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Baghpat News: झेली यातनाएं, गुड व चना खाकर भरा पेट, नहीं किया समझौता

Tue, 25 Jun 2024 06:01 AM IST
मेरठ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बागपत
संवाद न्यूज एजेंसी, बागपत Updated Tue, 25 Jun 2024 06:01 AM IST
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Endured torture, filled stomach by eating jaggery and gram, did not compromise
बड़ौत। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर थोपे गए आपातकाल को 50 साल हो गए है। आपातकाल की यादें आज भी लोकतंत्र सेनानियों के जख्मों को हरा कर देती हैं। 25 जून 1975 से 23 मार्च 1977 के बीच करीब 21 महीने का वह दौर जब याद आता है तो रौंगटे खड़े हो जाते हैं। लोकतंत्र सेनानियों ने बहुत यातनाएं झेली और गुड़ व चना खाकर पेट भरा, लेकिन एक बार भी समझौते के बारे में नहीं सोचा।
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आपातकाल के दौर में बागपत से भी 12 सेे 115 लोग जेल गए और घोर यातनाएं झेलीं। उस दौर को याद करते हुए किरठल गांव निवासी और इस समय गन्नौर रह रहे लोकतंत्र सेनानी डॉ. देवीशरण (80) का कहना है कि लोकतंत्र प्रेमियों के लिए 25 जून स्वतंत्र भारत के सबसे काले दिवसों में शामिल है। उस दौरान हमने बहुत यातनाएं झेलीं, लेकिन समझौते के बारे में एक बार भी नहीं सोचा। उस समय बाल स्वयं सेवक रहे व भाजपा विधि प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पूर्व सदस्य और आरएसएस से जुड़े विनोद जैन एडवोकेट (62) बताते हैं कि आपात काल में नगर से गुरुदत्ता मल, धर्मपाल चौहान, अभय कुमार, स्वर्गीय प्रवीण कुमार, छपरौली से सुमतप्रसाद जैन, जेठानंद, डॉ. देवी शरण किरठल, राम भरोसे भाई दोघट, अग्रवाल टटीरी के पूर्व चेयरमैन स्वर्गीय मामचंद अग्रवाल, खेकड़ा से जगमेंद्र प्रसाद जैन, जयप्रकाश जैन दाहा वाले, टेकचंद हीरा होटल वाले सहित संघ से पुराने समय से जुड़े दर्जनों लोग मेरठ जेल गए थे। विनोद जैन का कहना है कि पुलिस उन्हें जेल ले जाती थी, मगर कम उम्र का होने के चलते बाद में छोड़ देती थी। संघ से कोई नाता नहीं, लिखकर देने पर नहीं भेजते थे जेल लोकतंत्र सेनानी अभय जैन बताते हैं कि उस समय उनकी उम्र करीब 15-16 साल रही होगी। आपातकाल में पुलिस उन लोगों को जेल नहीं भेजती थी, जो यह लिखकर दे देते थे कि हम संघ की नीतियों में विश्वास नहीं रखते। लेकिन संघ से जुडे़ लोगों ने लिखकर देने की बजाय जेल जाना पसंद किया। उस समय चने के दाने और गुड़ खाकर पेट भरते थे।
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संघ की गतिविधियों पर लगा दिया था प्रतिबंध उस समय संघ की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। स्वयं सेवक भूमिगत होकर गतिविधियों को कर रहे थे। संघ का साहित्य भी प्रकाशित होता था, उस पर भी प्रतिबंध लगा था। इसके बावजूद संघ से जुड़े लोग चोरी छिपे घर-घर में पत्रक बांटते थे।
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