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60 बरस तक हिंदी कविता के डाकिए बन गए पंडित देवक राम सुमन

Sat, 22 Aug 2020 11:24 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sat, 22 Aug 2020 11:24 PM IST
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Pandit Devak Ram Suman remained the post of Hindi poetry for 60 years
पंडित देवक राम सुमन - फोटो : BAGHPAT
- कंडेरा गांव में जन्में और हिंदी कविता को पहुंचाया शिखर तक
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- चौराहा काव्य, गीत मंजरी, कुंडली शतक और भारत महिमा की रचना की
अमर उजाला ब्यूरो
बागपत। कंडेरा में जन्में पंडित देवक राम सुमन ने हिंदी कविता और काव्य मंचों को नई पहचान दिलाई। देश में हिंदी कवि सम्मेलन का आयोजन कराने में उन्हें महारथ हासिल थी। कविता संग्रह, खंड काव्य और उपन्यास की रचना की। हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की ओर से उन्हें साहित्य महोपाध्याय की उपाधि साल 1989 में प्रदान की गई थी।
बड़ौत के नजदीक कंडेरा गांव में साल 1918 में देवक राम सुमन का जन्म शिक्षक पंडित मंशाराम शर्मा के घर हुआ था। माता भगवान देई के जीवन का देवक राम पर गहरा असर हुआ। गांव में ही शुरूआती शिक्षा ग्रहण की थी। बचपन से ही वह साहित्य साधना में लीन हो गए थे। राजस्थान के बीकानेर के एक स्कूल में शिक्षण कार्य की शुरूआत की। मेरठ, मुजफ्फरनगर, पंजाब में भी उन्होंने शिक्षण कार्य किया। साल 1940 में मेरठ के पिलखुआ में कवि सम्मेलन की शुरूआत की। यहीं से वह हिंदी कविता और कवि मंचों के होकर रह गए। उन्हें कवि सम्मेलन कराने में सिद्धहस्त माना जाता था। कवि सम्मेलनों के माध्यम से उन्होंने हिंदी को घर-घर पहुंचाने का काम भी किया। साल 2002 में कवि देवक राम सुमन का निधन हो गया।
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सहारनपुर के होकर रह गए सुमन
बागपत। देवकराम सुमन ने राजस्थान, पंजाब, मेरठ, मुजफ्फरनगर में शिक्षण कार्य किया। लेकिन साल 1952 में वह सहारनपुर के एसडी इंटर कॉलेज में अध्यापक नियुक्त हुए। इसके बाद वह यहीं के होकर रह गए। उनके शिक्षक पुत्र माधविंद्र अपने परिवार के साथ सहारनपुर के माधवनगर में रहते हैं।
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इस तरह प्रकाशित हुई रचनाएं
बागपत। साल 1947 से 2002 तक उनकी रचनाओं की पुस्तकों का प्रकाशन हुआ। 1976 में प्रकाशित चौराहा काव्य में राष्ट्र की बदलती परिस्थितियों पर प्रकाश डाला। उनकी पंक्ति ‘मैं महाजनों की ओर चलूं या मनिस्वयों की ओर चलूं’ को खूब सराहा गया। 1962 में पूर्वजों के पत्र लिखकर उन्होंने वाहवाही लूट ली थी। एकलव्य पर उनकी रचना किरात पुत्र को खूब सराहा गया। चांद बटोही, बाल क्रांति गीत, प्रणय गीत, पूर्वजों के पत्र, युगध्वनि, कुंडली शतक, चौराहा काव्य, गीत मंजरी, भारत महिमा, वहिन ज्वाल, साहित्य तरंगिणी, अनादि शक्ति, उपन्यास सैरंध्री, विधि का विधान काल चक्र की रचना की।
गांव और गली तक लेकर गए कवि सम्मेलन
बागपत। 1948 में बड़ौत के दिगंबर जैन इंटर कॉलेज में पहली बार उन्होंने कवि सम्मेलन कराया। देश के प्रसिद्ध कवि गोपाल प्रसाद व्यास, शंभू नाथ शेष, डॉ ओमप्रकाश दीक्षित ने भाग लिया। खेकड़ा में 1950 में कवि सम्मेलन कराया। किशनपुर बिराल, अमीनगर सराय, छपरौली सहित जिले भर में कवि सम्मेलनों की शुरूआत की। मुजफ्फरनगर में 1958 में कवि सम्मेलन कराया था।

महलों तक में ही बंद अभी, क्यों दीपावली का उजियाला
कुटियों पर ही घिरता जाता, क्यों सघनतिमिर काला काला
..... कुंडली शतक
उनके विषय में किसने क्या कहा
- कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर ने लिखा था कि कवि वह पैदायशी है और कवि सम्मेलनों का आयोजन उसकी हॉबी है। दोस्तों को वह खून से सींचता हैं।
- श्याम नारायण पांडेय ने लिखा था कि आपका साहित्यक जीवन धन्य है। परम पावन है। आपकी सेवा अमर है और आप अमर हैं।
भाले आरपार हो जाते थे
तलवार छपाछप चलती थी
मुगल वाहिनी की लाशें
युद्धस्थल में पड़ी मचलती थी
........ युगध्वनि
किसने क्या कहा
- बेटे मेधाविंद्र निलय का कहना है कि उनके कुल में जन्म लेना सौभाग्य की बात है। उनके बताए रास्ते पर ही पूरा परिवार चल रहा है। परिवार में उनकी पुत्रवधू शशि प्रभा, पौत्र मनोज्ञ और पौत्री किंजली शर्मा हैं।
- उनके शिष्य बलवीर सिंह करुण ने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि कई राज्यों में उन्होंने कवि सम्मेलनों की शुरूआत कराई थी।
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