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दिगंबर बाबा के मेले मे उमड़े भक्त
Updated Thu, 27 Jul 2017 11:46 PM IST
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बेल्थरारोड। गोवंश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले दिगंबर बाबा की स्मृति में लगने वाला वार्षिक मेला परंपरागत हर्षोल्लास के साथ गुरुवार को संपन्न हुआ। मेले में पूजन- अर्चन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी।
बताते हैं कि कई सौ वर्ष पूर्व मुगल काल के दौरान बाबा मऊ जिले के एक मुस्लिम जमींदार के यहां नौकरी करते थे। जमींदार के यहां शादी का कार्यक्रम था। बारातियों को गोमांस परोसने के लिए एक दर्जन से अधिक बछड़े लाए गए थे । इसकी भनक लगते ही दिगंबर बाबा भड़क गए और तलवार उठाकर खूंटे से बंधे बछड़ों की गर्दन में लगे रस्सी को काट कर बंधन मुक्त कर दिया । खूंटे से मुक्त होने के बाद बछड़े इधर- उधर भागने लगे। यह देख जमीदार बौखला गया तथा अपने नौकरों से दिगंबर बाबा को जान से मारने का हुक्म दे दिया। नौकरों ने बाबा को घेर लिया। घोड़े पर सवार बाबा ने हाथ में तलवार लेकर मोर्चा संभाल नौकरों को मारते- काटते बाबा लहूलुहान हो गए। घायलावस्था में बेल्थरारोड के निकट मिश्रौली ग्राम की परती पर पहुंचते ही दम तोड़ दिया। बाबा की स्मृति में वहां 52 बीघा भूमि परती के रूप में स्थित है, जो गोवंश के चारागाह के रुप में स्थापित है।
मान्यता है कि मेले के दिन बारिश जरुर होगी। कोई जूता- चप्पल पहनकर परती पर नहीं जाता है। मेले में तरह-तरह की दुकानें सजाई गई। सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए गए। देर शाम तक मेले में चहल -पहल बनी रही।
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बताते हैं कि कई सौ वर्ष पूर्व मुगल काल के दौरान बाबा मऊ जिले के एक मुस्लिम जमींदार के यहां नौकरी करते थे। जमींदार के यहां शादी का कार्यक्रम था। बारातियों को गोमांस परोसने के लिए एक दर्जन से अधिक बछड़े लाए गए थे । इसकी भनक लगते ही दिगंबर बाबा भड़क गए और तलवार उठाकर खूंटे से बंधे बछड़ों की गर्दन में लगे रस्सी को काट कर बंधन मुक्त कर दिया । खूंटे से मुक्त होने के बाद बछड़े इधर- उधर भागने लगे। यह देख जमीदार बौखला गया तथा अपने नौकरों से दिगंबर बाबा को जान से मारने का हुक्म दे दिया। नौकरों ने बाबा को घेर लिया। घोड़े पर सवार बाबा ने हाथ में तलवार लेकर मोर्चा संभाल नौकरों को मारते- काटते बाबा लहूलुहान हो गए। घायलावस्था में बेल्थरारोड के निकट मिश्रौली ग्राम की परती पर पहुंचते ही दम तोड़ दिया। बाबा की स्मृति में वहां 52 बीघा भूमि परती के रूप में स्थित है, जो गोवंश के चारागाह के रुप में स्थापित है।
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मान्यता है कि मेले के दिन बारिश जरुर होगी। कोई जूता- चप्पल पहनकर परती पर नहीं जाता है। मेले में तरह-तरह की दुकानें सजाई गई। सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए गए। देर शाम तक मेले में चहल -पहल बनी रही।
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