन्हीं मेहमान अपनी टोली के साथ आपके घर आंगन में खुशियां और बरकत लेकर आती है। इनकी चहचहाट पल भर में आपका सारा तनाव गायब कर देंगी और भर उठेंगे आप सक रात्मकता से। तनाव, निराशा, परेशानियों को दूर करने की ये दवा इतनी महंगी भी नहीं, बस एक बार इन्हें बुलाइए तो ।
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प्रभावित करता है रेडिएशन
बैरिया। रेडिएशन टावर गौरैया के रहन सहन को प्रभावित करता है। हालांकि वन विभाग ने अभियान चलाकर गौरैया पक्षी में बढ़ोत्तरी की है। स्कूली बच्चे काठ का पिजरा बनाकर पेड़ों पर रख पर्यावरण संतुलन बनाने में सहयोग कर सकते हैं। मौजूदा समय मे गर्मी के मौसम में छतों पर दाना-पानी के साथ मिट्टी के बर्तन में पीने का पानी रखें। ताकि पक्षियों की मौत पानी के कारण न हो सके।

राजेश श्रीवास्तव, वन क्षेत्राधिकारी
पानी की कमी भी भारी
बैरिया। गर्मी की मौसम अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। भीषण गर्मी से आम लोग ही नही पशु-पक्षी भी व्याकुल है। तहसील क्षेत्र के दियारांचल व ग्रामीण इलाकों के ताल, तलैया, पोखरे सूखे पड़े हैं। जलाभाव के कारण प्यास से पशु-पक्षी भटक रहे हैं। ऐसे में खासकर के जंगली पशु-पक्षियों की मौत का कारण जलाभाव बन सकता है।
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