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छह बच्चों की यशोदा मां हैं डॉ. बलमीत कौर
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 07 May 2016 09:36 PM IST
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बहराइच। मां यशोदा व कृष्ण के रिश्तों की दुहाई कलियुग में आज भी दी जाती है। कारण तमाम ऐसी यशोदा मां हैं, जोे दूसरे के नौनिहालों को ममता का छांव दे रही हैं। शहर निवासी डॉ बलमीत कौर भी एक हैं, जिनके आंगन में छह मूक बधिर व मानसिक रूप से निशक्त बच्चे अपना भविष्य संवार रहे हैं।
एक आठ वर्षीय बालिका अंशिका को डॉ. बलमीत कौर ने गोद भी लिया है। ये बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ जीवन जीने की कला सीख रहे हैं।
शहर के कानूनगोपुरा मोहल्ला निवासी डॉ. बलमीत कौर के घर के आसपास कई मानसिक रूप से मंद व शारीरिक रूप से दिव्यांग बच्चे रहते थे। इन बच्चों की दिव्यांगता डॉ. बलमीत को बचपन से ही सोते-जागते कचोटती थी।
आखिरकार वर्ष 1992 में परास्नातक, इसके बाद पीएचडी और लखनऊ के एनसी चतुर्वेदी ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट से मूक बधिर बच्चों को शिक्षित करने का प्रशिक्षण लिया। इसके बाद अपने घर में मूक बधिर विद्यालय का संचालन करने लगीं।
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शुरुआत में कौर ने महज पांच बच्चों से अपने लक्ष्य का कारवां शुरू किया और आज यहां 85 मूक बधिर व मानसिक निशक्त 35 बच्चेे अपना जीवन संवार रहे हैं। इन्हीं बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ही डॉ. बलमीत कौर ने अविवाहित रहने का भी फैसला लिया।
इसके अलावा छह बच्चे डॉ. कौर के साथ उनके घर में रहकर जीने की कला सीख रहे हैं।
कैसरगंज की अंशिका को लिया गोद
कैसरगंज थाना अंतर्गत खजुहा पट्टी गांव निवासी अनिल सिंह मजदूरी कर करते हैं। आठ वर्ष पूर्व अनिल सिंह के घर एक बेटी अंशिका ने जन्म लिया लेकिन वह दिव्यांग थी। आखिरकार अंशिका जब छह साल की हुई तो उसकी मां पुष्पा व पिता अनिल को उसके भविष्य को लेकर चिंता सताने लगी। दो साल पहले दंपती ने डॉ. कौर को लिखित रूप से बेटी अंशिका सौंप दिया है। अब अंशिका के लिए डॉ. कौर ही उसकी मां हैं। डॉ. कौर ने अंशिका को पढ़ाकर आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प लिया है।
इन बच्चों के लिए डॉ. कौर बनीं यशोदा मइया
डॉ कौर के साथ लखीमपुर जिले की रहने वाली सगी बहनें शालू (6) व गरिमा (8), कैसरगंज निवासी प्रांशू (12), विकास (2), आशुतोष (14), अंशिका (8) उनके घर में रहती हैं। इनके खान-पान रहन-सहन व अन्य जरूरी चीजों का इंतजाम डॉ कौर स्वयं करती हैं। डॉ. कौर शादी समारोह या अन्य किसी जगहों पर जाती हैं तो बच्चों को जरूर ले जाती हैं।
24 सालों में 20 बच्चों को बनाया आत्मनिर्भर
वर्ष 1992 में बाराबंकी जनपद निवासी टैली जायसवाल को डॉ. बलमीत कौर ने अपने सुपुर्द लिया था। वह मूक बधिर व मानसिक रूप से नि:शक्त थी। आज टैली खुद एक मां है और अपने वैवाहिक जीवन को बखूबी चला रही है। इन 24 सालों में 20 बच्चों को डॉ. कौर ने एक मां के रूप में प्यार-दुलार दिया और उन्हें मोमबत्ती बनाने का प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाया है।
एक आठ वर्षीय बालिका अंशिका को डॉ. बलमीत कौर ने गोद भी लिया है। ये बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ जीवन जीने की कला सीख रहे हैं।
शहर के कानूनगोपुरा मोहल्ला निवासी डॉ. बलमीत कौर के घर के आसपास कई मानसिक रूप से मंद व शारीरिक रूप से दिव्यांग बच्चे रहते थे। इन बच्चों की दिव्यांगता डॉ. बलमीत को बचपन से ही सोते-जागते कचोटती थी।
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आखिरकार वर्ष 1992 में परास्नातक, इसके बाद पीएचडी और लखनऊ के एनसी चतुर्वेदी ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट से मूक बधिर बच्चों को शिक्षित करने का प्रशिक्षण लिया। इसके बाद अपने घर में मूक बधिर विद्यालय का संचालन करने लगीं।
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शुरुआत में कौर ने महज पांच बच्चों से अपने लक्ष्य का कारवां शुरू किया और आज यहां 85 मूक बधिर व मानसिक निशक्त 35 बच्चेे अपना जीवन संवार रहे हैं। इन्हीं बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ही डॉ. बलमीत कौर ने अविवाहित रहने का भी फैसला लिया।
इसके अलावा छह बच्चे डॉ. कौर के साथ उनके घर में रहकर जीने की कला सीख रहे हैं।
कैसरगंज की अंशिका को लिया गोद
कैसरगंज थाना अंतर्गत खजुहा पट्टी गांव निवासी अनिल सिंह मजदूरी कर करते हैं। आठ वर्ष पूर्व अनिल सिंह के घर एक बेटी अंशिका ने जन्म लिया लेकिन वह दिव्यांग थी। आखिरकार अंशिका जब छह साल की हुई तो उसकी मां पुष्पा व पिता अनिल को उसके भविष्य को लेकर चिंता सताने लगी। दो साल पहले दंपती ने डॉ. कौर को लिखित रूप से बेटी अंशिका सौंप दिया है। अब अंशिका के लिए डॉ. कौर ही उसकी मां हैं। डॉ. कौर ने अंशिका को पढ़ाकर आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प लिया है।
इन बच्चों के लिए डॉ. कौर बनीं यशोदा मइया
डॉ कौर के साथ लखीमपुर जिले की रहने वाली सगी बहनें शालू (6) व गरिमा (8), कैसरगंज निवासी प्रांशू (12), विकास (2), आशुतोष (14), अंशिका (8) उनके घर में रहती हैं। इनके खान-पान रहन-सहन व अन्य जरूरी चीजों का इंतजाम डॉ कौर स्वयं करती हैं। डॉ. कौर शादी समारोह या अन्य किसी जगहों पर जाती हैं तो बच्चों को जरूर ले जाती हैं।
24 सालों में 20 बच्चों को बनाया आत्मनिर्भर
वर्ष 1992 में बाराबंकी जनपद निवासी टैली जायसवाल को डॉ. बलमीत कौर ने अपने सुपुर्द लिया था। वह मूक बधिर व मानसिक रूप से नि:शक्त थी। आज टैली खुद एक मां है और अपने वैवाहिक जीवन को बखूबी चला रही है। इन 24 सालों में 20 बच्चों को डॉ. कौर ने एक मां के रूप में प्यार-दुलार दिया और उन्हें मोमबत्ती बनाने का प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाया है।