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जाटों में बिखराव और दलितों के बदले रुख ने खिलाया कमल

Fri, 11 Mar 2022 12:26 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Fri, 11 Mar 2022 12:26 AM IST
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Scattering among Jats and attitude towards Dalits fed lotus
बागपत। भाजपा आखिर जाटों में बिखराव करने के साथ ही दलितों को अपने साथ जोड़ने में कामयाब रही। यही कारण रहा कि बागपत व बड़ौत विधानसभा सीट पर दोबारा से कमल खिल गया। भाजपा ने विकास योजनाओं के साथ ही सुरक्षा के मुद्दे पर हर वर्ग को अपने साथ जोड़ा तो पिछड़ी जातियों के लिए राशन वितरण योजना ने असर दिखाया। छपरौली में जरूर भाजपा की उम्मीद के अनुसार बसपा व कांग्रेस वोट नहीं बटोर सके। यही वजह रही कि रालोद अपने किले को बचाने में कामयाब रहा।
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बागपत विधानसभा सीट पर मुस्लिम मतदाताओं ने रालोद का पूरा साथ दिया। जहां भी मुस्लिमों के कस्बे व गांव थे, वहां रालोद को एकतरफा वोट मिला। जाटों व यादवों से जिस तरह की उम्मीद रालोद ने जताई थी, ऐसा नहीं हो सका। जाटों में बिखराव हुआ तो दलित, गुर्जर, कश्यप, ठाकुर, ब्राह्मण, त्यागी ने भाजपा का पूरा साथ दिया। बसपा व कांग्रेेस के साथ भी यह वोटर नहीं आए। बागपत सीट पर भाजपा के लिए सबसे बड़ा यही जीत का आधार बना। बड़ौत विधानसभा सीट पर यह माना जा रहा था कि ठाकुर व रवां राजपूत के अलावा ब्राह्मण, त्यागी सभी भाजपा के साथ है। साथ ही इस सीट पर जाटों में बिखराव और दलितों के रुख पर भी चुनाव टिका था। इस सीट पर बसपा पूरी मजबूती के साथ चुनाव लड़ रही थी। बसपा व कांग्रेस को ज्यादा वोट मिलने पर सीधा नुकसान भाजपा को होना था। मगर, बड़ौत सीट पर जाटों ने जहां रालोद का साथ दिया तो भाजपा भी उनकी पसंद रही। दलित व कश्यप भी भाजपा के साथ आ गए। ऐसे में समीकरण पूरी तरह से भाजपा की तरफ हो गए।
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छपरौली सीट पर जरूर परिस्थितियां भाजपा के अनुकूल नहीं रही। भाजपा जिस तरह से बसपा व कांग्रेस के प्रत्याशी मुस्लिम होने के कारण वोट काटने की उम्मीद जता रही थी, ऐसा नहीं हो सका। बसपा व कांग्रेस इतनी वोट नहीं काट सकी, जिससे रालोद को बड़ा नुकसान हो सकता। इसलिए ही रालोद अपने छपरौली के किले को बचाने में कामयाब रही।
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योजनाओं व कानून व्यवस्था का दिखा बड़ा असर
बागपत और बड़ौत सीटों पर कमल खिलाने के लिए जिस तरह से दलितों व अन्य कई बिरादरियों के मतदाताओं का साथ मिला है। इसका कारण यह भी माना जा रहा है कि भाजपा सरकार की विकास योजनाओं का काफी लाभ गरीब तबके को मिला तो कानून व्यवस्था का असर भी दिखाई दिया। इसे देखते हुए ही सबसे ज्यादा दलितों ने अपना रुख बदला, जबकि रालोद उनमें बिखराव देखता रहा।
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