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रिस रहा रेग्यूलेटर, फसलें हो रहीं बर्बाद

Fri, 11 Sep 2015 11:45 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला बलिया
ब्यूरो/अमर उजाला बलिया Updated Fri, 11 Sep 2015 11:45 PM IST
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Leaking regulator , crops were ruined
बैरिया तहसील में बने बीएसटी बंधे पर रेग्यूलेटर में चार फाटक लगे हैं जिसकी पहले हर साल मरम्मत होती थी।  लेकिन पिछले तीन साल से मरम्मत नहीं होने से रेग्यूलेटर में जहां-तहां रिसाव हो रहा है। विशेष रूप से बाढ़ के दौरान यह तेज हो जाता है। इस वजह से पिछले दो वर्षों से क्षेत्र की खड़ी फसलें पानी में डूबकर सड़ जाती है।
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ऐसे में क्षेत्र के किसानों ने शासन-प्रशासन से रेग्यूलेटर की मरम्मत की मांग की है ताकि करीब 200 बीघे फसल को बर्बाद होने से बचाया जा सके। इस मुद्दे पर बात करने पर इलाके के किसानों ने अपनी व्यथा कुछ यूं  सुनाई।
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 किसान दुर्ग विजय सिंह झल्लन ने कहा कि बाढ़ विभाग की लापरवाही से रेग्यूलेटर की मरम्मत विगत दो सालों से नहीं हो रही है। जिससे इस रेग्यूलेटर से पानी का रिसाव हो रहा है। परिणाम स्वरूप करीब 200 बीघे में खड़ी फसलें हर साल बर्बाद हो रही हैं। शिकायत के बावजूद संबंधित अधिकारियों के कानों पर जू तक नहीं रेंग रही है।
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किसान एवं ग्राम प्रधान विनोद यादव का कहना है कि बीएसटी (बैरिया-संसारटोला बांध) रेग्यूलेटर का निर्माण बंधे पर पानी के दबाव कम करने के लिए बनाया गया। पहले विभाग इसकी देखरेख करता था। लेकिन गत दो वर्षों से इसकी मरम्मत विभाग नहीं करा रहा है। जिससे बाढ़ के सामान्य दिनों में भी पानी का रिसाव होता रहता है। जिससे किसानों की फसलें सड़कर बर्बाद हो रही है।

किसान एवं प्रधान प्रतिनिधि आलोक सिंह का कहना है कि बीएसटी बंधे पर बने रेग्यूलेटर के रिसाव से क्षेत्र के शांतिनगर, मठ धज्जू गिरि के मठिया, लक्ष्मणछपरा, शोभाछपरा, बाबू के डेरा, कृष्णानगर, संसार टोला, शंकर नगर, धतुरी टोला, भवन टोला, टोला फखरू राय सहित अन्य गांवों की खड़ी फसलें पानी से डूबकर सड़ रही है। विभागीय अधिकारियों को तुरंत इसे सही कराना चाहिए।


किसान और बसपा नेता श्यामू ठाकुर ने बताया कि अपने को किसानों की हितैषी बनने वाली ये सरकार किसानों के लाख गुहार के बावजूद उनके नुकसान पर ध्यान नहीं दे रही है। यदि किसानों की चिंता होती तो रेग्यूलेटर का मरम्मत करा रिसाव को रोकर बर्बाद हो रहे किसानों की खड़ी फसलों को बचाने का प्रयास करती। लेकिन आलम यह है कि किसानों के शिकायत के बाद भी अधिकारी या जनप्रतिनिधि के कान पर जू नहीं रेंग रही। इससे हर साल किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है।
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