{"_id":"57-81018","slug":"Ballia-81018-57","type":"story","status":"publish","title_hn":"सड़कों पर हार के हार चलते थे पशु","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सड़कों पर हार के हार चलते थे पशु
Ballia
Updated Sun, 18 Nov 2012 12:00 PM IST
विज्ञापन
बलिया। तब सड़कों पर हार के हार चलते थे पशु। उनके गले में बंधी घुंघरू की घंटियां सड़क पर चलने वालों को मधुर संगीत सुनाया करती थीं। पशुओं के खुरों की आवाज जहां पशुधन की प्रभुता दर्शाती थीं, वहीं कंधे पर लाठी थामे, सर पर पगड़ी बांधे पशुओं की पूंछ ऐंठते हुर्र-हुर्र की आवाज निकालते पशुपालक मनोहारी दृश्य प्रदर्शित करते थे। लेकिन अब सड़कों पर ऐसे दृश्य कम दिखाई देते हैं।
ददरी का पशु मेला भले ही प्रदेश के मेलों में दर्ज हो या न हो, लेकिन इसकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर रही है। आज भी मेले में हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, बिहार आदि प्रांतों के पशुपालक अपने पशुओं को लेकर आते हैं और पशु मेले को समृद्ध करने का पुरजोर प्रयास करते हैं। लेकिन पशु मेले के पुराने दिग्गज यही कहते हैं कि पहले के पशु मेले में बैलों, बछड़ों, भैंस, गदहों, घोड़ों की ऐसी भीड़ होती थी कि बैल हट्टा में बैल ही बैल, गाय हट्टा में गाय ही गाय तो भैंस हट्टा में जिधर देखिए भैंस ही भैंस दिखती थीं। कतार से अस्तबल में सजे घोड़ों की भरमार दिखाई देती थी। लेकिन अब वैसी बात नहीं रही। पुलिस उत्पीड़न से कराह रहे पशुपालक पशु व्यापार से धीरे-धीरे तौबा करते जा रहे हैं। पशु व्यापारियों का दर्द समझने वाला कोई नहीं है। कभी विभिन्न प्रांतों से अलग-अलग नस्लों के मवेशी लेकर ददरी मेले में पशु व्यापारी आते थे और कई दिनों तक खरीद-फरोख्त करते थे। अब बाहर के पशु व्यापारियों का आना बहुत कम हो गया है। वहीं मेले में बैल और बछड़ों की कमी खेती में मशीनीकरण की वजह से आई है। खेती में बैलों को उपयोग कम होने लगा है। यही हाल घोड़े, गदहे तथा खच्चरों का भी है। तांगे टमटम सड़क पर नाममात्र को रह गए हैं। जिसके कारण घोड़े और घोड़ी की मेले में कमी देखने को मिल रही है। हालांकि अब भी ददरी के ऐतिहासिक मेले में चार चांद लगाने के लिए पशु व्यापारियों को प्रेरित करने व दुधारू पशुओं की आवक बढ़ाने की कोशिशें जारी हैं।
विज्ञापन
ददरी का पशु मेला भले ही प्रदेश के मेलों में दर्ज हो या न हो, लेकिन इसकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर रही है। आज भी मेले में हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, बिहार आदि प्रांतों के पशुपालक अपने पशुओं को लेकर आते हैं और पशु मेले को समृद्ध करने का पुरजोर प्रयास करते हैं। लेकिन पशु मेले के पुराने दिग्गज यही कहते हैं कि पहले के पशु मेले में बैलों, बछड़ों, भैंस, गदहों, घोड़ों की ऐसी भीड़ होती थी कि बैल हट्टा में बैल ही बैल, गाय हट्टा में गाय ही गाय तो भैंस हट्टा में जिधर देखिए भैंस ही भैंस दिखती थीं। कतार से अस्तबल में सजे घोड़ों की भरमार दिखाई देती थी। लेकिन अब वैसी बात नहीं रही। पुलिस उत्पीड़न से कराह रहे पशुपालक पशु व्यापार से धीरे-धीरे तौबा करते जा रहे हैं। पशु व्यापारियों का दर्द समझने वाला कोई नहीं है। कभी विभिन्न प्रांतों से अलग-अलग नस्लों के मवेशी लेकर ददरी मेले में पशु व्यापारी आते थे और कई दिनों तक खरीद-फरोख्त करते थे। अब बाहर के पशु व्यापारियों का आना बहुत कम हो गया है। वहीं मेले में बैल और बछड़ों की कमी खेती में मशीनीकरण की वजह से आई है। खेती में बैलों को उपयोग कम होने लगा है। यही हाल घोड़े, गदहे तथा खच्चरों का भी है। तांगे टमटम सड़क पर नाममात्र को रह गए हैं। जिसके कारण घोड़े और घोड़ी की मेले में कमी देखने को मिल रही है। हालांकि अब भी ददरी के ऐतिहासिक मेले में चार चांद लगाने के लिए पशु व्यापारियों को प्रेरित करने व दुधारू पशुओं की आवक बढ़ाने की कोशिशें जारी हैं।
विज्ञापन