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पुरखों ने बनाया मकां, बच्चे अपने हाथों तोड़ रहे
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केहरपुर (बलिया)। गंगा के किनारे बसे इस गांव और परेशानियों का नाता बहुत पुराना है। पहले ही आर्सेनिक की विपदा से जुझ रहे इस गांव पर इस बार मां गंगा की नजरें भी टेढ़ी हो गईं। हाल ये है कि आर्सेनिक से बचाने के लिए बनाया गया ओवरहेड टैंक गंगा में समा गया है। प्राथमिक विद्यालय का अस्तित्व मिट गया है और अस्पताल के नाम पर बनी बिल्डिंग भी स्वास्थय विभाग को हैंडओवर होने से पहले ही गंगा में समाने की कगार पर है। गांव के तीन लोगों के मकां ढह गए हैं और बाकी बचे लोग भी अपनों को दूसरे इलाकों में पहुंचाकर गांव में इस उम्मीद में बैठे हैं कि शायद प्रशासन की नींद खुलेगी और उनके मकान यदि नहीं भी बच पाए तो उनके अवशेषों को सहेजने में उन्हें मदद मिल जाएगी। किसी के पिता ने तो किसी के बाबा ने बड़े अरमानों से अपने बच्चों के रहने के लिए जिस छत का निर्माण कराया था, अब उसी छत को वही बच्चे तोड़ने को मजबूर हैं। गंगा ने गांव को चारों ओर से घेर लिया है और अब नाव के अलावा गांव में जाने का कोई सहारा नहीं है। गांव में बने लगभग 50 से अधिक मकान कभी भी ध्वस्त होने की कगार पर हैं।
जब हम किसी तरह नाव के सहारे केहरपुर पहुंचे तो एयरफोर्स से रिटायर प्रभुनाथ ओझा अपने हाथों से अपने मकान को तोड़ रहे थे। उनके हाथ के हथौड़े की चोट से एक तरफ मकान की ईंटें गिर रही थीं, तो दूसरी ओर उनकी आंखों से पुस्तैनी घर को खोने के गम में आंखों से आंसूओं की धार बह रही थी। उन्होंने बताया कि पिता स्व. परशुराम ओझा ने बड़े शौक से 1957 में मकान का निर्माण कराया था। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा भी दिन आएगा जब अपने ही हाथ से अपने ही आशियाने को तोड़ना पड़ेगा। बताया कि वे कुल चार भाई हैं और सभी के परिवार आपस में बड़े मेल मिलाप से रहते हैं। दो छोटे भाईयों रमाकांत ओझा और रमाशंकर ओझा का परिवार भी इसी मकान में रहता था। एक भाई सत्यनारायण ओझा दिल्ली में अपने परिवार को लेकर रहता है। रविवार को गांव के तीन मकान और स्कूल आदि गिरने के बाद तीनों भाईयों ने अपने परिवार की महिलाओं और बच्चों को दूसरे गांवों में पहुंचा दिया है। तीनों भाई इस उम्मीद में गांव में जमे हुए हैं यदि प्रशासन की ओर से कोई मदद मिल जाएगी तो वे मकान में मौजूद अपने कीमती और यादगार सामानों को बचा सकेंगे। कारण कि गांव का संपर्क पूरी तरह से कट चुका है और जब तक प्रशासन नांव आदि की व्यवस्था नहीं करता वे अपने सामान गांव से बाहर नहीं निकाल पाएंगे।अपने मकान के गिरने के इंतजार में बैठे हरिभजन ओझा तो जैसे भरे बैठे थे। कोई सवाल पूछने से पहले ही फट पड़े। इस जिले में प्रशासन नाम की कोई चीज नहीं है। शुक्रवार से ही गांव में गंगा का कहर टूट रहा है और अब तक किसी ने इधर की सुधि नहीं ली। फोन करने पर अधिकारी कह रहे हैं कि बचाव दल पहुंचने ही वाला है, लेकिन हकीकत ये है कि कोई भी अब तक झांकने तक नहीं आया। महिलाओं व बच्चों को किसी तरह दूसरे गांव में किराए का मकान लेकर रख दिया है, लेकिन बिना प्रशासन के मदद के मकान में मौजूद सामान आखिर कैसे यहां से बाहर ले जाएं। इन्होंने बताया कि पिता स्व. नारायण दत्त ओझा ने 1965 में बड़े उत्साह से मकान बनवाया था और उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उनके ही बेटों को अपना ही मकान ढहाने की नौबत आ जाएगी। गांव में मौजूद परमेश्वर दुबे, रमाशंकर चौबे, शिवजी सिंह, राजेश सिंह, परमात्मानंद ओझा आदि भी अपने मकान की एक-एक ईंट उजाड़ने में जुटे थे। सभी इस उम्मीद पर टिके थे कि प्रशासन उनकी मदद को आगे आएगा जिससे वे अपने पुरखों की यादों को सहेजकर रख सकेंगे।
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जब हम किसी तरह नाव के सहारे केहरपुर पहुंचे तो एयरफोर्स से रिटायर प्रभुनाथ ओझा अपने हाथों से अपने मकान को तोड़ रहे थे। उनके हाथ के हथौड़े की चोट से एक तरफ मकान की ईंटें गिर रही थीं, तो दूसरी ओर उनकी आंखों से पुस्तैनी घर को खोने के गम में आंखों से आंसूओं की धार बह रही थी। उन्होंने बताया कि पिता स्व. परशुराम ओझा ने बड़े शौक से 1957 में मकान का निर्माण कराया था। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा भी दिन आएगा जब अपने ही हाथ से अपने ही आशियाने को तोड़ना पड़ेगा। बताया कि वे कुल चार भाई हैं और सभी के परिवार आपस में बड़े मेल मिलाप से रहते हैं। दो छोटे भाईयों रमाकांत ओझा और रमाशंकर ओझा का परिवार भी इसी मकान में रहता था। एक भाई सत्यनारायण ओझा दिल्ली में अपने परिवार को लेकर रहता है। रविवार को गांव के तीन मकान और स्कूल आदि गिरने के बाद तीनों भाईयों ने अपने परिवार की महिलाओं और बच्चों को दूसरे गांवों में पहुंचा दिया है। तीनों भाई इस उम्मीद में गांव में जमे हुए हैं यदि प्रशासन की ओर से कोई मदद मिल जाएगी तो वे मकान में मौजूद अपने कीमती और यादगार सामानों को बचा सकेंगे। कारण कि गांव का संपर्क पूरी तरह से कट चुका है और जब तक प्रशासन नांव आदि की व्यवस्था नहीं करता वे अपने सामान गांव से बाहर नहीं निकाल पाएंगे।अपने मकान के गिरने के इंतजार में बैठे हरिभजन ओझा तो जैसे भरे बैठे थे। कोई सवाल पूछने से पहले ही फट पड़े। इस जिले में प्रशासन नाम की कोई चीज नहीं है। शुक्रवार से ही गांव में गंगा का कहर टूट रहा है और अब तक किसी ने इधर की सुधि नहीं ली। फोन करने पर अधिकारी कह रहे हैं कि बचाव दल पहुंचने ही वाला है, लेकिन हकीकत ये है कि कोई भी अब तक झांकने तक नहीं आया। महिलाओं व बच्चों को किसी तरह दूसरे गांव में किराए का मकान लेकर रख दिया है, लेकिन बिना प्रशासन के मदद के मकान में मौजूद सामान आखिर कैसे यहां से बाहर ले जाएं। इन्होंने बताया कि पिता स्व. नारायण दत्त ओझा ने 1965 में बड़े उत्साह से मकान बनवाया था और उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उनके ही बेटों को अपना ही मकान ढहाने की नौबत आ जाएगी। गांव में मौजूद परमेश्वर दुबे, रमाशंकर चौबे, शिवजी सिंह, राजेश सिंह, परमात्मानंद ओझा आदि भी अपने मकान की एक-एक ईंट उजाड़ने में जुटे थे। सभी इस उम्मीद पर टिके थे कि प्रशासन उनकी मदद को आगे आएगा जिससे वे अपने पुरखों की यादों को सहेजकर रख सकेंगे।
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