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श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है कस्बे का भगवती देवी मंदिर
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संवाद न्यूज एजेंसी
अग्रवाल मंडी टटीरी। कस्बे में भगवती देवी मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है। मंदिर में दूरदराज से श्रद्धालु भगवती देवी की पूजा करने आते हैं। लोगों की मान्यता है कि मंदिर में सच्चे मन से मांगी मुरादें पूर्ण होती हैं। नवरात्र में मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ और बढ़ जाती है। नवरात्र में मंदिर में दिन और रात्रि में भजन कीर्तन कर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्र में मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।
1960 में हुआ मंदिर का निर्माण
मंदिर का इतिहास काफी दिलचस्प है। खट्टा प्रहलादपुर गांव के बलवंत सिंह की पुत्री भगवती देवी ने वर्ष 1958 में 10 वर्ष की आयु में 40 दिन अपने गांव में और 40 दिन सूरजपुर महनवा में खड़ी तपस्या की थी। उन्होंने अग्रवाल मंडी टटीरी में मंदिर बनाने की इच्छा जाहिर की थी। कस्बे के लोगों ने 1960 में मंदिर का निर्माण कराया था। इसके बाद भगवती देवी मंदिर परिसर में रहने लगीं और वर्ष 1964 में उन्होंने मंदिर में ही समाधि ले ली थी।
मंदिर में पूरी होती हैं मनोकामना
भगवती देवी के भतीजे ऋषिपाल ने बताया कि वह 1960 से मंदिर में रहकर सेवा कार्य कर रहे हैं। इससे उन्हें मानसिक शांति मिलती है। मंदिर में दूरदराज से श्रद्धालु पूजा-अर्चना कर मन्नते मांगने आते हैं। मंदिर में लोगों की मनोकानाएं पूर्ण होती हैं।
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अग्रवाल मंडी टटीरी। कस्बे में भगवती देवी मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है। मंदिर में दूरदराज से श्रद्धालु भगवती देवी की पूजा करने आते हैं। लोगों की मान्यता है कि मंदिर में सच्चे मन से मांगी मुरादें पूर्ण होती हैं। नवरात्र में मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ और बढ़ जाती है। नवरात्र में मंदिर में दिन और रात्रि में भजन कीर्तन कर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्र में मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।
1960 में हुआ मंदिर का निर्माण
मंदिर का इतिहास काफी दिलचस्प है। खट्टा प्रहलादपुर गांव के बलवंत सिंह की पुत्री भगवती देवी ने वर्ष 1958 में 10 वर्ष की आयु में 40 दिन अपने गांव में और 40 दिन सूरजपुर महनवा में खड़ी तपस्या की थी। उन्होंने अग्रवाल मंडी टटीरी में मंदिर बनाने की इच्छा जाहिर की थी। कस्बे के लोगों ने 1960 में मंदिर का निर्माण कराया था। इसके बाद भगवती देवी मंदिर परिसर में रहने लगीं और वर्ष 1964 में उन्होंने मंदिर में ही समाधि ले ली थी।
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मंदिर में पूरी होती हैं मनोकामना
भगवती देवी के भतीजे ऋषिपाल ने बताया कि वह 1960 से मंदिर में रहकर सेवा कार्य कर रहे हैं। इससे उन्हें मानसिक शांति मिलती है। मंदिर में दूरदराज से श्रद्धालु पूजा-अर्चना कर मन्नते मांगने आते हैं। मंदिर में लोगों की मनोकानाएं पूर्ण होती हैं।
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