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तार-तार होती रही मानवता
अमर उजाला ब्यूरो /बलिया
Updated Fri, 09 Dec 2016 10:51 PM IST
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मानवाधिकार हनन की घटनाओं से जनपद में मानवता कई बार तार-तार हुई। इसके प्रति सजग रहने और आवाज उठाने की जरूरत है। पुलिस प्रशासन की बेरुखी के चलते मानवाधिकार हनन की घटनाओं को बल मिलता है। इस पर अंकुश लगाने के लिए कुछ संगठन सक्रिय हैं। इन संगठनों ने समय-समय पर मानवाधिकार हनन के मामलों में हस्तक्षेप किया और पीड़ितों को न्याय दिलाकर मानवता को शर्मसार होने से बचाया।
जानकारों की माने तो जिले में हर साल 100 के आसपास मानवाधिकार हनन के मामले आते हैं। थानों में हर जगह मानवाधिकार का बोर्ड देखने को जरूर मिलता है। लेकिन उसका पालन मुश्किल से होता है। अक्सर पुलिस की कार्यशैली और प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही से मानवाधिकार का हनन होता रहता है। फिर भी पहले की अपेक्षा अब मानवाधिकार हनन में कमी आई है। अब लोग मानवाधिकार को लेकर जागरूक हुए हैं। मानवाधिकार संगठन डीएसएचआरडी के जिलाध्यक्ष रामसेवक के मुताबिक हर साल जिले में 100 के आसपास मानवाधिकार के मामले आते हैं। जिसका निस्तारण मानवाधिकार संगठन अपने स्तर से कराने का हर संभव प्रयास करता है और सफलता भी मिलती है। जरूरत पड़ने पर मानवाधिकार के मामलों को प्रदेश और देश स्तर पर पहुंचाया जाता है।
बताया कि मावाधिकारों की सुरक्षा के लिए जिला स्तर पर चार प्रकोष्ठ बनाए गए हैं, जिसमें सामान्य, एससी-एसटी, महिला और अल्पसंख्यक हैं। सभी प्रकोष्ठ के सदस्यों की संख्या 11-11 होती है। यह प्रकोष्ठ पीड़ित व्यक्ति द्वारा 10 रुपये के स्टांप पेपर पर लिखकर शिकायत करता है, तो टीम उसकी जांच कर उसे न्याय दिलाती है। यदि मामला कोर्ट में है तो संगठन इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करता है।
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जानकारों की माने तो जिले में हर साल 100 के आसपास मानवाधिकार हनन के मामले आते हैं। थानों में हर जगह मानवाधिकार का बोर्ड देखने को जरूर मिलता है। लेकिन उसका पालन मुश्किल से होता है। अक्सर पुलिस की कार्यशैली और प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही से मानवाधिकार का हनन होता रहता है। फिर भी पहले की अपेक्षा अब मानवाधिकार हनन में कमी आई है। अब लोग मानवाधिकार को लेकर जागरूक हुए हैं। मानवाधिकार संगठन डीएसएचआरडी के जिलाध्यक्ष रामसेवक के मुताबिक हर साल जिले में 100 के आसपास मानवाधिकार के मामले आते हैं। जिसका निस्तारण मानवाधिकार संगठन अपने स्तर से कराने का हर संभव प्रयास करता है और सफलता भी मिलती है। जरूरत पड़ने पर मानवाधिकार के मामलों को प्रदेश और देश स्तर पर पहुंचाया जाता है।
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बताया कि मावाधिकारों की सुरक्षा के लिए जिला स्तर पर चार प्रकोष्ठ बनाए गए हैं, जिसमें सामान्य, एससी-एसटी, महिला और अल्पसंख्यक हैं। सभी प्रकोष्ठ के सदस्यों की संख्या 11-11 होती है। यह प्रकोष्ठ पीड़ित व्यक्ति द्वारा 10 रुपये के स्टांप पेपर पर लिखकर शिकायत करता है, तो टीम उसकी जांच कर उसे न्याय दिलाती है। यदि मामला कोर्ट में है तो संगठन इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करता है।
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