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गौरैया बचाने के लिए अभियान शुरू
ब्यूरो/ अमर उजाला, बागपत
Updated Wed, 02 Mar 2016 12:42 AM IST
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जिस नन्हीं चिडिय़ा गौरैया की चहचहाहट को सुनकर सुबह आंखें खुलतीं थीं, जिनकी चहचहाहट ही सवेरा होने का अहसास करातीं थीं, न जाने कहां गुम हो गई वह चहचहाहट..। चीं-चीं, चूं-चूं की वह चहचहाहट अब सुबह सुनाई नहीं पड़ती, अब वह नन्हीं गौरैया सवेरा करने के लिए नहीं आ रही। अचानक ही न जाने ऐसा क्या हुआ कि गौरेया हमारे आसपास से लुप्त हो गई। शायद पेड़ों को काटकर बनाए गए हमारे पक्के मकानों में उसके घोंसला बनाने के लिए जगह नहीं रही, हमारी पीढ़ी तो आगे बढ़ गई, लेकिन गौरैया की पीढ़ी आगे नहीं बढ़ सकी और अब यह प्रजाति विलुप्त होने के कगार पर है। शहरों की कंक्रीट में तो गौरैया दूर-दूर तक नजर नहीं आती, गांवों की बगिया भी अब गौरैया की आवाज से सूनी होती जा रही है।
इस नन्हीं गौरैया को बचाने के लिए वन विभाग ने अभियान शुरू कर दिया है। 20 मार्च को गौरैया दिवस बनाने के लिए वन विभाग कार्यक्रम का भी आयोजन कर रहा है। लोगों को छोटे-छोटे घरौंदे बनाकर लोगों से अपील की जा रही है कि अपने घरों में इन छोटे लकड़ी के बने घोंसले नुमा घरों को रख लें, जिसमें गौरैया कहीं से आकर अपना घर बसा ले और फिर से गौरैया की उसी चहचहाहट से सवेरा हो। फिर से आंगन में गौरेया फुदके और नन्हे-नन्हे बच्चे उन्हें पकडने के लिए पीछे-पीछे भागें।
गौरैया के रूठ जाने के कारण
गौरैया मानव के काफी नजदीक रही है। अब तक तो घरों में घोंसले बनाने के लिए जगह मिल जाती थी, लेकिन अब सभी पक्के और पत्थरों के घर बन गए हैं, पेड़ कटते जा रहे हैं। शहर में तो नाम मात्र के ही पेड़ रह गए हैं, जिससे गौरैया के पास घोंसला बनाने की जगह नहीं बची। गौरैया का भोजन धान, बाजरा, पके हुए चावल के दाने खाती है, लेकिन अब कोई शहरों में मिलते ही नहीं है। छुपने की जगह न होने के कारण कौए, चील, बिल्ली, बाज इसे अपना निवाला बना लेते हैं। गौरैया झाडिय़ों, बबूल, कनेर, नींबू, अमरुद, अनार, मेंहदी, बांस, बोतल ब्रश, चांदनी के पेड़ों पर अथवा घरों में बने घोंसलों में ही अंडे देतीं हैं, जो अब रहे नहीं।
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कैसे बचाएं गौरैया
वन विभाग के क्षेत्रीय वन अधिकारी मनीष मित्तल का कहना है कि गौरैया को बचाने के लिए लोगों को प्रयास करने चाहिए।ं घोंसले बनाकर उनके खाने एवं पीने की व्यवस्था करने, गौरैया के रहने के लिए बाक्स बनवाने, कीटनाशकों के प्रयोग पर रोक लगाकर गौरैया की लुप्त होती प्रजाति को बचाया जा सकता है।
कैसी होती है गौरैया
गौरेया छोटी चिडिय़ा है, जियके पंख काले और भूरे रंगे के होते हैं। इसका सिरी गोल, पूंछ छोटी और चोंच चौड़ी एवं नुकीली होती है। मनुष्य के घरों के आसपास ही यह चिडिय़ा घोंसला बनाकर रहती है।
गौरैया को बचाने का संकल्प दिलाया
खेकड़ा। वन विभाग ने मंगलवार को गौरैया दिवस मनाया। गौरैया की सुरक्षा एवं अधिक से अधिक संख्या में बढ़ाने के लिए लोगों को घोंसले वितरित किए। गौरैया दिवस पर वन रक्षक नरेंद्र सिंह ने कर्मचारियों के साथ तहसील परिसर के अलावा नगर क्षेत्र में लोगों को घोंसले वितरित किए। सभी को गौरैया की सुरक्षा का संकल्प दिलाया। बताया कि गौरैया से हमारा बचपन का संबंध है।
बचपन में मां हमें गौरैया की कहानियां सुनाती थी। गौरैया जंगल के साथ साथ मकानों मं भी निवास करती थी। पर्यावरण के साथ हमारी फसलों के लिए भी गौरैया लाभदायक है। क्योंकि यह मकानों और खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों को चुनकर खाती है।
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इस नन्हीं गौरैया को बचाने के लिए वन विभाग ने अभियान शुरू कर दिया है। 20 मार्च को गौरैया दिवस बनाने के लिए वन विभाग कार्यक्रम का भी आयोजन कर रहा है। लोगों को छोटे-छोटे घरौंदे बनाकर लोगों से अपील की जा रही है कि अपने घरों में इन छोटे लकड़ी के बने घोंसले नुमा घरों को रख लें, जिसमें गौरैया कहीं से आकर अपना घर बसा ले और फिर से गौरैया की उसी चहचहाहट से सवेरा हो। फिर से आंगन में गौरेया फुदके और नन्हे-नन्हे बच्चे उन्हें पकडने के लिए पीछे-पीछे भागें।
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गौरैया के रूठ जाने के कारण
गौरैया मानव के काफी नजदीक रही है। अब तक तो घरों में घोंसले बनाने के लिए जगह मिल जाती थी, लेकिन अब सभी पक्के और पत्थरों के घर बन गए हैं, पेड़ कटते जा रहे हैं। शहर में तो नाम मात्र के ही पेड़ रह गए हैं, जिससे गौरैया के पास घोंसला बनाने की जगह नहीं बची। गौरैया का भोजन धान, बाजरा, पके हुए चावल के दाने खाती है, लेकिन अब कोई शहरों में मिलते ही नहीं है। छुपने की जगह न होने के कारण कौए, चील, बिल्ली, बाज इसे अपना निवाला बना लेते हैं। गौरैया झाडिय़ों, बबूल, कनेर, नींबू, अमरुद, अनार, मेंहदी, बांस, बोतल ब्रश, चांदनी के पेड़ों पर अथवा घरों में बने घोंसलों में ही अंडे देतीं हैं, जो अब रहे नहीं।
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कैसे बचाएं गौरैया
वन विभाग के क्षेत्रीय वन अधिकारी मनीष मित्तल का कहना है कि गौरैया को बचाने के लिए लोगों को प्रयास करने चाहिए।ं घोंसले बनाकर उनके खाने एवं पीने की व्यवस्था करने, गौरैया के रहने के लिए बाक्स बनवाने, कीटनाशकों के प्रयोग पर रोक लगाकर गौरैया की लुप्त होती प्रजाति को बचाया जा सकता है।
कैसी होती है गौरैया
गौरेया छोटी चिडिय़ा है, जियके पंख काले और भूरे रंगे के होते हैं। इसका सिरी गोल, पूंछ छोटी और चोंच चौड़ी एवं नुकीली होती है। मनुष्य के घरों के आसपास ही यह चिडिय़ा घोंसला बनाकर रहती है।
गौरैया को बचाने का संकल्प दिलाया
खेकड़ा। वन विभाग ने मंगलवार को गौरैया दिवस मनाया। गौरैया की सुरक्षा एवं अधिक से अधिक संख्या में बढ़ाने के लिए लोगों को घोंसले वितरित किए। गौरैया दिवस पर वन रक्षक नरेंद्र सिंह ने कर्मचारियों के साथ तहसील परिसर के अलावा नगर क्षेत्र में लोगों को घोंसले वितरित किए। सभी को गौरैया की सुरक्षा का संकल्प दिलाया। बताया कि गौरैया से हमारा बचपन का संबंध है।
बचपन में मां हमें गौरैया की कहानियां सुनाती थी। गौरैया जंगल के साथ साथ मकानों मं भी निवास करती थी। पर्यावरण के साथ हमारी फसलों के लिए भी गौरैया लाभदायक है। क्योंकि यह मकानों और खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों को चुनकर खाती है।