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कतर्निया में पर्यटक ला रहे जैविक कचरा
अमर उजाला ब्यूरो/बहराइच
Updated Mon, 11 Jan 2016 09:43 PM IST
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बहराइच। कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र को इको टूरिज्म के तहत विकसित किया गया है। जंगल में जैविक कचरा ले जाना और फैलाना प्रतिबंधित है। इसके बावजूद इस पर अंकुश नहीं लग रहा है।
प्रतिदिन लगभग 35 से 50 किलो कचरा जंगल में पहुंच रहा है। इधर-उधर चिप्स के पैकेट और कोल्डड्रिंक्स की बोतलें और कैन पड़े हैं। इससे जंगल के साथ वन्यजीवों को भी खतरा है।
कचरे के रिसाइक्लिंग की भी कोई व्यवस्था नहीं है। अधिकारियों द्वारा कचरे को जंगल के बाहर जलाने का दावा किया जा रहा है लेकिन कचरा जलाने से हुए धुएं भी पेड़-पौधों और वन्यजीवों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकते हैं।
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551 वर्ग किलोमीटर में फैला कतर्नियाघाट सेंक्चुरी सात रेंजों में विभक्त है। कतर्नियाघाट और ककरहा क्षेत्र को कोर जोन और बफर जोन में बांटकर जंगल की सुरक्षा की व्यवस्था वन विभाग ने बनाई है।
इको टूरिज्म के तहत जंगल विकसित हुआ है लेकिन इको फ्रेंडली दिखता नहीं क्योंकि पर्यटकों के बहाने जंगल में प्रतिदिन कचरा पहुंच रहा है।
ककरहा, मोतीपुर, निशानगाड़ा और कतर्नियाघाट रेंज में जगह-जगह पॉलीथिन, चिप्स के पैकेट और पेय पदार्थों के कैन बिखरे हुए मिलेंगे। इससे वन संपदा को तो खतरा है ही, दुर्लभ वन्यजीवों की जिंदगी भी खतरे में पड़ सकती है।
नाम न छापने की शर्त पर कतर्नियाघाट में कचरा इकट्ठा करने वाले कुछ लोगों ने बताया कि लगभग 50 किलो कचरा प्रतिदिन निकल रहा है।
शाकाहारी वन्यजीव हिरन, हाथी आदि घास व अन्य वनस्पतियों के साथ ही फैले जैविक कचरे को भी निवाला बना सकते हैं। इससे वह असमय मौत के शिकार बन सकते हैं।
वन विभाग जैविक कब्जे को लेकर संजीदा होने की बात कह रहा है लेकिन कचरे को ठिकाने लगाने की कोई व्यवस्था नहीं है।
जंगल से बाहर पहुंचाते हैं कचरा
कतर्नियाघाट आने वाले पर्यटकों को जैविक कचरा न फैलाने की हिदायत दी जाती है। वन संपदा और वन्यजीवों के सुरक्षा की बात कहकर उन्हें जागरूक भी किया जाता है। इसके बावजूद जैविक कचरे को इकट्ठा करने के लिए प्रतिदिन वनकर्मियों को जंगल के सभी रास्तों पर गश्त के निर्देश दिए जाते हैं।
रिसाइक्लिंग की व्यवस्था नहीं है। कचरे को इकट्ठा कर उसे जंगल से बाहर ले जाकर जलवा दिया जाता है। संरक्षित वन क्षेत्र में प्लास्टिक के पॉलीथिन और केन का प्रयोग भी प्रतिबंधित है। इसके लिए विभिन्न मार्गों पर जागरूकता बोर्ड भी लगाए गए हैं।
- आशीष तिवारी, डीएफओ कतर्नियाघाट सेंक्चुरी
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ रखवाएगा डस्टबिन
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के परियोजनाधिकारी दबीर हसन ने कहा कि प्रतिबंध के बावजूद पर्यटक लापरवाही में चिप्स व अन्य खाद्य पदार्थों के पैकेट लेकर जंगल पहुंच जाते हैं। उन्हें जागरूक करने के लिए जगह-जगह बोर्ड जरूर लगे हैं लेकिन घड़ियाल सेंटर, नावघाट व जंगल के अन्य प्रमुख मार्गों पर डस्टबिन रखवाने की भी तैयारी है ताकि पर्यटक जैविक कचरे को उसी में रखें और कचरा बाहर फेंकवाया जा सके।
बैग की भी होगी व्यवस्था
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ पर्यटकों को जागरूक करने के लिए पर्यटग बैग की सुविधा उपलब्ध कराएगा। यह बैग जूट से बने होंगे। रेंज कार्यालयों में जहां पर्यटक भ्रमण शुल्क अदा करेंगे, वहीं पर उन्हें बैग मुहैया कराया जाएगा।
घातक होती है पॉलीथीन
सामान्य जीवन में पॉलीथीन का उपयोग भले ही सरल लगे, लेकिन यह काफी घातक है। पॉलीथीन जलाने से कार्बन मोनो ऑक्साइड, कार्बन डाई ऑक्साइट व डाई ऑक्सीन्स जहरीली गैस निकलती है। जिससे श्वांस, दमा व अन्य कई घातक बीमारियां होती हैं।
यह गैस वन्यजीवों की जिंदगी के लिए खतरनाक होती हैं। इसके अलावा घास या अन्य स्थानों पर चारे की तलाश में अगर वन्यजीव या कोई मवेशी पॉलीथिन को निगल जाता है तो यह पॉलीथिन श्वांस नली में फंसकर जिंदगी के लिए खतरा बनती है।
- डॉ. विवेक दीक्षित रसायनविद, किसान पीजी कॉलेज
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प्रतिदिन लगभग 35 से 50 किलो कचरा जंगल में पहुंच रहा है। इधर-उधर चिप्स के पैकेट और कोल्डड्रिंक्स की बोतलें और कैन पड़े हैं। इससे जंगल के साथ वन्यजीवों को भी खतरा है।
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कचरे के रिसाइक्लिंग की भी कोई व्यवस्था नहीं है। अधिकारियों द्वारा कचरे को जंगल के बाहर जलाने का दावा किया जा रहा है लेकिन कचरा जलाने से हुए धुएं भी पेड़-पौधों और वन्यजीवों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकते हैं।
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551 वर्ग किलोमीटर में फैला कतर्नियाघाट सेंक्चुरी सात रेंजों में विभक्त है। कतर्नियाघाट और ककरहा क्षेत्र को कोर जोन और बफर जोन में बांटकर जंगल की सुरक्षा की व्यवस्था वन विभाग ने बनाई है।
इको टूरिज्म के तहत जंगल विकसित हुआ है लेकिन इको फ्रेंडली दिखता नहीं क्योंकि पर्यटकों के बहाने जंगल में प्रतिदिन कचरा पहुंच रहा है।
ककरहा, मोतीपुर, निशानगाड़ा और कतर्नियाघाट रेंज में जगह-जगह पॉलीथिन, चिप्स के पैकेट और पेय पदार्थों के कैन बिखरे हुए मिलेंगे। इससे वन संपदा को तो खतरा है ही, दुर्लभ वन्यजीवों की जिंदगी भी खतरे में पड़ सकती है।
नाम न छापने की शर्त पर कतर्नियाघाट में कचरा इकट्ठा करने वाले कुछ लोगों ने बताया कि लगभग 50 किलो कचरा प्रतिदिन निकल रहा है।
शाकाहारी वन्यजीव हिरन, हाथी आदि घास व अन्य वनस्पतियों के साथ ही फैले जैविक कचरे को भी निवाला बना सकते हैं। इससे वह असमय मौत के शिकार बन सकते हैं।
वन विभाग जैविक कब्जे को लेकर संजीदा होने की बात कह रहा है लेकिन कचरे को ठिकाने लगाने की कोई व्यवस्था नहीं है।
जंगल से बाहर पहुंचाते हैं कचरा
कतर्नियाघाट आने वाले पर्यटकों को जैविक कचरा न फैलाने की हिदायत दी जाती है। वन संपदा और वन्यजीवों के सुरक्षा की बात कहकर उन्हें जागरूक भी किया जाता है। इसके बावजूद जैविक कचरे को इकट्ठा करने के लिए प्रतिदिन वनकर्मियों को जंगल के सभी रास्तों पर गश्त के निर्देश दिए जाते हैं।
रिसाइक्लिंग की व्यवस्था नहीं है। कचरे को इकट्ठा कर उसे जंगल से बाहर ले जाकर जलवा दिया जाता है। संरक्षित वन क्षेत्र में प्लास्टिक के पॉलीथिन और केन का प्रयोग भी प्रतिबंधित है। इसके लिए विभिन्न मार्गों पर जागरूकता बोर्ड भी लगाए गए हैं।
- आशीष तिवारी, डीएफओ कतर्नियाघाट सेंक्चुरी
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ रखवाएगा डस्टबिन
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के परियोजनाधिकारी दबीर हसन ने कहा कि प्रतिबंध के बावजूद पर्यटक लापरवाही में चिप्स व अन्य खाद्य पदार्थों के पैकेट लेकर जंगल पहुंच जाते हैं। उन्हें जागरूक करने के लिए जगह-जगह बोर्ड जरूर लगे हैं लेकिन घड़ियाल सेंटर, नावघाट व जंगल के अन्य प्रमुख मार्गों पर डस्टबिन रखवाने की भी तैयारी है ताकि पर्यटक जैविक कचरे को उसी में रखें और कचरा बाहर फेंकवाया जा सके।
बैग की भी होगी व्यवस्था
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ पर्यटकों को जागरूक करने के लिए पर्यटग बैग की सुविधा उपलब्ध कराएगा। यह बैग जूट से बने होंगे। रेंज कार्यालयों में जहां पर्यटक भ्रमण शुल्क अदा करेंगे, वहीं पर उन्हें बैग मुहैया कराया जाएगा।
घातक होती है पॉलीथीन
सामान्य जीवन में पॉलीथीन का उपयोग भले ही सरल लगे, लेकिन यह काफी घातक है। पॉलीथीन जलाने से कार्बन मोनो ऑक्साइड, कार्बन डाई ऑक्साइट व डाई ऑक्सीन्स जहरीली गैस निकलती है। जिससे श्वांस, दमा व अन्य कई घातक बीमारियां होती हैं।
यह गैस वन्यजीवों की जिंदगी के लिए खतरनाक होती हैं। इसके अलावा घास या अन्य स्थानों पर चारे की तलाश में अगर वन्यजीव या कोई मवेशी पॉलीथिन को निगल जाता है तो यह पॉलीथिन श्वांस नली में फंसकर जिंदगी के लिए खतरा बनती है।
- डॉ. विवेक दीक्षित रसायनविद, किसान पीजी कॉलेज