{"_id":"621530892e3ed2445c441db4","slug":"there-was-neither-pahalya-aali-air-nor-pahalya-aala-water-kahkra-news-mrt577963531","type":"story","status":"publish","title_hn":"ना पहल्या आली हवा रही, ना पहल्या आला पानी...","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
ना पहल्या आली हवा रही, ना पहल्या आला पानी...
विज्ञापन
होलिका दहन के लिए पाठशाला मार्ग पर डाली गई लकडिया
- फोटो : KAHKRA
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गांव की गलियों में महिलाएं खेलतीं थी फागण (फाल्गुन)
रातभर लोकगीतों से गूंजती थी गांव की गलियां
संवाद न्यूज एजेंसी
खेकड़ा। ना पहल्या आली हवा रही, ना पहल्या आला पानी, होगी खत्म कहानी रै, लोगों होगी खत्म कहानी...। इस हरियाणवी गीत की ये लाइनें यह बताने के लिए काफी हैं कि फाल्गुन माह को लेकर माहौल कितना बदल गया है। अब लोगों में उतना उत्साह नहीं रहा, जितना पहले हुआ करता था। लोकगीतों से गांव की गलियां रात भर गूंजती थी। महिलाएं लोकगीत गाकर कोल्डा जमाई, खो खो आदि खेल खेलतीं थी।
17 फरवरी से फाल्गुन माह शुरू हो गया। भारत की सांस्कृतिक विरासत में फागुन माह का विशेष महत्व है। पहले फागुन शुरू होते ही उत्सव हंसी ठिठौली का रंग चढ़ने लग जाता था। बुजुर्ग ब्रह्मपाल सिंह और तिलकराम वर्मा ने बताया कि हमारे समय में फागुन शुरू होते ही होली का रंग चढ़ना शुरू हो जाता था। घर का काम निपटाने के बाद महिलाएं रात को इकट्ठी होकर होली के गीत गाती थी। कुछ ही दूरी पर बैठकर हम उनके गीत सुनते थे। फागुन में देर रात तक बुजुर्गों की हुक्का चौपाल चलती थी। हंसी ठिठौली में मस्त माहौल बनता था। सभी लोग प्रेमभाव से आपस में मिलजुल कर रहते थे। फागुन के वो दिन याद करके बुजुर्ग अब से तुलना करते हुए कहते है कि अब वो बात नही रही।
एक माह पहले ही बजने लगता था होली का संगीत
गजेंद्र सिंह और गज सिंह धामा का कहना है कि उस समय टेलीविजन, मोबाइल नहीं होते थे। मगर, एक माह पहले से ही रात में होली संगीत बजने लगता था। बुजुर्ग और युवा एकत्र होकर ढोल और घरनावल की थाप का आनंद लेते थे। मगर, अब मोबाइल संस्कृति ने सब खत्म कर दिया है। ना फाल्गुन को वो क्रेज रहा और ना ही होली के वो दीवाने। घर में परिवार के सदस्य साथ बैठे तो जाते है, लेकिन सभी अपने-अपने मोबाइल में ही खोए रहते है।
विज्ञापन
होलिका के लिए लकड़ियां इकट्ठा करना शुरू
फोटो नंबर 17केएआर 3
खेकड़ा। 17 मार्च को होली पर्व मनाया जाएगा। श्रद्धालुओं ने अभी से होली की तैयारी शुरू कर दी है। होलिका के लिए बच्चे व युवा लकड़ियां इकट्ठा कर फखरपुर तिराहा स्थल पर रख रहे हैं। ईश्वर सिंह, धर्मबीर सिंह, रामकुमार आदि ने बताया कि बसंत पंचमी के दिन से ही होलिका दहन के लिए लकड़ियां, अनुपयोगी सामान इकट्ठा करना शुरू हो जाता है, जो कि महीने भर तक चलता है। होलिका की विधि विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद होलिका दहन किया जाता है।
विज्ञापन
रातभर लोकगीतों से गूंजती थी गांव की गलियां
संवाद न्यूज एजेंसी
खेकड़ा। ना पहल्या आली हवा रही, ना पहल्या आला पानी, होगी खत्म कहानी रै, लोगों होगी खत्म कहानी...। इस हरियाणवी गीत की ये लाइनें यह बताने के लिए काफी हैं कि फाल्गुन माह को लेकर माहौल कितना बदल गया है। अब लोगों में उतना उत्साह नहीं रहा, जितना पहले हुआ करता था। लोकगीतों से गांव की गलियां रात भर गूंजती थी। महिलाएं लोकगीत गाकर कोल्डा जमाई, खो खो आदि खेल खेलतीं थी।
17 फरवरी से फाल्गुन माह शुरू हो गया। भारत की सांस्कृतिक विरासत में फागुन माह का विशेष महत्व है। पहले फागुन शुरू होते ही उत्सव हंसी ठिठौली का रंग चढ़ने लग जाता था। बुजुर्ग ब्रह्मपाल सिंह और तिलकराम वर्मा ने बताया कि हमारे समय में फागुन शुरू होते ही होली का रंग चढ़ना शुरू हो जाता था। घर का काम निपटाने के बाद महिलाएं रात को इकट्ठी होकर होली के गीत गाती थी। कुछ ही दूरी पर बैठकर हम उनके गीत सुनते थे। फागुन में देर रात तक बुजुर्गों की हुक्का चौपाल चलती थी। हंसी ठिठौली में मस्त माहौल बनता था। सभी लोग प्रेमभाव से आपस में मिलजुल कर रहते थे। फागुन के वो दिन याद करके बुजुर्ग अब से तुलना करते हुए कहते है कि अब वो बात नही रही।
विज्ञापन
एक माह पहले ही बजने लगता था होली का संगीत
गजेंद्र सिंह और गज सिंह धामा का कहना है कि उस समय टेलीविजन, मोबाइल नहीं होते थे। मगर, एक माह पहले से ही रात में होली संगीत बजने लगता था। बुजुर्ग और युवा एकत्र होकर ढोल और घरनावल की थाप का आनंद लेते थे। मगर, अब मोबाइल संस्कृति ने सब खत्म कर दिया है। ना फाल्गुन को वो क्रेज रहा और ना ही होली के वो दीवाने। घर में परिवार के सदस्य साथ बैठे तो जाते है, लेकिन सभी अपने-अपने मोबाइल में ही खोए रहते है।
विज्ञापन
होलिका के लिए लकड़ियां इकट्ठा करना शुरू
फोटो नंबर 17केएआर 3
खेकड़ा। 17 मार्च को होली पर्व मनाया जाएगा। श्रद्धालुओं ने अभी से होली की तैयारी शुरू कर दी है। होलिका के लिए बच्चे व युवा लकड़ियां इकट्ठा कर फखरपुर तिराहा स्थल पर रख रहे हैं। ईश्वर सिंह, धर्मबीर सिंह, रामकुमार आदि ने बताया कि बसंत पंचमी के दिन से ही होलिका दहन के लिए लकड़ियां, अनुपयोगी सामान इकट्ठा करना शुरू हो जाता है, जो कि महीने भर तक चलता है। होलिका की विधि विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद होलिका दहन किया जाता है।