UP: आखिर कैसे बिगड़ा चौधरी परिवार का खेल, 2014 से कर्मभूमि में पड़ा सूखा, इस बार RLD को इसलिए बड़ी उम्मीद
Baghpat News : रालोद की कर्मभूमि कही जाने वाली बागपत लोकसभा सीट पर इस बार मुकाबला दिलचस्प होगा। इस सीट पर वर्ष 2014 में लंबे समय बाद जीत मिली थी और चुनाव के नतीजे चौंकाने वाले रहे थ। पढ़ें इस सीट का पिछला लेखा९जोखा
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जहां बागपत लोकसभा सीट पर लंबे समय तक चौधरी चरण सिंह और चौधरी अजित सिंह का कब्जा रहा और इसलिए ही इसे उनकी कर्मभूमि कहा जाता है। मगर वर्ष 2009 में बागपत लोकसभा सीट का परिसीमन बदलने के बाद से चौधरी परिवार का खेल बिगड़ता चला गया। इस बार भाजपा के साथ गठबंधन होने के बाद से रालोद को पुस्तैनी सीट वापस मिलने की बड़ी उम्मीद है।
बागपत लोकसभा सीट में वर्ष 2009 से पहले तक छपरौली, बरनावा, बागपत, खेकड़ा, सिवालखास विधानसभा सीट शामिल थी। तब रालोद के लिए जाट-मुस्लिम वोट सबसे अहम होता था और इनके सहारे ही रालोद लगातार जीत दर्ज करता रहा।
जहां वर्ष 1977 से 1984 तक लगातार पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह जीतते रहे। वहीं, उनके बाद वर्ष 1989 से 1997 तक चौधरी अजित सिंह ने लगातार जीत दर्ज की। वह एक वर्ष बाद 1998 में सोमपाल शास्त्री से हार गए, मगर एक साल बाद ही फिर से जीत दर्ज की और वह वर्ष 2009 तक जीतते रहे। बागपत लोकसभा सीट का परिसीमन वर्ष 2009 में बदला। जिसमें कभी खेकड़ा में शामिल रहा लोनी को काटकर अलग विधानसभा बनाया गया तो बरनावा विधानसभा में शामिल मेरठ का कुछ हिस्सा सरधना में चला गया।
इनकी जगह मोदीनगर को बागपत लोकसभा में शामिल किया गया। उस साल भाजपा से गठबंधन होने के कारण चौधरी अजित सिंह ने जीत जरूर दर्ज की, मगर जीत का अंतर केवल 63 हजार वोटरों तक सिमट गया। जबकि उससे पहले तक अजित सिंह अधिकतर चुनाव डेढ़ से दो लाख वोटों के अंतर से जीतते रहे थे। इसका बड़ा कारण था कि जिस लोनी व मेरठ के हिस्से में चौधरी परिवार को एकतरफा वोट मिलता था, वह क्षेत्र ही परिसीमन बदलने से बाहर हो गया और उससे खेल बिगड़ गया।
हर किसी को वर्ष 2014 के चुनाव ने चौंकाया
बागपत लोकसभा सीट पर वर्ष 2014 में लंबे समय बाद भाजपा को जीत मिली थी और डॉ. सत्यपाल सिंह चार लाख से ज्यादा वोट लेने में कामयाब रहे थे। वह चौंकाने वाला चुनाव रहा था, क्योंकि चौधरी अजित सिंह तीसरे नंबर पर खिसक गए थे और दूसरे पर सपा के गुलाम मोहम्मद रहे थे। इसके बाद वर्ष 2019 के चुनाव में भाजपा के खिलाफ सभी पार्टियां मिलकर लड़ी थीं। इसके बावजूद रालोद के चौधरी जयंत सिंह जीत नहीं सके और वह करीब 23 हजार वोटों से हार गए।
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अब गठबंधन के सहारे पुस्तैनी सीट वापसी की उम्मीद
अब रालोद को भाजपा के साथ गठबंधन के सहारे अपनी पुस्तैनी सीट वापसी की उम्मीद जगी है। क्योंकि देखा जाए तो छपरौली और सिवालखास में रालोद के विधायक है तो बड़ौत, बागपत, मोदीनगर में भाजपा के विधायक है। इस तरह सभी विधानसभा सीटें रालोद-भाजपा गठबंधन के पास है और छपरौली को रालोद की कोर वोटर तो मोदीनगर को भाजपा के कोर वोटर की सीट माना जाता है। इन सभी के सहारे ही रालोद अपनी पुस्तैनी सीट वापस लेने को मैदान में उतरा है।
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