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जिले में तो नहीं खपाई एनसीईआरटी की किताबें
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- मेरठ में खुलासे के बाद छात्र-छात्राएं, शिक्षक और अभिभावक के मन में दुविधा
- बागपत जिले में मेरठ से ही होती है अधिकतर किताबों की खरीदारी
अमर उजाला ब्यूरो
बागपत/बड़ौत/खेकड़ा। मेरठ में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की 35 करोड़ की किताबें मिलने से शिक्षक, अभिभावक और छात्र-छात्राएं हैरान हैं। जिले में अधिकतर किताबों की खरीदारी मेरठ से ही होती है। बड़ौत में किताबों का पूरा बाजार है। कोरोना संक्रमण के कारण भले ही यहां भीड़ कम हो, लेकिन एनसीईआरटी की किताबें जरूरत के हिसाब से खरीदी गई। सबसे बड़ा सवाल यही है कि कहीं ऐसा तो नहीं हैं कि जिले भी किताबें खपा दी गई हो। बागपत नगर में भी किताबों की कई दुकानें हैं। इसके अलावा खेकड़ा में दिल्ली से भी किताबों की आपूर्ति की जाती है।
इस तरह करें असली-नकली की पहचान
बागपत। एनसीईआरटी की असली किताबों पर वाटरमार्क होता है। किताबें खरीदते समय बेहद सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। नकली किताबों पर वाटरमार्क नहीं होता है। आठ से दस पन्नों की जांच करें, अगर वाटरमार्क नहीं मिला तो किताबें नकली हैं।
मुनाफे के खेल में स्कूलों की नियत पर सवाल
बागपत। नकली किताबों के मुनाफे के खेल में स्कूलों की नियत पर भी सवाल उठता है। असली किताबों पर दुकानदारों को कमीशन की कम बचत होती है, जबकि नकली किताबों पर दुकानदार, प्रकाशक और स्कूल संचालकों को कमीशन बचता है। स्कूलों में तय करने के बाद वही किताबें स्कूलों में लगवा दी जाती है। सीधा नुकसान अभिभावकों की जेब को होता है। शिक्षण सत्र शुरू होते ही प्रकाशक स्कूलों के चक्कर काटने शुरू कर देते हैं।
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सालाना पांच करोड़ का कारोबार
बागपत। जिले में किताबों का सालाना पांच करोड़ से अधिक का कारोबार है। बड़ौत की किताब वाली गली में करीब 60 दुकानें हैं। यहां हर महीने करीब 30 लाख रुपये का कारोबार होता है। किताबों के अलावा अन्य स्टेशनरी भी शामिल हैं। इसके अलावा बागपत, खेकड़ा, अमीनगर सराय, अग्रवाल मंडी टटीरी, छपरौली, दोघट, टीकरी समेत अन्य स्थानों पर करीब 250 दुकानें हैं। जिन पर साल में औसतन पांच करोड़ का कारोबार होता है। इस साल कोरोना के कारण दुकानदारों को भी मुश्किलें झेलनी पड़ी हैं।
मेरठ में फर्जी किताबों का पकड़ा जाना बड़ा मामला है। जिले में भी अगर शिकायत मिलती है तो जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी। - डा. रेखा सिंह, प्रभारी डीआईओएस।
किसने क्या कहा
पैरेंट्स टीचर्स वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज कुमार और दिगबंर जैन डिग्री कॉलेज के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष अक्षय चौहान का कहना है कि बड़े विद्यालयों द्वारा एक दुकान को निर्धारित कर अभिभावकों को पुस्तकें वहीं से लेने के लिए कहा जाता है। यह सब कही ना कही उसी फर्जीवाडे़ का हिस्सा हो सकता है। छात्र नेता प्रियवत राणा ने कहा कि हमारे जनपद में 3 से 4 हजार छात्र 100 से अधिक कॉलेज एवं स्कूलों में एनसीईआरटी की पुस्तकों का अध्ययन करते हैं, इसलिए हमें आशंका है कि इन फर्जी पुस्तकों का होना यहां भी निश्चित है। इसकी जनपद में भी जांच होनी चाहिए और शिक्षा के दलालों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य रामदेव जांगिड़ ने कहा कि शिक्षा के नाम पर गोरखधंधा हो रहा है। ऐसे ही लोग हमारे इतिहास के साथ छेड़छाड़ कर रहे है और गलत शिक्षा देकर देश की युवा पीढ़ी को बर्बाद कर रहे है। एनएसयूआई के जिलाध्यक्ष राहुल चौधरी का कहना है कि फर्जी पुस्तकों का मामला बहुत ही गंभीर है। जनपद में भी इसकी जांच होनी चाहिए।
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- बागपत जिले में मेरठ से ही होती है अधिकतर किताबों की खरीदारी
अमर उजाला ब्यूरो
बागपत/बड़ौत/खेकड़ा। मेरठ में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की 35 करोड़ की किताबें मिलने से शिक्षक, अभिभावक और छात्र-छात्राएं हैरान हैं। जिले में अधिकतर किताबों की खरीदारी मेरठ से ही होती है। बड़ौत में किताबों का पूरा बाजार है। कोरोना संक्रमण के कारण भले ही यहां भीड़ कम हो, लेकिन एनसीईआरटी की किताबें जरूरत के हिसाब से खरीदी गई। सबसे बड़ा सवाल यही है कि कहीं ऐसा तो नहीं हैं कि जिले भी किताबें खपा दी गई हो। बागपत नगर में भी किताबों की कई दुकानें हैं। इसके अलावा खेकड़ा में दिल्ली से भी किताबों की आपूर्ति की जाती है।
इस तरह करें असली-नकली की पहचान
बागपत। एनसीईआरटी की असली किताबों पर वाटरमार्क होता है। किताबें खरीदते समय बेहद सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। नकली किताबों पर वाटरमार्क नहीं होता है। आठ से दस पन्नों की जांच करें, अगर वाटरमार्क नहीं मिला तो किताबें नकली हैं।
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मुनाफे के खेल में स्कूलों की नियत पर सवाल
बागपत। नकली किताबों के मुनाफे के खेल में स्कूलों की नियत पर भी सवाल उठता है। असली किताबों पर दुकानदारों को कमीशन की कम बचत होती है, जबकि नकली किताबों पर दुकानदार, प्रकाशक और स्कूल संचालकों को कमीशन बचता है। स्कूलों में तय करने के बाद वही किताबें स्कूलों में लगवा दी जाती है। सीधा नुकसान अभिभावकों की जेब को होता है। शिक्षण सत्र शुरू होते ही प्रकाशक स्कूलों के चक्कर काटने शुरू कर देते हैं।
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सालाना पांच करोड़ का कारोबार
बागपत। जिले में किताबों का सालाना पांच करोड़ से अधिक का कारोबार है। बड़ौत की किताब वाली गली में करीब 60 दुकानें हैं। यहां हर महीने करीब 30 लाख रुपये का कारोबार होता है। किताबों के अलावा अन्य स्टेशनरी भी शामिल हैं। इसके अलावा बागपत, खेकड़ा, अमीनगर सराय, अग्रवाल मंडी टटीरी, छपरौली, दोघट, टीकरी समेत अन्य स्थानों पर करीब 250 दुकानें हैं। जिन पर साल में औसतन पांच करोड़ का कारोबार होता है। इस साल कोरोना के कारण दुकानदारों को भी मुश्किलें झेलनी पड़ी हैं।
मेरठ में फर्जी किताबों का पकड़ा जाना बड़ा मामला है। जिले में भी अगर शिकायत मिलती है तो जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी। - डा. रेखा सिंह, प्रभारी डीआईओएस।
किसने क्या कहा
पैरेंट्स टीचर्स वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज कुमार और दिगबंर जैन डिग्री कॉलेज के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष अक्षय चौहान का कहना है कि बड़े विद्यालयों द्वारा एक दुकान को निर्धारित कर अभिभावकों को पुस्तकें वहीं से लेने के लिए कहा जाता है। यह सब कही ना कही उसी फर्जीवाडे़ का हिस्सा हो सकता है। छात्र नेता प्रियवत राणा ने कहा कि हमारे जनपद में 3 से 4 हजार छात्र 100 से अधिक कॉलेज एवं स्कूलों में एनसीईआरटी की पुस्तकों का अध्ययन करते हैं, इसलिए हमें आशंका है कि इन फर्जी पुस्तकों का होना यहां भी निश्चित है। इसकी जनपद में भी जांच होनी चाहिए और शिक्षा के दलालों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य रामदेव जांगिड़ ने कहा कि शिक्षा के नाम पर गोरखधंधा हो रहा है। ऐसे ही लोग हमारे इतिहास के साथ छेड़छाड़ कर रहे है और गलत शिक्षा देकर देश की युवा पीढ़ी को बर्बाद कर रहे है। एनएसयूआई के जिलाध्यक्ष राहुल चौधरी का कहना है कि फर्जी पुस्तकों का मामला बहुत ही गंभीर है। जनपद में भी इसकी जांच होनी चाहिए।