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सीवर निर्माण घोटालाः एक्सईएन ने दिया इस्तीफा, अधीक्षण अभियंता बोले, नहीं स्वीकार किया इस्तीफा
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बलिया। शहर में 13 वर्षों से निर्माणाधीन सीवर निर्माण की बुनियाद ही फर्जीवाड़े पर टिकी है। करोड़ों का कार्य लेने के लिए फर्म की ओर से नकली बैंक गारंटी जमा की गई। सब कुछ जानते हुए भी जल निगम के अधिकारी इस पर पर्दा डाले रहे। करीब दो माह पहले जब डीएम ने सख्ती दिखाई तो अधिशासी अभियंता ने बताया कि 30 लाख की बैंक गारंटी को ही 3 करोड़ 6 लाख 76 हजार 100 दिखाकर फर्म ने ठेका ले लिया था। उधर, इस मामले में एक्सईएन जल निगम ने गुरुवार को अपना इस्तीफा जल निगम के अधीक्षण अभियंता को भेज दिया।
वर्ष 2006-07 में तत्कालीन नगर विकास मंत्री की पहल पर सीवर योजना की शुरुआत की गई। प्रदेश सरकार ने सीवर निर्माण के लिए कुल 97.22 करोड़ की धनराशि स्वीकृति की थी। सीवर निर्माण के लिए शहर को दो भागों में बांटा गया। सिटी जोन की लागत जहां 52.22 करोड़ और सिविल लाइन जोन के लिए 45 करोड़ की लागत तय थी। कुल 97.22 करोड़ में से 12 करोड़ की धनराशि एसटीपी निर्माण के लिए तय थी। शासन से कार्ययोजना स्वीकृत होने के बाद सीवर निर्माण के लिए कार्यदायी संस्था जल निगम को नामित किया। विभाग ने इस कार्य का ठेका मेसर्स ज्योति बिल्डर को दे दिया।
सीवर योजना का ठेका देने से निर्माण तक में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की गई। यही कारण है कि 13 सालों बाद सीवर का न तो निर्माण पूरा हुआ और न ही इसका संचालन हो सका। करीब दो माह पहले वाराणसी में सीवर घोटाला सामने आने के बाद शासन ने जब सभी जिलाधिकारियों को सीवर कार्य की पड़ताल का निर्देश दिया तो डीएम ने सीवर निर्माण की पड़ताल की और काम पूरा न होने पर सख्ती दिखाई।
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डीएम ने जल निगम के अधिशासी अभियंता से ठेका देने से लेकर स्पष्टीकरण मांगा तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। अधिशासी अभियंता ने बताया कि मेसर्स ज्योति बिल्डटेक प्रा. लि. द्वारा प्रस्तुत बैंक गारंटी व ग्रीनलीफ नकली है। स्थानीय बैंक मैनेजर ने अवगत कराया है कि मात्र 30 लाख की बैंक गारंटी है जिसे तीन करोड़ छह लाख 76 हजार 100 रुपये के करीब दिखाया गया है और उसका सत्यापन भी पार्टी द्वारा प्रस्तुत किया गया है। एक्सईएन ने पत्र में यह भी बताया है कि सत्यापन में बैंक का नाम अलग है और मुहर में बैंक का नाम अलग है, इससे संदेह की पुष्टि होती है।
पुन: दूसरी बैंक गारंटी 15 मई 2018 को प्रस्तुत की गई जिसका सत्यापन कराया गया जो सही पाया गया। इसके बाद डीएम ने एक्सईएन को पत्र भेज कर बताया कि उनका स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं है। बताया कि 15 मई 18 को द्वारा जो बैंक गारंटी दिया है वह तीन करोड़ से अधिक का होना चाहिए जबकि वह 1.53 करोड़ की है। जिलाधिकारी ने अधिशासी अभियंता से पूछा है कि यदि फर्म ने पूर्व में नकली बैंक गारंटी दी गई थी तो संबंधित फर्म के खिलाफ मुकदमा दर्ज क्यों नहीं कराया गया। जनता की शिकायतों व परियोजना के अत्यधिक विलंब के कारण फर्म की बैंक गारंटी जब्त क्यों नहीं की गई।
जल निगम के अधिशासी अभियंता ने बताया कि सत्यापन व जांच में सीवर का कार्य लेने वाले फर्म की बैंक गारंटी नकली मिली थी। फर्म ने 15 मई 18 को जो बैंक गारंटी दी वह सत्यापन में सही मिला। इस मामले की पूरी रिपोर्ट जिलाधिकारी व उच्चाधिकारियों को भेज दी गई है। कार्रवाई उच्चाधिकारियों के स्तर से होनी है।
उधर, जल निगम के अधीक्षण अभियंता को भेजे गए त्याग पत्र में अधिशासी अभियंता कायम हुसैन ने लिखा है कि यहां के सहायक अभियंता व जूनियर इंजीनियर उनके साथ काम करने के लिए सहमत नहीं है। इसलिए उनका त्याग पत्र 26 सितंबर के अपराह्न से माना जाए और किसे प्रभार दिया जाए आदेशित किया जाए। यह भी लिखा है कि आपसे कई बार बुलंदशहर पोस्ट कराने का अनुरोध किया लेकिन नहीं हुआ। इस बाबत जल निगम के अधीक्षण अभियंता एम सी श्रीवास्तव ने पुष्टि करते हुए कहा की अधिशासी अभियंता का त्याग पत्र प्राप्त हुआ है लेकिन अभी स्वीकृत नहीं किया गया है।
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वर्ष 2006-07 में तत्कालीन नगर विकास मंत्री की पहल पर सीवर योजना की शुरुआत की गई। प्रदेश सरकार ने सीवर निर्माण के लिए कुल 97.22 करोड़ की धनराशि स्वीकृति की थी। सीवर निर्माण के लिए शहर को दो भागों में बांटा गया। सिटी जोन की लागत जहां 52.22 करोड़ और सिविल लाइन जोन के लिए 45 करोड़ की लागत तय थी। कुल 97.22 करोड़ में से 12 करोड़ की धनराशि एसटीपी निर्माण के लिए तय थी। शासन से कार्ययोजना स्वीकृत होने के बाद सीवर निर्माण के लिए कार्यदायी संस्था जल निगम को नामित किया। विभाग ने इस कार्य का ठेका मेसर्स ज्योति बिल्डर को दे दिया।
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सीवर योजना का ठेका देने से निर्माण तक में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की गई। यही कारण है कि 13 सालों बाद सीवर का न तो निर्माण पूरा हुआ और न ही इसका संचालन हो सका। करीब दो माह पहले वाराणसी में सीवर घोटाला सामने आने के बाद शासन ने जब सभी जिलाधिकारियों को सीवर कार्य की पड़ताल का निर्देश दिया तो डीएम ने सीवर निर्माण की पड़ताल की और काम पूरा न होने पर सख्ती दिखाई।
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डीएम ने जल निगम के अधिशासी अभियंता से ठेका देने से लेकर स्पष्टीकरण मांगा तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। अधिशासी अभियंता ने बताया कि मेसर्स ज्योति बिल्डटेक प्रा. लि. द्वारा प्रस्तुत बैंक गारंटी व ग्रीनलीफ नकली है। स्थानीय बैंक मैनेजर ने अवगत कराया है कि मात्र 30 लाख की बैंक गारंटी है जिसे तीन करोड़ छह लाख 76 हजार 100 रुपये के करीब दिखाया गया है और उसका सत्यापन भी पार्टी द्वारा प्रस्तुत किया गया है। एक्सईएन ने पत्र में यह भी बताया है कि सत्यापन में बैंक का नाम अलग है और मुहर में बैंक का नाम अलग है, इससे संदेह की पुष्टि होती है।
पुन: दूसरी बैंक गारंटी 15 मई 2018 को प्रस्तुत की गई जिसका सत्यापन कराया गया जो सही पाया गया। इसके बाद डीएम ने एक्सईएन को पत्र भेज कर बताया कि उनका स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं है। बताया कि 15 मई 18 को द्वारा जो बैंक गारंटी दिया है वह तीन करोड़ से अधिक का होना चाहिए जबकि वह 1.53 करोड़ की है। जिलाधिकारी ने अधिशासी अभियंता से पूछा है कि यदि फर्म ने पूर्व में नकली बैंक गारंटी दी गई थी तो संबंधित फर्म के खिलाफ मुकदमा दर्ज क्यों नहीं कराया गया। जनता की शिकायतों व परियोजना के अत्यधिक विलंब के कारण फर्म की बैंक गारंटी जब्त क्यों नहीं की गई।
जल निगम के अधिशासी अभियंता ने बताया कि सत्यापन व जांच में सीवर का कार्य लेने वाले फर्म की बैंक गारंटी नकली मिली थी। फर्म ने 15 मई 18 को जो बैंक गारंटी दी वह सत्यापन में सही मिला। इस मामले की पूरी रिपोर्ट जिलाधिकारी व उच्चाधिकारियों को भेज दी गई है। कार्रवाई उच्चाधिकारियों के स्तर से होनी है।
उधर, जल निगम के अधीक्षण अभियंता को भेजे गए त्याग पत्र में अधिशासी अभियंता कायम हुसैन ने लिखा है कि यहां के सहायक अभियंता व जूनियर इंजीनियर उनके साथ काम करने के लिए सहमत नहीं है। इसलिए उनका त्याग पत्र 26 सितंबर के अपराह्न से माना जाए और किसे प्रभार दिया जाए आदेशित किया जाए। यह भी लिखा है कि आपसे कई बार बुलंदशहर पोस्ट कराने का अनुरोध किया लेकिन नहीं हुआ। इस बाबत जल निगम के अधीक्षण अभियंता एम सी श्रीवास्तव ने पुष्टि करते हुए कहा की अधिशासी अभियंता का त्याग पत्र प्राप्त हुआ है लेकिन अभी स्वीकृत नहीं किया गया है।