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चुनाव नजदीक आते ही तेज हुई वोटरों की घेराबंदी
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बड़ौत। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की घड़ी धीरे-धीरे नजदीक आ रही है। साथ ही चुनावी समर के योद्धा जीत सुनिश्चित करने के लिए मतदाताओं के यहां पर हाजिरी लगा रहे हैं। वे किसी भी तरह मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कवायद में जुटे हैं। गंवई सरकार में एक-एक वोट की कीमत है। इससे प्रत्याशी और मतदाता दोनों वाकिफ हैं। इसलिए प्रत्याशी पुराने संबंधों और रिश्तों का हवाला देने से नहीं चूक रहे हैं।
उम्मीदवारों ने वोटरों की घेराबंदी तेज कर दी है। वहीं, नाराज मतदाताओं के साथ पुराने संबंध तलाशे जा रहे हैं। इसके चलते रिश्ते और अपनेपन की दुहाई दी जा रही है। यदि कोई मतदाता नाराज है तो ऐसे लोगों के खानदान, रिश्तेदार, ससुराल, ननिहाल तक का पता लगाकर उन्हें किसी न किसी तरह मनाने की कोशिशें की जा रही हैं। जिन्हें प्रत्याशी कल तक पहचानते नहीं थे, आज उन्हीं से फूफा, मामा, जीजा, दामाद जैसे रिश्तेदारियां जोड़क़र वोट की जुगत भिड़ा रहे हैं। वहीं, मतदाता भी नेताजी के आचार-व्यवहार में बदलाव देख चुप्पी साधकर अपने दर पर आए हर किसी को आश्वासन दे रहे हैं।
गांव की पंचायत का मुखिया बनकर सरकारी योजनाओं के जरिए मलाई खाने को आतुर कई दावेदार जनता को जनार्दन बताकर उनके पैर तक पकड़ रहे हैं। ये वही चेहरे हैं जो कल तक आमजन के अभिवादन का जवाब देना मुनासिब नहीं समझते थे। आज समय मतदाता का है तो वह भी पिछले पांच सालों का हिसाब लेते हुए खरी-खरी सुनाने से पीछे नहीं हैं। वहीं, उम्मीदवार भी पुरानी बातें भूलने की गुहार लगा रहे हैं। पांच साल बाद अब मतदाता की बारी आई तो वे भी इसकी भरपाई करने से पीछे नहीं हैं।
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उम्मीदवारों ने वोटरों की घेराबंदी तेज कर दी है। वहीं, नाराज मतदाताओं के साथ पुराने संबंध तलाशे जा रहे हैं। इसके चलते रिश्ते और अपनेपन की दुहाई दी जा रही है। यदि कोई मतदाता नाराज है तो ऐसे लोगों के खानदान, रिश्तेदार, ससुराल, ननिहाल तक का पता लगाकर उन्हें किसी न किसी तरह मनाने की कोशिशें की जा रही हैं। जिन्हें प्रत्याशी कल तक पहचानते नहीं थे, आज उन्हीं से फूफा, मामा, जीजा, दामाद जैसे रिश्तेदारियां जोड़क़र वोट की जुगत भिड़ा रहे हैं। वहीं, मतदाता भी नेताजी के आचार-व्यवहार में बदलाव देख चुप्पी साधकर अपने दर पर आए हर किसी को आश्वासन दे रहे हैं।
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गांव की पंचायत का मुखिया बनकर सरकारी योजनाओं के जरिए मलाई खाने को आतुर कई दावेदार जनता को जनार्दन बताकर उनके पैर तक पकड़ रहे हैं। ये वही चेहरे हैं जो कल तक आमजन के अभिवादन का जवाब देना मुनासिब नहीं समझते थे। आज समय मतदाता का है तो वह भी पिछले पांच सालों का हिसाब लेते हुए खरी-खरी सुनाने से पीछे नहीं हैं। वहीं, उम्मीदवार भी पुरानी बातें भूलने की गुहार लगा रहे हैं। पांच साल बाद अब मतदाता की बारी आई तो वे भी इसकी भरपाई करने से पीछे नहीं हैं।
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