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अब पॉलिथीन दौर खत्म, लिफाफों दौर हुआ शुरू
Updated Sun, 22 Jul 2018 01:24 AM IST
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बागपत। बाजार में खल रही कपड़े के छोटे थैलों की कमी को देखकर लिफाफों का क्रेज बढ़ गया है। ठेली से लेकर दुकानों पर इनमें ही सामान रखकर दिया जाने लगा है। इससे घरों में लिफाफे या कपड़े का थैला बनाने वाले को भी ज्यादा काम मिल गया है।
पॉलिथीन मानव जीवन के लिए खतरा बनती जा रही है। इससे पर्यावरण और नदियों का पानी दूषित हो गया। खेतों से उर्वरा शक्ति खत्म होती जा रही है। इन सभी ज्वलंत समस्याओं को देखकर सूबे की सरकार ने पॉलिथीन को पूरी तरह बंद करने का निर्णय लिया। शासन और प्रशासन को इस पर पाबंदी लगाने के निर्देश दिए है। इसका इस्तेमाल करने पर जुर्माना का प्रावधान निर्धारित कर दिया। इसके बाद जिला प्रशासन ने इसके लिए सख्ती अपनाई। नगर पालिका और नगर पंचायतों में अभियान चलाया। दुकानदारों से जुर्माना वसूला।
शासन और प्रशासन के अभियान का असर बाजारों में नजर आने लगा है। दुकानों में ग्राहकों को पॉलिथीन में सामान नहीं दिया जा रहा है। फिर से बाजारों में कागज के लिफाफों का क्रेज बढ़ गया है। इन्हें ठेलों पर सब्जी से लेकर दुकानों पर परचून का सामान रखे दिया जा रहा है। कपड़े के थैलों का भी इस्तेमाल हो रहा है। ग्राहकों के हाथों में भी घर के बनाए थैले देखे जा रहे हैं। उन्हीं में दुकानदार लिफाफों में सामान रखकर दें देते है। वहीं घरों में लिफाफे या कपड़े का थैला बनाने वालों के पास भी काम बढ़ गया है। दिन में जहां 500-600 लिफाफे ही सप्लाई होते थे, अब 1000 से 1200 तक की सप्लाई हो रही है। मोहम्मद नसीम और उसकी पत्नी संजीदा बेगम ने बताया कि काफी समय से लिफाफे बनाने का काम करते है। कम मात्रा में सप्लाई होती थी। जब तक पॉलिथीन बंद हुई है तब तक काम बढ़ गया है। ज्यादा दुकानों पर अब उनके लिफाफे सप्लाई हो रहे हैं। इसमें 100 से लेकर पांच किलो तक वाले लिफाफे बनाकर सप्लाई कर रहे हैं। व्यापारी फोन करके सप्लाई सप्लाई मंगवा रहे हैं। डीडीओ हुब लाल ने बताया कि पॉलिथीन मानव जीवन के लिए खतरा है। इसके बंद होने से स्वरोजगार बढ़ा है तो काफी अच्छी बात है। स्वरोजगार के लिए ही हम लोगों को जागरूक कर रहे है।
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पॉलिथीन प्रतिबंध से बढ़ा स्वरोजगार
शासन ने पॉलिथीन को बंद करने पर लोगों का स्वरोजगार बढ़ गया है। घरों में परिवार के लोग लिफाफे बनाना शुरू कर दिया है। व्यापारियों से संपर्क किया जा रहा है।
रद्दी की बढ़ गई मांग
घर-घर से रद्दी लेने वाले कबाड़ी के पास भी ज्यादा रद्दी की मांग बढ़ गई है। वहीं जो अखबार 10-11 रुपये किलो बिका करते थे अब वो 12 से 15 रुपये किलो तक बिक रहे हैं। स्कूली किताबों की रद्दी में भी बढ़ोतरी हुई है।
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पॉलिथीन मानव जीवन के लिए खतरा बनती जा रही है। इससे पर्यावरण और नदियों का पानी दूषित हो गया। खेतों से उर्वरा शक्ति खत्म होती जा रही है। इन सभी ज्वलंत समस्याओं को देखकर सूबे की सरकार ने पॉलिथीन को पूरी तरह बंद करने का निर्णय लिया। शासन और प्रशासन को इस पर पाबंदी लगाने के निर्देश दिए है। इसका इस्तेमाल करने पर जुर्माना का प्रावधान निर्धारित कर दिया। इसके बाद जिला प्रशासन ने इसके लिए सख्ती अपनाई। नगर पालिका और नगर पंचायतों में अभियान चलाया। दुकानदारों से जुर्माना वसूला।
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शासन और प्रशासन के अभियान का असर बाजारों में नजर आने लगा है। दुकानों में ग्राहकों को पॉलिथीन में सामान नहीं दिया जा रहा है। फिर से बाजारों में कागज के लिफाफों का क्रेज बढ़ गया है। इन्हें ठेलों पर सब्जी से लेकर दुकानों पर परचून का सामान रखे दिया जा रहा है। कपड़े के थैलों का भी इस्तेमाल हो रहा है। ग्राहकों के हाथों में भी घर के बनाए थैले देखे जा रहे हैं। उन्हीं में दुकानदार लिफाफों में सामान रखकर दें देते है। वहीं घरों में लिफाफे या कपड़े का थैला बनाने वालों के पास भी काम बढ़ गया है। दिन में जहां 500-600 लिफाफे ही सप्लाई होते थे, अब 1000 से 1200 तक की सप्लाई हो रही है। मोहम्मद नसीम और उसकी पत्नी संजीदा बेगम ने बताया कि काफी समय से लिफाफे बनाने का काम करते है। कम मात्रा में सप्लाई होती थी। जब तक पॉलिथीन बंद हुई है तब तक काम बढ़ गया है। ज्यादा दुकानों पर अब उनके लिफाफे सप्लाई हो रहे हैं। इसमें 100 से लेकर पांच किलो तक वाले लिफाफे बनाकर सप्लाई कर रहे हैं। व्यापारी फोन करके सप्लाई सप्लाई मंगवा रहे हैं। डीडीओ हुब लाल ने बताया कि पॉलिथीन मानव जीवन के लिए खतरा है। इसके बंद होने से स्वरोजगार बढ़ा है तो काफी अच्छी बात है। स्वरोजगार के लिए ही हम लोगों को जागरूक कर रहे है।
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पॉलिथीन प्रतिबंध से बढ़ा स्वरोजगार
शासन ने पॉलिथीन को बंद करने पर लोगों का स्वरोजगार बढ़ गया है। घरों में परिवार के लोग लिफाफे बनाना शुरू कर दिया है। व्यापारियों से संपर्क किया जा रहा है।
रद्दी की बढ़ गई मांग
घर-घर से रद्दी लेने वाले कबाड़ी के पास भी ज्यादा रद्दी की मांग बढ़ गई है। वहीं जो अखबार 10-11 रुपये किलो बिका करते थे अब वो 12 से 15 रुपये किलो तक बिक रहे हैं। स्कूली किताबों की रद्दी में भी बढ़ोतरी हुई है।