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अनारी ने दिए भोजपुरी भाषा को नए आयाम
Updated Mon, 04 Sep 2017 11:23 PM IST
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सुखपुरा। जहां आज लोग अंग्रेजी और हिन्दी को खासी तरजीह दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर एक ऐसे शख्स हैं, जिन्होंने अपनी मातृ भाषा भोजपुरी को न सिर्फ देश-विदेश तक पहुंचाया, बल्कि उसे अपने जीवन में भी उतारा। शिक्षा के क्षेत्र में भोजपुरी में सात पुस्तकें लिखकर नया आयाम स्थापित करने वाले सुखपुरा थाना क्षेत्र के कुम्हियां गांव निवासी बृजमोहन प्रसाद अनारी ने संघर्ष कर समाज में अपनी अलग पहचान बनाई है। मेहनत और उपलिब्धयों की वजह से उन्हें राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
वर्तमान में जूनियर हाईस्कूल सुखपुरा में शिक्षक हैं। अपनी प्रारंभिक शिक्षा धूल भरे विद्यालय में शुरू की। स्कूल से आने के बाद बकरी चराना व छुट्टी के दिन मजदूरी पर निराई गुणाई करना दिनचर्या रही। जबकि दूसरों की छोड़ी गई पुस्तकों से पढ़ाई की। कई बार इंजीनियरिंग में चयन हुआ। लेकिन आर्थिक तंगी के चलते प्रवेश नहीं ले सके। जब बीटीसी कर रहे थे तो साईकिल से पकवाइनार प्रशिक्षण प्राप्त करने जाते थे। वहां भी दूसरों की पोशाक व पुस्तकों से अध्ययन करते थे। वहां मेस में भोजन इनको मुफ्त में मिलता था। विद्यालय के अध्यापक इनकी मेहनत व गरीबी को देख शुल्क माफ कर देते थे। अनारी भोजपुरी के प्रकांड विद्वान में से एक है। इनसे भोजपुरी सीखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।
भोजपुरी के क्षेत्र में इन्हें कई पुरस्कार मिल चुके हैं। इन्होंने सात पुस्तके भी लिखी हैं। इनका भोजपुरी गीत संग्रह जिनगी के थाती, आसरा के दियना, सितुही में मोती, गुलरी के फूल है। गजल संग्रह में अंखीयन के लोर है। धरम के धजा महाकाव्य, राजा यह सत्य प्रेमी हरीश्चन्द्र की कथा है , जिसे उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान ने प्रकाशित कराया है। इनकी इन कृतियों पर प्रदेश सरकार ने भिखारी ठाकुर सर्जना एवं राहुल सांकृत्यायन सम्मान दिया है। विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ भागलपुर बिहार से विद्या वाचस्पति मानद उपाधि मिल चुकी है। यही नहीं वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय आरा से बृजमोहन प्रसाद अनारी व्यक्तित्व व कृतित्व विषयक दो शोध भी हो चुके हैं।
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वर्तमान में जूनियर हाईस्कूल सुखपुरा में शिक्षक हैं। अपनी प्रारंभिक शिक्षा धूल भरे विद्यालय में शुरू की। स्कूल से आने के बाद बकरी चराना व छुट्टी के दिन मजदूरी पर निराई गुणाई करना दिनचर्या रही। जबकि दूसरों की छोड़ी गई पुस्तकों से पढ़ाई की। कई बार इंजीनियरिंग में चयन हुआ। लेकिन आर्थिक तंगी के चलते प्रवेश नहीं ले सके। जब बीटीसी कर रहे थे तो साईकिल से पकवाइनार प्रशिक्षण प्राप्त करने जाते थे। वहां भी दूसरों की पोशाक व पुस्तकों से अध्ययन करते थे। वहां मेस में भोजन इनको मुफ्त में मिलता था। विद्यालय के अध्यापक इनकी मेहनत व गरीबी को देख शुल्क माफ कर देते थे। अनारी भोजपुरी के प्रकांड विद्वान में से एक है। इनसे भोजपुरी सीखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।
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भोजपुरी के क्षेत्र में इन्हें कई पुरस्कार मिल चुके हैं। इन्होंने सात पुस्तके भी लिखी हैं। इनका भोजपुरी गीत संग्रह जिनगी के थाती, आसरा के दियना, सितुही में मोती, गुलरी के फूल है। गजल संग्रह में अंखीयन के लोर है। धरम के धजा महाकाव्य, राजा यह सत्य प्रेमी हरीश्चन्द्र की कथा है , जिसे उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान ने प्रकाशित कराया है। इनकी इन कृतियों पर प्रदेश सरकार ने भिखारी ठाकुर सर्जना एवं राहुल सांकृत्यायन सम्मान दिया है। विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ भागलपुर बिहार से विद्या वाचस्पति मानद उपाधि मिल चुकी है। यही नहीं वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय आरा से बृजमोहन प्रसाद अनारी व्यक्तित्व व कृतित्व विषयक दो शोध भी हो चुके हैं।
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