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दया धर्म का मूल है-जैनाचार्य आशीष मुनि
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शहर जैन स्थानक में आयोजित धर्मसभा में श्रद्धालुओं को दिए प्रवचन
संवाद न्यूज एजेंसी
बड़ौत। जैनाचार्य आशीष मुनि ने कहा कि दया धर्म का मूल है। जिस आचरण में अहिंसा नहीं वहां धर्म का कोई रूप नहीं हो सकता है।
वे बृहस्पतिवार को जैन स्थानक मंडी से विहार करके जैन स्थानक में आयोजित धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि धर्म स्थान में बैठकर भी कुछ लोग पाप कर्म करते हैं। जैसे मंदिर या स्थानक पुण्य उपार्जन के स्थान हैं और कुछ लोग ऐसे पवित्र स्थान में जाकर भी किसी की निंदा, चुगली करते रहे, जेबकतरा या चप्पल चोर भी धर्म स्थल में बैठकर पाप कमाते हैं। जिनका जीवन पवित्र है, सोच अच्छी हो तो कर्म बंधे के जगह बैठकर पुण्य आत्मा शुद्ध करने वाले बन जाते हैं। महात्मा गांधी जेल में थे। वहां भी लोगों को शिक्षा दान करते थे। अत: स्थान कौन सा है, कैसा है, इतना महत्वपूर्ण नहीं है, पर उसके विचार कैसे हैं यह महत्वपूर्ण है। विचारों के हिसाब से पुण्य या पाप मिलते हैं। जैन मुनि तत्व चिंतक उत्तम मुनि ने कहा कि ज्ञानी वह नहीं है जिसने बहुत पढ़ा है, याद कर रखा है। ज्ञानी वह है जिसका जीवन दया, करुणा, अहिंसा तथा परोपकार में है। दया धर्म का मूल है। जिस आचरण में अहिंसा नहीं हो वह कभी भी धर्म का रूप नहीं ले सकता है। यहां कमल जैन, घसीटू मल, शिखर चंद, राजीव, संजय, सुरेश, अमित राय, नवीन जैन, संजय, देवेंद्र , पंकज, पवन, पारस जैन आदि उपस्थित रहे।
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संवाद न्यूज एजेंसी
बड़ौत। जैनाचार्य आशीष मुनि ने कहा कि दया धर्म का मूल है। जिस आचरण में अहिंसा नहीं वहां धर्म का कोई रूप नहीं हो सकता है।
वे बृहस्पतिवार को जैन स्थानक मंडी से विहार करके जैन स्थानक में आयोजित धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि धर्म स्थान में बैठकर भी कुछ लोग पाप कर्म करते हैं। जैसे मंदिर या स्थानक पुण्य उपार्जन के स्थान हैं और कुछ लोग ऐसे पवित्र स्थान में जाकर भी किसी की निंदा, चुगली करते रहे, जेबकतरा या चप्पल चोर भी धर्म स्थल में बैठकर पाप कमाते हैं। जिनका जीवन पवित्र है, सोच अच्छी हो तो कर्म बंधे के जगह बैठकर पुण्य आत्मा शुद्ध करने वाले बन जाते हैं। महात्मा गांधी जेल में थे। वहां भी लोगों को शिक्षा दान करते थे। अत: स्थान कौन सा है, कैसा है, इतना महत्वपूर्ण नहीं है, पर उसके विचार कैसे हैं यह महत्वपूर्ण है। विचारों के हिसाब से पुण्य या पाप मिलते हैं। जैन मुनि तत्व चिंतक उत्तम मुनि ने कहा कि ज्ञानी वह नहीं है जिसने बहुत पढ़ा है, याद कर रखा है। ज्ञानी वह है जिसका जीवन दया, करुणा, अहिंसा तथा परोपकार में है। दया धर्म का मूल है। जिस आचरण में अहिंसा नहीं हो वह कभी भी धर्म का रूप नहीं ले सकता है। यहां कमल जैन, घसीटू मल, शिखर चंद, राजीव, संजय, सुरेश, अमित राय, नवीन जैन, संजय, देवेंद्र , पंकज, पवन, पारस जैन आदि उपस्थित रहे।