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कर्म से आप भी बन सकते हैं नर से नारायण: गुप्ति सागर महाराज
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कर्म से आप भी बन सकते हैं नर से नारायण: गुप्ति सागर महाराज
बड़ौत (बागपत)। नवनिर्मित 1008 मुनि सुव्रतनाथ जिन मंदिर का मज्जिनेंद्र जिन बिम्ब पंचकल्याणक महामहोत्सव में उपाध्याय गुप्ति सागर महाराज ने कहा कि आपके अंदर भी वह शक्ति है कि आप भी नर से नारायण बन सकते हैं।
महाराज ने कहा कि नदी के किनारे एक चट्टान थी। धोबी उस पर बैठकर कपड़े धोया करते थे। सैलानी उस पर बैठते और लहरों के साथ अठखेलियां करते थे। जो भी वहां आता था, अपने हिसाब से उसका इस्तेमाल करता था। एक दिन किसी शिल्पी की नजर उस पत्थर पर पड़ी। शिल्पी ने उस पत्थर को अपनी वर्कशाप में लाया और उसे तराशना शुरू कर दिया। कुछ ही दिनों में उससे एक सुंदर प्रतिमा तैयार कर दी। कल तक साधारण पत्थर अब प्रतिमा का रूप धारण कर चुका था। पाषाण ने भगवान का रूप ले लिया था। इसी तरह पाषाण से भगवान की अभिव्यक्ति हमारी संस्कृति है। शक्ति के रूप में हर प्राणी के अंदर अनंत संभावनाएं हैं। जैसे हर पत्थर में प्रतिमा है, वैसे हर आत्मा में परमात्मा है। आत्मा ही परमात्मा है। तुम्हारे भीतर भी वह शक्ति है, जिसका तुम्हें पता नहीं। जब तक हमें शक्ति की जानकारी नहीं होगी, हम उसका लाभ नहीं ले सकेंगे। इसलिए मनुष्य को अपनी उस शक्ति की पहचान होनी चाहिए। उपाध्याय महाराज ने कहा कि स्वर्णपाषाण में जैसे सोना होता है वैसे ही दूध के भीतर घी और तिल के भीतर तेल होता है। इसी तरह देह के भीतर तुम्हारा परमात्मा है जो अनंत शक्तियों का भंडार है। इसलिए ऐसा कर्म करो कि तुम भी इंसान से भगवान बन जाओ। कार्यक्रम में पंकज अजय, सिद्धार्थ जैन, सुखमाल चंद जैन, अनिल कमल आनंद, धनेंद्र, अमित, पवन, वीरेंद्र, पिंटी, प्रवीण, गौरव, अजय, राजकुमार, सिद्धार्थ, संदीप, आदि शामिल रहे।
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बड़ौत (बागपत)। नवनिर्मित 1008 मुनि सुव्रतनाथ जिन मंदिर का मज्जिनेंद्र जिन बिम्ब पंचकल्याणक महामहोत्सव में उपाध्याय गुप्ति सागर महाराज ने कहा कि आपके अंदर भी वह शक्ति है कि आप भी नर से नारायण बन सकते हैं।
महाराज ने कहा कि नदी के किनारे एक चट्टान थी। धोबी उस पर बैठकर कपड़े धोया करते थे। सैलानी उस पर बैठते और लहरों के साथ अठखेलियां करते थे। जो भी वहां आता था, अपने हिसाब से उसका इस्तेमाल करता था। एक दिन किसी शिल्पी की नजर उस पत्थर पर पड़ी। शिल्पी ने उस पत्थर को अपनी वर्कशाप में लाया और उसे तराशना शुरू कर दिया। कुछ ही दिनों में उससे एक सुंदर प्रतिमा तैयार कर दी। कल तक साधारण पत्थर अब प्रतिमा का रूप धारण कर चुका था। पाषाण ने भगवान का रूप ले लिया था। इसी तरह पाषाण से भगवान की अभिव्यक्ति हमारी संस्कृति है। शक्ति के रूप में हर प्राणी के अंदर अनंत संभावनाएं हैं। जैसे हर पत्थर में प्रतिमा है, वैसे हर आत्मा में परमात्मा है। आत्मा ही परमात्मा है। तुम्हारे भीतर भी वह शक्ति है, जिसका तुम्हें पता नहीं। जब तक हमें शक्ति की जानकारी नहीं होगी, हम उसका लाभ नहीं ले सकेंगे। इसलिए मनुष्य को अपनी उस शक्ति की पहचान होनी चाहिए। उपाध्याय महाराज ने कहा कि स्वर्णपाषाण में जैसे सोना होता है वैसे ही दूध के भीतर घी और तिल के भीतर तेल होता है। इसी तरह देह के भीतर तुम्हारा परमात्मा है जो अनंत शक्तियों का भंडार है। इसलिए ऐसा कर्म करो कि तुम भी इंसान से भगवान बन जाओ। कार्यक्रम में पंकज अजय, सिद्धार्थ जैन, सुखमाल चंद जैन, अनिल कमल आनंद, धनेंद्र, अमित, पवन, वीरेंद्र, पिंटी, प्रवीण, गौरव, अजय, राजकुमार, सिद्धार्थ, संदीप, आदि शामिल रहे।
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