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आश्रमों से लेकर देहात तक अब नहीं दिखता चरखा
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गांधी जयंती पर विशेष
- पहले घरों में चरखे पर सूत कातकर तैयार किए जाते थे कपड़े
- अब सूत कातना बीते जमाने की बात, चरखे भी हो गए गायब
बड़ौत (बागपत)। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वदेशी का संदेश दिया। वह खुद चरखा चलाते और लोगों को प्रेरणा देते थे। यही वजह है कि हर घर में चरखा चलता। महिलाएं सूत कातने का कार्य करती थी। लेकिन अब दौर बदल गया है। घरों से ही नहीं बल्कि गांधी आश्रमों से भी चरखे गायब हैं। अब मशीनों के माध्यम से हैंडलूम इकाईयों पर काम होता है।
क्या कहती है बुजुर्ग महिलाएं :
- दयावती (75) ने बताया कि उनके समय में चरखे का प्रचलन था। चरखा हर घर में हुआ करता था। चरखे से वह सूत काततीं व बाद में उसी से दरी बनाती थीं। यह प्रचलन शहरों की बजाय गावों में अधिक था।
बुजुर्ग महिला महेन्द्री (90) बताती हैं कि गांधीजी के कहने पर भारत में बसी महिलाओं ने चरखे की महत्ता को बखूबी समझा। आजादी के बाद चरखों ने कपड़ा निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन अब तो जैसे दौर बदल गया है।
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बुजुर्ग महिला जय देवी (85) बताती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में चरखा महिलाओं की आजीविका का अच्छा साधन भी बना, लेकिन अब कहां महिलाएं चरखा चलाती है, अब तो दो-चार घरों को छोड़कर अन्य घरों में भी चरखा नहीं मिलेगा।
चरखा देखा, लेकिन नहीं काता सूत
बड़ौत। महिला बबीता, बरखा, सरिता के अनुसार उन्होंने चरखा देखा तो है, लेकिन कभी सूत नहीं काता। नानी व दादी को चरखा कातने व चक्की पीसने का काफी शौक था।
दिनचर्या का हिस्सा होता था चरखा
बड़ौत। बुजुर्ग महिला सतवीरी कहती हैं कि पहले चरखा दिनचर्या का हिस्सा होता था। दोपहर से शाम तक महिलाएं सूत कातने का काम करती थी। धीरे-धीरे सूत एकत्र हो जाता था। सर्दियों में इसी सूत से कंबल, दरी और खेस बनाए जाते थे। फैशन के दौर में बच्चों ने पुराने कपड़े प्रयोग करना छोड़ दिया, जिस कारण अब चरखों का महत्व भी घट गया।
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- पहले घरों में चरखे पर सूत कातकर तैयार किए जाते थे कपड़े
- अब सूत कातना बीते जमाने की बात, चरखे भी हो गए गायब
बड़ौत (बागपत)। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वदेशी का संदेश दिया। वह खुद चरखा चलाते और लोगों को प्रेरणा देते थे। यही वजह है कि हर घर में चरखा चलता। महिलाएं सूत कातने का कार्य करती थी। लेकिन अब दौर बदल गया है। घरों से ही नहीं बल्कि गांधी आश्रमों से भी चरखे गायब हैं। अब मशीनों के माध्यम से हैंडलूम इकाईयों पर काम होता है।
क्या कहती है बुजुर्ग महिलाएं :
- दयावती (75) ने बताया कि उनके समय में चरखे का प्रचलन था। चरखा हर घर में हुआ करता था। चरखे से वह सूत काततीं व बाद में उसी से दरी बनाती थीं। यह प्रचलन शहरों की बजाय गावों में अधिक था।
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बुजुर्ग महिला महेन्द्री (90) बताती हैं कि गांधीजी के कहने पर भारत में बसी महिलाओं ने चरखे की महत्ता को बखूबी समझा। आजादी के बाद चरखों ने कपड़ा निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन अब तो जैसे दौर बदल गया है।
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बुजुर्ग महिला जय देवी (85) बताती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में चरखा महिलाओं की आजीविका का अच्छा साधन भी बना, लेकिन अब कहां महिलाएं चरखा चलाती है, अब तो दो-चार घरों को छोड़कर अन्य घरों में भी चरखा नहीं मिलेगा।
चरखा देखा, लेकिन नहीं काता सूत
बड़ौत। महिला बबीता, बरखा, सरिता के अनुसार उन्होंने चरखा देखा तो है, लेकिन कभी सूत नहीं काता। नानी व दादी को चरखा कातने व चक्की पीसने का काफी शौक था।
दिनचर्या का हिस्सा होता था चरखा
बड़ौत। बुजुर्ग महिला सतवीरी कहती हैं कि पहले चरखा दिनचर्या का हिस्सा होता था। दोपहर से शाम तक महिलाएं सूत कातने का काम करती थी। धीरे-धीरे सूत एकत्र हो जाता था। सर्दियों में इसी सूत से कंबल, दरी और खेस बनाए जाते थे। फैशन के दौर में बच्चों ने पुराने कपड़े प्रयोग करना छोड़ दिया, जिस कारण अब चरखों का महत्व भी घट गया।