{"_id":"51-71443","slug":"Baghpat-71443-51","type":"story","status":"publish","title_hn":"1857 क्रांति का साक्षी वट वृक्ष ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
1857 क्रांति का साक्षी वट वृक्ष
Baghpat
Updated Tue, 13 May 2014 05:31 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बड़ौत। वर्ष 1857 में मेरठ में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की क्रांति की चिंगार फूटी थी। बड़ौत क्षेत्र के बावली गांव के बाहर पश्चिमी छोर पर स्थित वह वट वृक्ष आज भी खड़ा है जहां 1857 क्रांति की योजना बनाने के लिए सर्वखाप पंचायत का आयोजन हुआ था। पंचायत की अध्यक्षता उस युग के महान विद्वान महर्षि दयानंद सरस्वती ने की थी।
मेरठ छावनी से इस क्रांति का आरंभ हुआ और उसी दिन अंग्रेजी राज के खिलाफ तत्कालीन मेरठ जिले का बड़ौत इसमें कूद पड़ा। 1857 की क्रांति की रूप रेखा तैयार करने के लिए हर जाति, बिरादरी के भेदभाव को भुलाकर सर्वखाप पंचायत का आयोजन बावली गांव के बाहरी छोर पर किया गया। उस समय हजाराें की संख्या में हर वर्ग के मुखिया एवं नेताओं ने हिस्सा लिया। इस सर्वखाप पंचायत में महर्षि दयानंद सरस्वती उपस्थित हुए और उन्होंने देश को अंग्रेजी राज की बेड़ियों से आजाद कराने के लिए सर्वखाप पंचायत के प्रतिनिधियों से आह्वान किया। उस समय उसी पंचायत में मौजूद बिजरौल थांबा के चौधरी अमर शहीद बाबा शाहमल सिंह ने खड़े होकर कहा था कि जब तक मेरे शरीर में रक्त की एक बूंद भी मौजूद है मैं अंग्रेजी राज को उखाड़ फेंकने का हर संभव प्रयास करूंगा। बड़ौत-बावली के बीच मौजूद 1857 क्रांति योजना का साक्षी बना वटवृक्ष आज भी सुरक्षित खड़ा है।
विज्ञापन
मेरठ छावनी से इस क्रांति का आरंभ हुआ और उसी दिन अंग्रेजी राज के खिलाफ तत्कालीन मेरठ जिले का बड़ौत इसमें कूद पड़ा। 1857 की क्रांति की रूप रेखा तैयार करने के लिए हर जाति, बिरादरी के भेदभाव को भुलाकर सर्वखाप पंचायत का आयोजन बावली गांव के बाहरी छोर पर किया गया। उस समय हजाराें की संख्या में हर वर्ग के मुखिया एवं नेताओं ने हिस्सा लिया। इस सर्वखाप पंचायत में महर्षि दयानंद सरस्वती उपस्थित हुए और उन्होंने देश को अंग्रेजी राज की बेड़ियों से आजाद कराने के लिए सर्वखाप पंचायत के प्रतिनिधियों से आह्वान किया। उस समय उसी पंचायत में मौजूद बिजरौल थांबा के चौधरी अमर शहीद बाबा शाहमल सिंह ने खड़े होकर कहा था कि जब तक मेरे शरीर में रक्त की एक बूंद भी मौजूद है मैं अंग्रेजी राज को उखाड़ फेंकने का हर संभव प्रयास करूंगा। बड़ौत-बावली के बीच मौजूद 1857 क्रांति योजना का साक्षी बना वटवृक्ष आज भी सुरक्षित खड़ा है।
विज्ञापन