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Baghpat: सत्यपाल मलिक ने थामी थी गन्ना भाव बढ़ाने की मशाल, लोकदल का साथ छूटने पर मिला था कांग्रेस हाथ
Wed, 06 Aug 2025 01:19 AM IST
मेरठ ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बागपत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बागपत
Published by: मेरठ ब्यूरो
Updated Wed, 06 Aug 2025 01:19 AM IST
सार
पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह के कभी काफी करीबी रहे सत्यपाल मलिक से लोकदल का वर्ष 1984 में साथ छूट गया।
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सत्यपाल मलिक
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह के कभी काफी करीबी रहे सत्यपाल मलिक से लोकदल का वर्ष 1984 में साथ छूट गया। लोकदल ने उनको छह साल के लिए निष्कासित कर दिया। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस जॉइन कर पार्टी के लिए प्रचार किया था। इसके बाद ही कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा भेजा।
किसान कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओमवीर सिंह तोमर ने बताया कि 1984 में सत्यपाल मलिक लोकदल के राष्ट्रीय सचिव थे। उन्हें पार्टी से छह वर्ष के लिए निष्कासित कर दिया था। इसके एक सप्ताह बाद युवा लोकदल के राष्ट्रीय सचिव पद पर रहते हुए ओमवीर तोमर को भी पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था।
बताया कि इंदिरा गांधी ने दोनों को अपने घर बुलाकर कांग्रेस जॉइन कराने के साथ सत्यपाल मलिक को राज्यसभा और ओमवीर तोमर को विधायक का टिकट देने का वादा किया था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनका वादा राजीव गांधी और अरुण नेहरू ने पूरा किया। सत्यपाल मलिक को राज्यसभा भेजा गया और ओमवीर तोमर को बरनावा से विधायक का टिकट दिया गया, जो चुनाव लड़े मगर हार गए थे।
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गन्ने का भाव बढ़ाने में निभाया अहम योगदान
एक दौर था जब किसानों को उनके खून पसीने से उगाए जा रहे गन्ने का भाव सिर्फ ₹70 प्रति कुंतल दिया जा रहा था। यह मूल्य सुनकर किसान हताश और आक्रोशित था लेकिन उसे समय एक आवाज बडौत से उठी। पूर्व केंद्रीय मंत्री सतपाल मलिक की आवाज, जिसने किस की पीड़ा को ताकत बना दिया। बड़ौत में ठाकुरद्वारा धर्मशाला से वर्ष 1993-94 में शुरू हुआ यह संघर्ष धीरे-धीरे जन आंदोलन में बदल गया।
सत्यपाल मलिक ने खुलकर मंच से कहा था कि ₹70 प्रति क्विंटल गन्ना भाव सरकार की नियत दिखता है यह अपमान बर्दाश्त नहीं होगा। उनके आह्वान पर गांव-गांव में धरने शुरू हो गए थे।
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किसान कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओमवीर सिंह तोमर ने बताया कि 1984 में सत्यपाल मलिक लोकदल के राष्ट्रीय सचिव थे। उन्हें पार्टी से छह वर्ष के लिए निष्कासित कर दिया था। इसके एक सप्ताह बाद युवा लोकदल के राष्ट्रीय सचिव पद पर रहते हुए ओमवीर तोमर को भी पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था।
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बताया कि इंदिरा गांधी ने दोनों को अपने घर बुलाकर कांग्रेस जॉइन कराने के साथ सत्यपाल मलिक को राज्यसभा और ओमवीर तोमर को विधायक का टिकट देने का वादा किया था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनका वादा राजीव गांधी और अरुण नेहरू ने पूरा किया। सत्यपाल मलिक को राज्यसभा भेजा गया और ओमवीर तोमर को बरनावा से विधायक का टिकट दिया गया, जो चुनाव लड़े मगर हार गए थे।
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गन्ने का भाव बढ़ाने में निभाया अहम योगदान
एक दौर था जब किसानों को उनके खून पसीने से उगाए जा रहे गन्ने का भाव सिर्फ ₹70 प्रति कुंतल दिया जा रहा था। यह मूल्य सुनकर किसान हताश और आक्रोशित था लेकिन उसे समय एक आवाज बडौत से उठी। पूर्व केंद्रीय मंत्री सतपाल मलिक की आवाज, जिसने किस की पीड़ा को ताकत बना दिया। बड़ौत में ठाकुरद्वारा धर्मशाला से वर्ष 1993-94 में शुरू हुआ यह संघर्ष धीरे-धीरे जन आंदोलन में बदल गया।
सत्यपाल मलिक ने खुलकर मंच से कहा था कि ₹70 प्रति क्विंटल गन्ना भाव सरकार की नियत दिखता है यह अपमान बर्दाश्त नहीं होगा। उनके आह्वान पर गांव-गांव में धरने शुरू हो गए थे।
हिसावदा से हमेशा जुड़े रहे सत्यपाल मलिक
हिसावदा से सत्यपाल मलिक हमेशा जुड़े रहे, इसलिए लोग उनको कभी भूल नहीं पाए। उनके निधन से हर कोई सदमे में है। गांव के लोग बताते हैं कि राज्यपाल बनने के बाद भी वह गांव के लोगों से लगातार बातचीत करते रहते थे। जितने लोग उनको जानते थे, उनका हालचाल भी पूछते रहते थे, इसलिए भी लोगों को उनके निधन पर ज्यादा दुख है।
हिसावदा से सत्यपाल मलिक हमेशा जुड़े रहे, इसलिए लोग उनको कभी भूल नहीं पाए। उनके निधन से हर कोई सदमे में है। गांव के लोग बताते हैं कि राज्यपाल बनने के बाद भी वह गांव के लोगों से लगातार बातचीत करते रहते थे। जितने लोग उनको जानते थे, उनका हालचाल भी पूछते रहते थे, इसलिए भी लोगों को उनके निधन पर ज्यादा दुख है।
सत्यपाल मलिक का ओहदा बढ़ता रहा और संपत्ति कम होती रही
सत्यपाल मलिक राजनीति का एक चर्चित चेहरा रहे हैं। वह एक बार विधायक, दो बार राज्यसभा सदस्य, एक बार सांसद व केंद्रीय मंत्री और चार राज्यों के राज्यपाल रहे। उनका ओहदा लगातार बढ़ता रहा लेकिन संपत्ति कम होती रही। यह सुनकर कम ही विश्वास होता है, मगर यही सच्चाई है।
हिसावदा गांव के सत्यपाल मलिक ने राजनीति की शुरुआत 1968-69 में छात्र नेता के रूप में की थी। उनकी पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से निकटता रही। वह वर्ष 1974 में बागपत सीट से जीतकर विधायक चुने गए। इस चुनाव को लड़ने से पहले गांव में उनकी पुस्तैनी करीब 30 बीघा खेती की जमीन थी। इसके अलावा परिवार की 700 वर्ग गज में 300 वर्ष पुरानी संयुक्त हवेली आज भी मौजूद है।
उस हवेली में सत्यपाल मलिक के हिस्से के चार कमरे हैं। सत्यपाल मलिक ने राजनीति को हमेशा समाजसेवा का माध्यम समझा। यही कारण रहा कि उन्होंने विधायक बनने के बाद भी समाजसेवा के लिए 15 बीघा जमीन बेच दी। इसके बाद वह दो बार राज्यसभा सदस्य और सांसद बनकर केंद्रीय राज्यमंत्री भी रहे, मगर 1996 में उन्होंने गांव की बाकी 15 बीघा जमीन बेच दी।
उनको वर्ष 2017 में बिहार का राज्यपाल बनाया गया और वह जम्मू कश्मीर, गोवा व मेघालय के राज्यपाल भी रहे। वह अक्तूबर 2022 में सेवानिवृत्त हो गए। तब उनके पास दिल्ली में रहने के लिए एक फ्लैट और गांव में केवल चार खंडहर कमरे रह गए। उन खंडहर कमरों में भी टूटी चारपाई व एक टूटा पलंग आज भी पड़ा है।
सत्यपाल मलिक राजनीति का एक चर्चित चेहरा रहे हैं। वह एक बार विधायक, दो बार राज्यसभा सदस्य, एक बार सांसद व केंद्रीय मंत्री और चार राज्यों के राज्यपाल रहे। उनका ओहदा लगातार बढ़ता रहा लेकिन संपत्ति कम होती रही। यह सुनकर कम ही विश्वास होता है, मगर यही सच्चाई है।
हिसावदा गांव के सत्यपाल मलिक ने राजनीति की शुरुआत 1968-69 में छात्र नेता के रूप में की थी। उनकी पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से निकटता रही। वह वर्ष 1974 में बागपत सीट से जीतकर विधायक चुने गए। इस चुनाव को लड़ने से पहले गांव में उनकी पुस्तैनी करीब 30 बीघा खेती की जमीन थी। इसके अलावा परिवार की 700 वर्ग गज में 300 वर्ष पुरानी संयुक्त हवेली आज भी मौजूद है।
उस हवेली में सत्यपाल मलिक के हिस्से के चार कमरे हैं। सत्यपाल मलिक ने राजनीति को हमेशा समाजसेवा का माध्यम समझा। यही कारण रहा कि उन्होंने विधायक बनने के बाद भी समाजसेवा के लिए 15 बीघा जमीन बेच दी। इसके बाद वह दो बार राज्यसभा सदस्य और सांसद बनकर केंद्रीय राज्यमंत्री भी रहे, मगर 1996 में उन्होंने गांव की बाकी 15 बीघा जमीन बेच दी।
उनको वर्ष 2017 में बिहार का राज्यपाल बनाया गया और वह जम्मू कश्मीर, गोवा व मेघालय के राज्यपाल भी रहे। वह अक्तूबर 2022 में सेवानिवृत्त हो गए। तब उनके पास दिल्ली में रहने के लिए एक फ्लैट और गांव में केवल चार खंडहर कमरे रह गए। उन खंडहर कमरों में भी टूटी चारपाई व एक टूटा पलंग आज भी पड़ा है।