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कारगिल के बलिदानी पन्नों में बागपत के बेटों की अमर कहानी

Tue, 26 Jul 2016 01:00 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बागपत
ब्यूरो/अमर उजाला, बागपत Updated Tue, 26 Jul 2016 01:00 AM IST
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immortalized Story of the sons of baghpat  in Krgil
खेकड़ा में शहीद राजेंद्र की तस्वीर के साथ उनके माता-पिता। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
कारगिल के बलिदानी पन्नों पर बागपत के बेटों ने अमर कहानी लिखी। अट्ठारह बरस पहले मातृभूमि की रक्षा के लिए चार जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दी।
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शहीदों में जिवाना गुलियान निवासी सिपाही जितेंद्र, बावली निवासी अनिल कुमार, खेकड़ा का लांस नायक राजेंद्र सिंह और बिनौली गांव का हवलदार पदम सिंह शामिल हैं। इन वीरों के किस्से आज भी सबकी जुबान पर है। वीर सेनानियों के किस्से याद कर अपनों की आंखे भर आती है। सब्र कर कहते हैं लाड़ले चले गए, लेकिन हमारा सिर हमेशा के लिए गौरव से ऊंचा रहेगा।

कब मिलेगा जमीन का टुकड़ा ः खेकड़ा के लांस नायक राजेंद्र सिंह ने कारगिल में प्राणों की आहुति दी। पिता जय सिंह और मां शकुंतला देवी के अनुसार सरकार घोषणाएं करतीं हैं, लेकिन इन्हें पूरा कम ही किया जाता है।
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एक जमीन के टुकड़े का  ऐलान हुआ था, अब तक नहीं मिला। शहीद के भाई सहंसर पाल कहते हैं कि कई बार उन्हें प्रशासन की ओर से एक दो जगह जमीन दिखाई गई, लेकिन आज तक नहीं मिली। यह तो शहीदों का अपमान है। सरकार को इस तरह की घोषणाएं नहीं करनी चाहिए, जिन्हें पूरा ही नहीं करना होता है।
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हमारे लिए सरकार के पास नहीं बजट
जिवाना गुलियान गांव के जितेंद्र सिंह ने कारगिल के द्रास सेक्टर में शहादत दी थी। कारगिल युद्ध से करीब तीन माह पहले ही उसकी शादी हुई, घर आने का वादा कर सीमा पर गया था, लेकिन सात जुलाई 1999 को उसकी शहादत की खबर गांव में पहुंची।

पिता देशपाल सिंह और मां ब्रहम कौर की आंखें लाड़ले को याद कर भर आती है। भाई भूपेंद्र कुमार और बिजेंद्र कुमार कहते हैं भाई को खोने का दुख है, लेकिन मातृभूमि की रक्षा के लिए युद्ध सैनिक का पहला कर्तव्य है।

भूपेंद्र व्यवस्था पर तंज कसते हुए कहते हैं कि कारगिल के शहीदों को राज्य सरकार की ओर से चार माह में एक बार पेंशन दी जाती है। साल 2016 की पेंशन अब तक नहीं मिली। आखिर शहीदों के परिवारों को प्रत्येक माह पेंशन क्यों नहीं दी जाती।

चिट्ठी पर चिट्ठी, मगर नहीं शुरू हुई पेंशन
बावली के सिपाही अनिल कुमार ने कारगिल में शहीद हुआ था। सुलतान सिंह के बेटे अनिल कुमार ने गांव का नाम रोशन किया, लेकिन वक्त के साथ सरकार सैनिकों की बहादुरी को भुलाने लगी है।

शहीद के पिता सुलतान सिंह का कहना है कि उन्हें लंबे समय से पेंशन नहीं मिली है। अनिल के शहीद होने के बाद उसकी पत्नी सविता की शादी देवर के साथ कर दी, इससे उसकी पेंशन भी बंद हो गई। सविता कहती है कि वह सरकार को चिट्ठी पर चिट्ठी लिख रहे हैं, लेकिन कोई उनकी सुध नहीं ले रहा है। हालात बेहद खराब हैं। सरकार को शहीदों का सम्मान करना चाहिए।

हमेशा याद आएगा बिनौली का लाल
बिनौली के हवलदार पदम सिंह ने आठ मई 1999 को कारगिल के द्रास सेक्टर में शहादत दी थी। मां शकुंतला देवी, पत्नी मुकेश देवी, बेटा निखिल और अक्षय, बेटी शालू और विशु हैं। भाई सौराज सिंह कहते हैं कि सरकार ने शहीदों के लिए जो वादा किया था, उन्हें सब मिल गया है। 


जल्द मिलेगी पेंशन
जिला सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास अधिकारी मेजर (रिटायर्ड) संजय श्रीवास्तव का कहना है कि चार महीने में पेंशन देने की व्यवस्था है। बजट आ गया है, एक दो दिन में शहीदों के आश्रितों को पेंशन वितरित करा दी जाएगी। 


 
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