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रात में नहीं, दिन में होती है यहां रामलीला
ब्यूरो,अमर उजाला,बलिया
Updated Tue, 27 Sep 2016 08:05 PM IST
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रामायण महाभारत
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जिले के अंतिम छोर पर स्थित बरौली की रामलीला देखने के लिए आज भी हजारों लोगों की भीड़ उमड़ती हैं। पात्रों के जीवंत मंचन देख दर्शक भाव विभोर हो जाते हैं। इस ऐतिहासिक रामलीला को देखने के लिए जनपद ही नहीं बल्कि गैर जनपद के लोग भी पहुंचते हैं।
बरौली रामलीला की शुरुआत वर्ष 1926 बाबा योगेश्वर यतिजी महाराज ने कराया था। वहीं के चकबंदी अधिकारी रहे हासिम अली ने पुत्र प्राप्ति के उपरांत राम भवन का निर्माण कराया था। जबकि गांव के शिवधनी धोबी ने राम चबूतरा का निर्माण कराया। रामलीला के दौरान यहां 10 दिनों तक मेले का माहौल रहता है।
इसकी विशेषता है कि रामलीला का मंचन रात में ही नहीं बल्कि दिन में भी होता है। यही नहीं रामलीला की शुरूआत पितृ विर्सजन पर शुरू होकर विजयदशमी तक चलती है। इब्राहिमपट्टी बरौली के नाम से प्रसिद्ध इस ऐतिहासिक रामलीला का मंचन एक स्थान पर नहीं बल्कि गांव के ही अगल-अलग स्थानों पर होती है।
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जिसमें राम वन गमन का मंचन गांव के पोखरे पर किया जाता है। जबकि पोखरे में राम-केवट संवाद होता है। वहीं अन्य कार्यक्रमों का मंचन रामलीला मैदान में होता है। राज्याभिषेक के बाद रामलीला मैदान में विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। पूरे कार्यक्रम का आयोजन लोगों से मिले चंदे से कराया जाता है। लोगों में मान्यता है राम चबूतरा पर जो भी आकर मन्नत मांगता है उसकी मन्नत आवश्य पूरी होती है।
गांव के बुजुर्गों की माने तो इस रामलीला को देखने के लिए रामनगर के राजा भी यहां पहुंचे थे। जिन्होंने रावण, परशुराम और लक्ष्मण का संवाद सुनकर भाव विभोर हो गए थे। उन्होंने रामलीला कमेटी से रामनगर के रामलीला में मंचन की बात कही थी। लेकिन रामलीला के पात्रों ने इंकार कर दिया था। यहां के पात्र रसड़ा के रामलीला में भी मंचन करते हैं।
इस रामलीला के मान्यता है कि राम, लक्ष्मण, सीता, रावण, हनुमान, परशुराम जैसे पात्र ब्राह्मण ही होते हैं। यही नहीं राम, लक्ष्मण और सीता के पात्र अविवाहित होते हैं। इस बार के रामलीलीला में राम के रूप में मऊ जनपद के सुल्तानपुर निवासी पीयूष पांडे लक्ष्मण के रूप में योगेश पांडेय, सीता के रूप में शिवम उपाध्याय, रावण के रूप में रमेश पांडेय होंगे।
यहां के पात्र को रामायण के छंद, चौपाई की अच्छी जानकारी है। जिससे रामलीला मंचन के दौरान पात्रों द्वारा छंदों और चौपायों का उपयोग कर मंचन को जीवंत बना देते हैं। पात्रों द्वारा प्रस्तुत करुण, वीर, हास्य और शृंगार रस प्रस्तुत कर दर्शकों का मन मोह लेते हैं।
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बरौली रामलीला की शुरुआत वर्ष 1926 बाबा योगेश्वर यतिजी महाराज ने कराया था। वहीं के चकबंदी अधिकारी रहे हासिम अली ने पुत्र प्राप्ति के उपरांत राम भवन का निर्माण कराया था। जबकि गांव के शिवधनी धोबी ने राम चबूतरा का निर्माण कराया। रामलीला के दौरान यहां 10 दिनों तक मेले का माहौल रहता है।
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इसकी विशेषता है कि रामलीला का मंचन रात में ही नहीं बल्कि दिन में भी होता है। यही नहीं रामलीला की शुरूआत पितृ विर्सजन पर शुरू होकर विजयदशमी तक चलती है। इब्राहिमपट्टी बरौली के नाम से प्रसिद्ध इस ऐतिहासिक रामलीला का मंचन एक स्थान पर नहीं बल्कि गांव के ही अगल-अलग स्थानों पर होती है।
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जिसमें राम वन गमन का मंचन गांव के पोखरे पर किया जाता है। जबकि पोखरे में राम-केवट संवाद होता है। वहीं अन्य कार्यक्रमों का मंचन रामलीला मैदान में होता है। राज्याभिषेक के बाद रामलीला मैदान में विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। पूरे कार्यक्रम का आयोजन लोगों से मिले चंदे से कराया जाता है। लोगों में मान्यता है राम चबूतरा पर जो भी आकर मन्नत मांगता है उसकी मन्नत आवश्य पूरी होती है।
गांव के बुजुर्गों की माने तो इस रामलीला को देखने के लिए रामनगर के राजा भी यहां पहुंचे थे। जिन्होंने रावण, परशुराम और लक्ष्मण का संवाद सुनकर भाव विभोर हो गए थे। उन्होंने रामलीला कमेटी से रामनगर के रामलीला में मंचन की बात कही थी। लेकिन रामलीला के पात्रों ने इंकार कर दिया था। यहां के पात्र रसड़ा के रामलीला में भी मंचन करते हैं।
इस रामलीला के मान्यता है कि राम, लक्ष्मण, सीता, रावण, हनुमान, परशुराम जैसे पात्र ब्राह्मण ही होते हैं। यही नहीं राम, लक्ष्मण और सीता के पात्र अविवाहित होते हैं। इस बार के रामलीलीला में राम के रूप में मऊ जनपद के सुल्तानपुर निवासी पीयूष पांडे लक्ष्मण के रूप में योगेश पांडेय, सीता के रूप में शिवम उपाध्याय, रावण के रूप में रमेश पांडेय होंगे।
यहां के पात्र को रामायण के छंद, चौपाई की अच्छी जानकारी है। जिससे रामलीला मंचन के दौरान पात्रों द्वारा छंदों और चौपायों का उपयोग कर मंचन को जीवंत बना देते हैं। पात्रों द्वारा प्रस्तुत करुण, वीर, हास्य और शृंगार रस प्रस्तुत कर दर्शकों का मन मोह लेते हैं।