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हौसले से मुसीबतों के पहाड़ काटती हैं बेटियां
ब्यूरो/अमर उजाला, बागपत
Updated Fri, 02 Sep 2016 01:31 AM IST
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िसलाई करती दिव्यांग युवती शमां।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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जमाना भले ही उन्हें कमजोर मानें, लेकिन अपने हौसले से जिले की बेटियां पहाड़ जैसी मुसीबतों को पीछे छोड़ रही है। छपरौली की निशा चाय की दुकान चलाकर परिवार का पेट पालती है। सैदपुर कलां की शमां ने हादसे में पैर खोया, लेकिन हिम्मत से पढ़ाई जारी रखे हैं।
मीतली गांव की आंचल के पिता बीमार है, ऐसे में बेटी ने परिवार का पेट पालने वाली फलों की ठेली खुद संभाली। पिता के साथ मिलकर वह फल बेचती है। बेटियां का हौसला दूसरों के लिए प्रेरणा है। उन लोगों के लिए भी जो कोख में ही बेटे और बेटी की पहचान कराने के जुगाड़ में रहते हैं। यहीं नहीं, बेटे की चाहत में कोख में ही कत्ल तक करा देते है। ऐको इन बेटियों से जरूर सीख लेनी चाहिए।
बहादुर बेटी है खेकड़ा की शमां
सैदपुर कलां गांव का लाला के सात बच्चे हैं, लेकिन इनका घर बेटी शमां की हिम्मत और हौसले से रोशन है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार की बेटी शमां का करीब छह साल पहले बड़ा गांव में एक सड़क हादसे में पैर कट गया था। पहाड़ से गम के बावजूद शमां ने हिम्मत नहीं हारी। उसने पढ़ाई जारी रखी। आर्थिक दिक्कतें सामने आई तो महिलाओं के कपड़े सिलने शुरू किए। इससे पढ़ाई का खर्च और परिवार की भी मदद की।
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निशा की हिम्मत को सलाम करिए
छपरौली थाने की बगल में चाय की दुकान चलाने वाली निशा की हिम्मत को दाद दें। साढ़े सात साल पहले पिता का निधन हुआ। तब इस बेटी ने परिवार का पेट पालने वाली चाय की दुकान संभाली और वह आज भी रोज सुबह साढे़ पांच बजे यहां पहुंच जाती है।
दुकान चलाने के साथ-साथ वह डबल एमए तक पढ़ाई कर चुकी है। पिता की जगह अब डाकघर में मां को नौकरी मिल गई है, लेकिन निशा कहती है कि जिम्मेदारियां बहुत हैं। जिन्हें अभी भी पूरा करना है।
खुद परिवार का बन गई आंचल
बागपत। मीतली के फल विक्रेता विनोद के एक हाथ और पैर ने एकाएक काम करना बंद कर दिया। परिवार में चार बेटी हैं। ऐसे में उसकी बेटी आंचल ने पिता की मदद का जिम्मा संभाला। पहले स्कूल और इसके बाद फल की ठेली पर पिता की मदद। विनोद कहता है कि भगवान ऐसी बेटी सबको दें। वह शारीरिक रूप से मजबूर हैं, लेकिन उसकी बेटी ने बेटे से भी बढ़कर मदद की है।
तीनों लड़कियां दूसरों के लिए मिशाल हैं। इन्हें पुरस्कार के लिए संस्तुति की गई है। मुसीबतों के बाद भी इन लड़कियों ने हिम्मत नहीं हारी, खास बात यह है कि पढ़ाई भी जारी रखी। ऐसी बेटियां प्रेरणा स्त्रोत होती है।
- रेहाना सुल्ताना, समन्वयक, बेटी बचाओ अभियान।
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मीतली गांव की आंचल के पिता बीमार है, ऐसे में बेटी ने परिवार का पेट पालने वाली फलों की ठेली खुद संभाली। पिता के साथ मिलकर वह फल बेचती है। बेटियां का हौसला दूसरों के लिए प्रेरणा है। उन लोगों के लिए भी जो कोख में ही बेटे और बेटी की पहचान कराने के जुगाड़ में रहते हैं। यहीं नहीं, बेटे की चाहत में कोख में ही कत्ल तक करा देते है। ऐको इन बेटियों से जरूर सीख लेनी चाहिए।
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बहादुर बेटी है खेकड़ा की शमां
सैदपुर कलां गांव का लाला के सात बच्चे हैं, लेकिन इनका घर बेटी शमां की हिम्मत और हौसले से रोशन है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार की बेटी शमां का करीब छह साल पहले बड़ा गांव में एक सड़क हादसे में पैर कट गया था। पहाड़ से गम के बावजूद शमां ने हिम्मत नहीं हारी। उसने पढ़ाई जारी रखी। आर्थिक दिक्कतें सामने आई तो महिलाओं के कपड़े सिलने शुरू किए। इससे पढ़ाई का खर्च और परिवार की भी मदद की।
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निशा की हिम्मत को सलाम करिए
छपरौली थाने की बगल में चाय की दुकान चलाने वाली निशा की हिम्मत को दाद दें। साढ़े सात साल पहले पिता का निधन हुआ। तब इस बेटी ने परिवार का पेट पालने वाली चाय की दुकान संभाली और वह आज भी रोज सुबह साढे़ पांच बजे यहां पहुंच जाती है।
दुकान चलाने के साथ-साथ वह डबल एमए तक पढ़ाई कर चुकी है। पिता की जगह अब डाकघर में मां को नौकरी मिल गई है, लेकिन निशा कहती है कि जिम्मेदारियां बहुत हैं। जिन्हें अभी भी पूरा करना है।
खुद परिवार का बन गई आंचल
बागपत। मीतली के फल विक्रेता विनोद के एक हाथ और पैर ने एकाएक काम करना बंद कर दिया। परिवार में चार बेटी हैं। ऐसे में उसकी बेटी आंचल ने पिता की मदद का जिम्मा संभाला। पहले स्कूल और इसके बाद फल की ठेली पर पिता की मदद। विनोद कहता है कि भगवान ऐसी बेटी सबको दें। वह शारीरिक रूप से मजबूर हैं, लेकिन उसकी बेटी ने बेटे से भी बढ़कर मदद की है।
तीनों लड़कियां दूसरों के लिए मिशाल हैं। इन्हें पुरस्कार के लिए संस्तुति की गई है। मुसीबतों के बाद भी इन लड़कियों ने हिम्मत नहीं हारी, खास बात यह है कि पढ़ाई भी जारी रखी। ऐसी बेटियां प्रेरणा स्त्रोत होती है।
- रेहाना सुल्ताना, समन्वयक, बेटी बचाओ अभियान।