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किसके सिर बंधेगी वेस्ट यूपी के जाटों की पगड़ी?
Updated Mon, 04 Sep 2017 01:35 AM IST
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बागपत। मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार के साथ ही वेस्ट यूपी की जाट सियासत में हलचल मची है। डॉ संजीव बालियान से एकाएक इस्तीफा लिए जाने और डॉ सत्यपाल सिंह को मंत्रिमंडल में शामिल कर लिए जाने से नेतृत्व का सवाल खड़ा हो गया है। भाजपा की वेस्ट यूपी की जाट राजनीति के पन्ने पलटें तो कभी राम लहर तो कभी मोदी लहर में कैबिनेट तक हासिल की गई, लेकिन खुद को जाट लीडर कोई भी साबित नहीं कर पाया। देखने वाली बात यह होगी कि इस बार ऊंट किस करवट बैठेगा।
भाजपा के जाट सांसदों की लंबी फेहरिस्त है। बागपत से शुरू करें तो रालोद मुखिया को हराकर सोमपाल शास्त्री लोकसभा पहुंचे। भाजपा ने उन्हें कृषि मंत्री बनाया, लेकिन खुद को जाट लीडरशिप में स्थापित नहीं कर सके। यहीं के सत्यपाल सिंह भाजपा में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तक रहे, लेकिन वेस्ट यूपी के जाट समाज का कारवां उनके पीछे चलता नहीं दिखा। मुजफ्फरनगर में नरेश बालियान के अलावा सोहनवीर सिंह राम लहर में जीते जरूर, लेकिन वह भी जाट समाज का नेतृत्व नहीं कर सकें। बिजनौर में भारतेंद्र सिंह भाजपा के सांसद है, लेकिन वह इस कतार में कहीं खड़े ही नहीं दिखते। कैराना सीट से दिवंगत पूर्व राज्यपाल वीरेंद्र वर्मा ने भाजपा के टिकट पर अपने खुद के वजूद से जीत हासिल की, लेकिन यह कड़वा सच है कि भाजपा में उनकी पहचान बड़े जाट लीडर के तौर पर नहीं हुई। इतिहास बताता है कि कभी राम लहर तो कभी मोदी लहर में भाजपा के टिकट पर जाट नेता विधायक, सांसद और मंत्री बनें, लेकिन वह जाटों काफिला अपने पीछे नहीं जोड़ सकें। राजनीति का वर्तमान परिदृश्य देखिए। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद डॉ संजीव बालियान लोकसभा पहुंचे। युवा तुर्क बताकर उन्हें आगे बढ़ाया गया। भाजपा का एक धड़ा उन्हें जाट लीडर के तौर पर पेश करने लगा, लेकिन एकाएक उनसे इस्तीफा ले लिया गया। अब जाट नेतृत्व की बारी बागपत के सांसद डॉ सत्यपाल सिंह की है। केंद्र की सियासत में वह जाट समाज की बात रखेंगे। साफ जाहिर है कि भाजपा के टिकट पर जाट समाज ने सीटें जीतीं और मंत्री भी बनें, लेकिन जाट समाज का काफिला किसी के पीछे चलता हुआ नहीं दिखा।
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भाजपा के जाट सांसदों की लंबी फेहरिस्त है। बागपत से शुरू करें तो रालोद मुखिया को हराकर सोमपाल शास्त्री लोकसभा पहुंचे। भाजपा ने उन्हें कृषि मंत्री बनाया, लेकिन खुद को जाट लीडरशिप में स्थापित नहीं कर सके। यहीं के सत्यपाल सिंह भाजपा में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तक रहे, लेकिन वेस्ट यूपी के जाट समाज का कारवां उनके पीछे चलता नहीं दिखा। मुजफ्फरनगर में नरेश बालियान के अलावा सोहनवीर सिंह राम लहर में जीते जरूर, लेकिन वह भी जाट समाज का नेतृत्व नहीं कर सकें। बिजनौर में भारतेंद्र सिंह भाजपा के सांसद है, लेकिन वह इस कतार में कहीं खड़े ही नहीं दिखते। कैराना सीट से दिवंगत पूर्व राज्यपाल वीरेंद्र वर्मा ने भाजपा के टिकट पर अपने खुद के वजूद से जीत हासिल की, लेकिन यह कड़वा सच है कि भाजपा में उनकी पहचान बड़े जाट लीडर के तौर पर नहीं हुई। इतिहास बताता है कि कभी राम लहर तो कभी मोदी लहर में भाजपा के टिकट पर जाट नेता विधायक, सांसद और मंत्री बनें, लेकिन वह जाटों काफिला अपने पीछे नहीं जोड़ सकें। राजनीति का वर्तमान परिदृश्य देखिए। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद डॉ संजीव बालियान लोकसभा पहुंचे। युवा तुर्क बताकर उन्हें आगे बढ़ाया गया। भाजपा का एक धड़ा उन्हें जाट लीडर के तौर पर पेश करने लगा, लेकिन एकाएक उनसे इस्तीफा ले लिया गया। अब जाट नेतृत्व की बारी बागपत के सांसद डॉ सत्यपाल सिंह की है। केंद्र की सियासत में वह जाट समाज की बात रखेंगे। साफ जाहिर है कि भाजपा के टिकट पर जाट समाज ने सीटें जीतीं और मंत्री भी बनें, लेकिन जाट समाज का काफिला किसी के पीछे चलता हुआ नहीं दिखा।
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