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फर्जी जाति प्रमाण पत्र से बनी थी प्रधान, जांच में खुली पोल

Mon, 01 Aug 2022 11:22 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Mon, 01 Aug 2022 11:22 PM IST
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बहराइच। मोतीपुर तहसील क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित प्रधान की सीट पर चुनाव लड़ने के लिए एक प्रत्याशी ने कूटरचित जाति प्रमाण पत्र बनवा लिया। चुनाव लड़कर जीत भी हासिल कर ली। इसके बाद गांव निवासी एक व्यक्ति ने आवाज उठाई और तहसील स्तरीय अधिकारियों से मामले की जांच व कार्रवाई की मांग की। सुनवाई न होने पर हाईकोर्ट में बीते साल दो सितंबर को एक जनहित याचिका दाखिल की गई। हाईकोर्ट ने जिलाधिकारी को मामले की जांच कर निस्तारण करने का आदेश दिया। जिलाधिकारी की जांच में शिकायत सही पाई गई है। जाति प्रमाणपत्र कूटरचित मिलने पर निरस्त कर दिया गया है। प्रमाणपत्र पर रिपोर्ट लगाने वाले लेखपाल को प्रतिकूल प्रविष्टि दी गई है।
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त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव-2021 में मोतीपुर तहसील की ग्राम पंचायत रमपुरवा अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित थी। चुनाव में आरती पत्नी लालजी ने जीत दर्ज की थी और रमपुरवा गांव की प्रधान चुनी गईं थीं। उनकी जीत के बाद से उनके अनुसूचित जनजाति का होने पर सवाल उठने लगे थे। चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे परदेशी ने तहसील प्रशासन को शिकायती पत्र देकर मामले की जांच की मांग की थी। यही नहीं मूल आदिवासी जनजाति कल्याण समिति संपूूर्ण भारत ने भी मामले का संज्ञान लिया था और इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष विजय बहादुर ने भी जांच की मांग की थी।
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हालांकि, तहसील प्रशासन मामले में ढुलमुल रवैया अपनाए रहा जिसके बाद उपविजेता परदेसी ने हाईकोर्ट में दो सितंबर को एक जनहित याचिका दाखिल की और न्याय की मांग की। हाईकोर्ट की ओर से जिलाधिकारी को मामले की निष्पक्ष जांच का आदेश दिया गया। डीएम की ओर से कराई गई जांच में शिकायत सही पाई गई और वर्तमान ग्राम प्रधान की ओर से लगाया गया अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र कूटरचित मिला। इसके बाद जाति प्रमाण पत्र निरस्त करते हुए इसे जारी करने वाले लेखपाल बंशराज को प्रतिकूल प्रविष्टि दी गई है।
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मूल आदिवासी जनजाति कल्याण समिति संपूर्ण भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष विजय बहादुर ने बताया कि मामले में कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की गई है। उन्होंने बताया कि जाति प्रमाण पत्र में लेखपाल की रिपोर्ट के बाद तहसीलदार भी जांच करते हैं। वहीं, चुनाव का मामला होने पर इसे और गंभीरता से जांचना चाहिए था। ऐसा लगता है कि तहसील प्रशासन किसी जल्दी में था। तहसील प्रशासन की इस गलती से आदिवासी समाज का एक व्यक्ति चुनाव लड़ने के बाद भी हार गया और कूटरचित दस्तावेज के सहारे चुनाव जीत लिया गया। उन्होंने कहा कि मामले में पूरी निष्पक्षता के साथ जांच होनी चाहिए और सभी दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही गांव में कराए गए कार्यों की जांच करवाते हुए रिकवरी भी करनी चाहिए।
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