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बटन दबाते ही जंगल में चला जाएगा बाघ और तेंदुआ, आ गए हाईटेक पिंजड़े
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बहराइच। मानव वन्यजीव संघर्ष रोकने और जंगली जीवों को रेस्क्यू करने की सुरक्षा और हाईटेक होगी। देहरादून से बहराइच वन प्रभाग को आटोमैटिक पिंजड़ा भेज दिया गया है। जिस पर सवा तीन लाख रुपये लागत लगी है। प्रभावित क्षेत्र में यह पिंजड़ा लगाया जाएगा। तेंदुए के पिंजड़े में पहुंचते ही अपने आप पिंजड़ा बंद हो जाएगा। साथ ही जंगल में वन्यजीवों को छोड़ते समय भी वनकर्मियों की जरूरत नहीं होगी। बटन दबाते ही बाघ या तेंदुआ जंगल की ओर चला जाएगा। मालूम हो कि अभी तक लोहे के पिंजड़े से ही तेंदुए और बाघ का रेस्क्यू किया जाता है।
बहराइच वन प्रभाग छह रेंज में विभक्त है। इनमें बहराइच रेंज के साथ कैसरगंज, नानपारा, अब्दुल्लागंज, चकिया और रुपईडीहा रेंज शामिल हैं। कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग से सटा होने के कारण बाघ और तेंदुए बहराइच वन प्रभाग में आ जाते हैं। जंगल से सटे गांवों में हमला कर देते हैं। जिससे मानव वन्यजीव संघर्ष उत्पन्न होती है। बहराइच वन प्रभाग के डीएफओ मनीष कुमार सिंह ने बताया कि जंगल से सटे गांव या खेत में तेंदुए के छिपे होने पर उसे लोहे के पिंजड़े में कैद किया जाता था। लेकिन पिंजड़ा दो से तीन क्विंटल वजन का होता है। जिसको एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में काफी परेशानी होती है।
डीएफओ ने बताया कि वन प्रभाग में तेंदुए के रेस्क्यू के लिए आठ पिंजड़ा उनके पास मौजूद है। लेकिन काफी वजन होने से परेशानी होती थी। इसको देखते हुए उच्चाधिकारियों को पत्र लिखा था। डीएफओ ने बताया कि वन्यजीव संस्थान देहरादून से आटोमैटिक पिंजड़ा भेज दिया गया है। जरूरत पड़ने पर सभी पांच रेंज में पिंजड़ा भेजकर जंगली जीव का रेस्क्यू किया जाएगा। डीएफओ ने बताया कि इससे वनकर्मियों की सुरक्षा के साथ वन्यजीवों की भी सुरक्षा होगी। क्योंकि पिंजड़े से तेंदुए को जंगल में छोड़ने के लिए मुख्य द्वार खोलना पड़ता है। ऐसे में कभी तेंदुआ या बाघ बीछे मुड़ा तो वनकर्मियों पर भी हमला कर सकता है।
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प्रभागीय वनाधिकारी ने बताया कि आटोमैटिक पिंजड़ा पूरी तरह से प्लास्टिक का है। इसका वजन भी कम है। जिस स्थान पर आटोमैटिक पिंजड़ा लगाया जाएगा। तेंदुए के अंदर जाते ही पिंजड़ा स्वयं बंद हो जाएगा। डीएफओ ने बताया कि जिस स्थान पर तेंदुए को जंगल में छोड़ा जाएगा। वहां पिंजड़ा स्थापित करने के बाद बटन दबाते ही तेंदुआ जंगल में चला जाएगा।
बहराइच वन प्रभाग के नानपारा रेंज, रुपईडीहा, और चकिया रेंज में तेंदुआ पाए जाते हैं। यह तेंदुए शिकार की तलाश में गांव में पहुंच जाते हैं। दो माह पूर्व तेंदुए ने नानपारा क्षेत्र के गांवों में उत्पात मचाया था। लोहे के पिंजड़े में रेस्क्यू हुआ था। पिंजड़े में उछलकूद के दौरान तेंदुआ चोटहिल हो जाता है। लेकिन अब आटोमैटिक पिंजड़ा में तेंदुए प्लास्टिक से चोट नहीं लगेगी। सुरक्षित रेस्क्यू हो जाएगा।
मनीष सिंह, डीएफओ, बहराइच वन प्रभाग
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बहराइच वन प्रभाग छह रेंज में विभक्त है। इनमें बहराइच रेंज के साथ कैसरगंज, नानपारा, अब्दुल्लागंज, चकिया और रुपईडीहा रेंज शामिल हैं। कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग से सटा होने के कारण बाघ और तेंदुए बहराइच वन प्रभाग में आ जाते हैं। जंगल से सटे गांवों में हमला कर देते हैं। जिससे मानव वन्यजीव संघर्ष उत्पन्न होती है। बहराइच वन प्रभाग के डीएफओ मनीष कुमार सिंह ने बताया कि जंगल से सटे गांव या खेत में तेंदुए के छिपे होने पर उसे लोहे के पिंजड़े में कैद किया जाता था। लेकिन पिंजड़ा दो से तीन क्विंटल वजन का होता है। जिसको एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में काफी परेशानी होती है।
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डीएफओ ने बताया कि वन प्रभाग में तेंदुए के रेस्क्यू के लिए आठ पिंजड़ा उनके पास मौजूद है। लेकिन काफी वजन होने से परेशानी होती थी। इसको देखते हुए उच्चाधिकारियों को पत्र लिखा था। डीएफओ ने बताया कि वन्यजीव संस्थान देहरादून से आटोमैटिक पिंजड़ा भेज दिया गया है। जरूरत पड़ने पर सभी पांच रेंज में पिंजड़ा भेजकर जंगली जीव का रेस्क्यू किया जाएगा। डीएफओ ने बताया कि इससे वनकर्मियों की सुरक्षा के साथ वन्यजीवों की भी सुरक्षा होगी। क्योंकि पिंजड़े से तेंदुए को जंगल में छोड़ने के लिए मुख्य द्वार खोलना पड़ता है। ऐसे में कभी तेंदुआ या बाघ बीछे मुड़ा तो वनकर्मियों पर भी हमला कर सकता है।
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प्रभागीय वनाधिकारी ने बताया कि आटोमैटिक पिंजड़ा पूरी तरह से प्लास्टिक का है। इसका वजन भी कम है। जिस स्थान पर आटोमैटिक पिंजड़ा लगाया जाएगा। तेंदुए के अंदर जाते ही पिंजड़ा स्वयं बंद हो जाएगा। डीएफओ ने बताया कि जिस स्थान पर तेंदुए को जंगल में छोड़ा जाएगा। वहां पिंजड़ा स्थापित करने के बाद बटन दबाते ही तेंदुआ जंगल में चला जाएगा।
बहराइच वन प्रभाग के नानपारा रेंज, रुपईडीहा, और चकिया रेंज में तेंदुआ पाए जाते हैं। यह तेंदुए शिकार की तलाश में गांव में पहुंच जाते हैं। दो माह पूर्व तेंदुए ने नानपारा क्षेत्र के गांवों में उत्पात मचाया था। लोहे के पिंजड़े में रेस्क्यू हुआ था। पिंजड़े में उछलकूद के दौरान तेंदुआ चोटहिल हो जाता है। लेकिन अब आटोमैटिक पिंजड़ा में तेंदुए प्लास्टिक से चोट नहीं लगेगी। सुरक्षित रेस्क्यू हो जाएगा।
मनीष सिंह, डीएफओ, बहराइच वन प्रभाग